केंद्र सरकार देश के हायर एजुकेशन सिस्टम में बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। इस बदलाव के तहत UGC, AICTE और NCTE जैसे मौजूदा निकायों को हटाकर उनकी जगह एक नया सिंगल रेगुलेटरी फ्रेमवर्क या यूं कहें संस्था लाने की तैयारी हो रही है। इस फ्रेमवर्क को लाने के पीछे सरकार का तर्क है कि इससे हायर एजुकेशन आसान, पारदर्शी और एकीकृत होगा। हालांकि इस सिस्टम के आने का कई लोगों को ये डर भी है कि इससे सारा कंट्रोल सिर्फ एक ही जगह चला जाएगा। यही वजह है कि ये नया बिल छात्रों, शिक्षकों और साथ ही साथ यूनिवर्सिटीज के लिए भी अहम माना जा रहा है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या इससे पढ़ाई वाकई बेहतर होगी? या फिर सच में सिस्टम और ज्यादा एकीकृत हो जाएगा? इससे छात्रों के भविष्य पर क्या और कैसा असर पड़ेगा? इस लेख में जानते हैं ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब...
चलिये सबसे पहले तो ये जान लेते हैं कि ये UGC, AICTE और NCTE क्या हैं और ये काम कैसे करते हैं? दरअसल, यूजीसी देश की विश्वविद्यालयी शिक्षा और फंडिंग से जुड़ी बॉडी है। इसका काम ये तय करना होता है कि कौन सी यूनिवर्सिटी मान्य होगी और वहां पढ़ाई का स्तर कैसा होना चाहिए। साथ ही ये फंडिंग फैकल्टी मानक और डिग्री से जुड़े नियम भी बनाता है। AICTE की बात करें तो ये टेक्निकल एजुकेशन से जुड़ी संस्था है। अगर कोई कॉलेज AICTE अप्रूव्ड है, तो ही उसकी टेक्निकल डिग्री मान्य मानी जाएगी।
NCTE की बात करें तो ये B.Ed, D.El.Ed जैसे कोर्स को रेगुलेट करती है। ये तय करता है कि टीचर ट्रेनिंग कॉलेज के पास सही इंफ्रास्ट्रक्चर और योग्य शिक्षक हैं या फिर नहीं। छात्रों के लिए NCTE की मान्यता बेहद जरूरी है। नहीं तो इसके बिना शिक्षक की कोई डिग्री मान्य नहीं होती।
बताते चलें कि अब सरकार का प्रस्ताव है कि इन तीनों की जगह सिर्फ एक ही रेगुलेटरी बॉडी लाई जाए, जो कि सभी यूनिवर्सिटी, कॉलेजों, तकनीकी शिक्षा और टीचिंग जैसे कोर्सेज और कॉलेज के लिए समान ढांचा तय करे। ये संस्था मान्यता, गुणवत्ता सिलेबस और जवाबदेही जैसी चीजों को देखेगी। इसे ऑल इन वन रेगुलेशन के तौर पर देखा जा रहा है। केद्रीय मंत्रिमंडल ने इस बिल को पास करने वाले विधेयक को मंजूरी दे दी है।
अगर ये बिल लागू होता है तो मंजूरी और मान्यता की प्रक्रिया सिंगल विंडो जैसी हो जाएगी। यानी कि संस्थानों को अलग-अलग रेगुलेटर्स के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। साथ ही मल्टी डिसिप्लिनरी एजुकेशन को बढ़ावा मिलेगा। सरकार का ये तर्क है कि फिल्हाल जो व्यवस्था लागू है, उसमें डुप्लीकेशन और गुणवत्ता में असमानता जैसी चीजे गैं। ग्लोबल रैंकिंग में भारत की स्थिति को सुधारने, विदेशी विश्वविद्यालयों को आकर्षित करने और छात्रों को रोजगार को ध्यान में रखते हुए शिक्षा देने के लिए ये ढांचा जरूरी माना जा रहा है।
इस रेगुलेशन के आने से तेजी से निर्णय, कम पेपर वर्क और स्पष्ट नियम मिल सकते हैं। संस्थानों को भी काम करने की ज्यादा आजादी मिल सकती है। वहीं छात्रों के लिए क्रेडिट ट्रांसफर, मल्टी एंट्री/एग्जिट और इंटर डिसिल्पिनिरी ऑप्शन आसान हो सकते हैं। दूसरा फायदा पढ़ाई में ज्यादा ऑप्शन और लचीलापन है। छात्र इसके जरिये इंजीनियरिंग के साथ साथ अन्य स्किल कोर्स के विकल्प भी चुन सकेंगे।
इस बिल के बारे में आलोचकों का ऐसा मानना है कि इससे केंद्रीकरण बढ़ सकता है। अलग-अलग क्षेत्रों की खास जरूरतों को नजरअंदाज किए जाने का भी जोखिम है। साथ ही यूनिवर्सिटीज की स्वायत्ता पर भी दबाव पड़ सकता है। साथ ही अलग-अलग संस्थानों की खास जरूरतों को बराबर महत्व ना मिलने का भी डर है। साथ ही नए कोर्स शुरू करना, सिलेबस में बदलाव या फिर स्थानीय जरूरतों के हिसाब से पढ़ाई को ढालना भी मुश्किल हो सकता है।
बताते चलें कि इसे उच्च शिक्षा के एकल नियामक के रूप में स्थापित किया जाएगा। मगर मेडिकल और लॉ कॉलेज इसके दायरे में नहीं आएंगे। इस उच्च शिक्षा बिल का फोकस जनरल, टेक्निकल और टीचर एजुकेशन पर है। मेडिकल और लॉ एजुकेश के लिए पहले से ही अलग और विशेष रेगुलेटरी संस्थाएं काम कर रही हैं। मेडिकल कॉलेज को NMC (National Medical Commission) रेगुलेट करता है, तो वहीं लॉ कॉलेजों को BCI (Bar Council Of India) रेगुलेट करता है।