गणपति विसर्जन का सबसे पहला और बड़ा सबक यह है कि इस दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है। जिस मूर्ति को हम इतने प्रेम, आदर और भव्यता से लाते हैं, उसे एक दिन विसर्जित करना ही पड़ता है। इसी तरह जीवन में सुख या दुख, स्थितियां हमेशा बदलती रहती हैं।
दस दिनों तक गणेश जी की सेवा करने के बाद उनके विसर्जन का क्षण बेहद भावुक होता है। यह हमें सिखाती है कि किसी भी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति से इतना मोह न रखें कि उसका अलगाव सहना असंभव हो जाए। जीवन में प्रेम पूरा रखें, लेकिन आसक्ति से मुक्त रहना सीखें।
विसर्जन अंत नहीं, बल्कि एक नए आगमन की उम्मीद है। जीवन में जब भी कोई दौर समाप्त होता है या असफलता मिलती है, तो यह सबक याद रखें कि हर अंत के बाद एक नई और बेहतर शुरुआत अवश्य होती है।
गणपति विसर्जन में जल में मूर्ति का लीन हो जाना प्रतीक है कि अंततः सब कुछ प्रकृति में ही समा जाना है। मिट्टी से बनी मूर्ति मिट्टी में और जल में विलीन हो जाती है। यह दृश्य मनुष्य को सिखाता है कि उसका रूप, पद, पैसा और अहंकार सब नश्वर हैं।
विसर्जन हमें सिखाता है कि मनुष्य का अस्तित्व प्रकृति के बिना संभव नहीं है। हमें अपने जीवन शैली और उत्सवों में प्रकृति के संतुलन का ध्यान रखना चाहिए और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने से बचना चाहिए।
विसर्जन यात्रा में अमीर-गरीब, छोटे-बड़े का भेद मिट जाता है। सभी लोग एक साथ ढोल-ताशों की थाप पर नाचते हैं और एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं। यह सबक देता है कि जीवन की सच्ची खुशी और उत्सव सामूहिक भाईचारे, एकता और समाज को साथ लेकर चलने में निहित है।
गणेश जी को विघ्नहर्ता कहा जाता है। विसर्जन के समय हम प्रार्थना करते हैं कि बप्पा जाते-जाते हमारे सारे दुख और कष्ट अपने साथ ले जाएं। इससे हमें सीख मिलती है कि हमें भी दूसरों के जीवन में खुशियां बांटनी चाहिए और दूसरों के रास्ते के विघ्न व रुकावटों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।