भूस्खलन, जिसे अंग्रेजी में लैंडस्लाइड कहा जाता है। यह एक प्रकार की प्राकृतिक आपदा है। लैंडस्लाइड भूकंप, बारिश या फिर दोनों की वजह से हो सकता है। जब कभी पर्वतीय क्षेत्रों से चट्टानों, रेत, मिट्टी इत्यादि भू-सामग्री का तेजी से नीचे गिरना लैंडस्लाइड कहलाता है।
भूस्खलन तब होता है जब गुरुत्वाकर्षण का खिंचाव किसी पहाड़ी या पहाड़ की ढलान बनाने वाली भू-सामग्री (चट्टानों, रेत, मिट्टी इत्यादि) की ताकत से ज्यादा हो। इसकी वजह से ढलान का कुछ हिस्सा पहाड़ी से नीचे खिसकने लगता है।
लैंडस्लाइड के प्राकृतिक और मानवीय हस्तक्षेप दोनों की वजह से होती है। वनों अंधाधुंध हो रही कटाई का ढलान की स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। दरअसल, पेड़ों की जड़ें जमीन को मजबूती प्रदान करती हैं। इसके अलावा खदान विस्फोटों की वजह से कम तीव्रता वाले भूकंप जैसे जमीनी कंपन पैदा होता है। जिसकी वजह से आसपास के ढलान बुरी तरह से प्रभावित होते हैं।
भूस्खलन के लिए भूकंप को भी जिम्मेदार माना जाता है। भूकंप की वजह से जमीन के अंदरूनी हिस्से में कंपन पैदा होता है और जमीन पर दबाव पड़ता है। जिसकी वजह से ढलान कमजोर होती है और बची-कुची कसर बारिश पूरी कर देता है। बारिश का जमीन के अंदर रिसता है और ढलान में मौजूद मिट्टी का वजन बढ़ा देता है।
लैंडस्लाइड की भविष्यवाणी करना और उसके प्रभाव को कम करना बेहद कठिन है। हालांकि, भूकंप और बारिश के पूर्वानुमान की मदद से एहतियाती कदम जरूर उठाया जा सकता है।
पिछले कुछ वक्त से उत्तराखंड और हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों से भूस्खलन की खबरें सामने आ रही हैं। ऐसे में यह तो स्पष्ट है कि पहाड़ी राज्यों में भूस्खलन ज्यादा होता है। जिनमें उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, जम्मू-कश्मीर, केरल इत्यादि शामिल हैं।