अतीत के कड़वे अनुभव अकसर वर्तमान के रिश्तों पर भारी पड़ते हैं। किसी पुराने धोखे या दर्दनाक ब्रेकअप से गुजरे लोग आसानी से दोबारा भरोसा नहीं कर पाते। जब नया रिश्ता गंभीर होने लगता है, तो वे खुद को किसी भी संभावित चोट से बचाने के लिए पहले ही दूरी बना लेते हैं।
कुछ लोगों के लिए कमिटमेंट का मतलब अपनी स्वतंत्रता का समझौता करना होता है। वे इस बात से घबराते हैं कि गंभीर रिश्ता होने पर उनका पर्सनल स्पेस कम हो जाएगा। हर फैसले में दूसरे को शामिल करने की मजबूरी उन्हें अंदर से घुटन महसूस कराती है और वे खुद को कैद हुआ मानने लगते हैं।
रोजमर्रा की हल्की-फुल्की बातें करना आसान होता है, लेकिन अपने गहरे डर और कमजोरियों को साझा करना बहुत हिम्मत का काम है। कई लोग अपनी भावनाएं जाहिर करने में असहज होते हैं। जब रिश्ता भावनात्मक गहराई मांगता है, तो वे यह समझ नहीं पाते कि स्थिति को कैसे संभालें और पीछे हट जाते हैं।
कई बार पीछे हटने की वजह सिर्फ शक या कन्फ्यूजन होती है। व्यक्ति पार्टनर को पसंद तो करता है, लेकिन उसे दीर्घकालिक अनुकूलता या भविष्य के लक्ष्यों को लेकर स्पष्टता नहीं होती। इस उलझन पर खुलकर बात करने के बजाय वे दूरी बनाना ज्यादा आसान रास्ता मानते हैं।
किसी के साथ वक्त बिताना और एक गंभीर रिश्ते की जिम्मेदारी उठाना दो बिलकुल अलग चीजें हैं। डेटिंग का रोमांच तो सबको भाता है, लेकिन उसके बाद आने वाली जिम्मेदारियों से लोग घबरा जाते हैं। जब अपेक्षाएं बढ़ती हैं, तो उन्हें अहसास होता है कि वे अभी इसके लिए तैयार नहीं हैं।
रिश्तों में आने वाली ये दूरियां अक्सर गलतफहमियों और डर की वजह से पैदा होती हैं। अगर समय रहते खुलकर बातचीत की जाए और एक-दूसरे की भावनाओं को समझा जाए, तो इस तरह की कशमकश को आसानी से दूर किया जा सकता है।