जब कन्नौज की सत्ता के लिए भिड़ गए थे तीन साम्राज्य; उस शहर की कहानी, जहां जीतकर उत्तर भारत का 'सम्राट' बन जाते थे राजा

Tripartite Struggle Of Kannauj: 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच उत्तर भारत की राजनीति एक लंबे और जटिल सत्ता संघर्ष से गुजर रही थी। इस दौर में तीन महाशक्तियां, पाल, गुर्जर-प्रतिहार और राष्ट्रकूट, अपने साम्राज्य विस्तार की होड़ में आमने-सामने थीं। इसने कन्नौज में ऐसी स्थितियां पैदा हुईं, जिससे तीन तरफ से यहां सत्ता के लिए संघर्ष शुरू हो गया। इतिहास के पन्नों में इसे कन्नौज का त्रिपक्षीय संघर्ष के नाम से दर्ज किया गया। तो आखिर कन्नौज की ‘शाही कुर्सी’ इतनी महत्वपूर्ण क्यों थी और इन लड़ाइयों का नतीजा क्या निकला, आइए जानते हैं।

Authored by: निशांत तिवारीUpdated Dec 18 2025, 11:36 IST
तीन महाशक्तियों का उदयImage Credit : AI Image01 / 08

तीन महाशक्तियों का उदय

8वीं सदी के अंत तक भारत में तीन बड़े राजनीतिक केंद्र उभर चुके थे। पूर्व में बंगाल-बिहार के पाल वंश, पश्चिम में राजस्थान और मध्य भारत में गुर्जर-प्रतिहार, और दक्षिण में दक्कन के राष्ट्रकूट। प्रतिहार शासक वत्सराज, पाल राजा धर्मपाल और राष्ट्रकूट शासक ध्रुव इस संघर्ष के शुरुआती नायक बने।

कन्नौज क्यों बना सत्ता का प्रतीकImage Credit : AI Image02 / 08

कन्नौज क्यों बना सत्ता का प्रतीक

कभी हर्षवर्धन की राजधानी रह चुका कन्नौज राजनीतिक पकड़, सामरिक स्थिति और गंगा-यमुना ट्रे़ड रूट के कारण बेहद अहम था। जो भी कन्नौज की सत्ता पर काबिज होता, उसे समूचे उत्तर भारत का सम्राट माना जाता था। यही वजह थी कि तीनों वंशों की नजरें इसी शहर पर टिकी थीं।

वत्सराज और धर्मपाल की पहली टक्करImage Credit : AI Image03 / 08

वत्सराज और धर्मपाल की पहली टक्कर

प्रतिहार राजा वत्सराज ने पूर्व की ओर बढ़ते हुए पाल शासक धर्मपाल को पराजित किया। यह संघर्ष संभवतः गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में हुआ। इसी टकराव ने पालों और प्रतिहारों के बीच लंबे समय तक चलने वाली दुश्मनी की नींव रखी।

राष्ट्रकूटों की एंट्री और ध्रुव की विजयImage Credit : AI Image04 / 08

राष्ट्रकूटों की एंट्री और ध्रुव की विजय

जब पाल और प्रतिहार उत्तर भारत में भिड़े हुए थे, तभी दक्षिण से राष्ट्रकूट शासक ध्रुव मैदान में उतरे। उन्होंने विंध्य पार कर वत्सराज और धर्मपाल, दोनों को जंग में हराया। हालांकि ध्रुव की मृत्यु के बाद राष्ट्रकूटों को दक्षिण में आंतरिक संघर्षों में उलझना पड़ा, जिससे उत्तर भारत में उनकी पकड़ लगातार कमजोर होती गई।

धर्मपाल का साम्राज्य और कन्नौज दरबारImage Credit : AI Image05 / 08

धर्मपाल का साम्राज्य और कन्नौज दरबार

इस मौके का फायदा उठाकर पाल शासक धर्मपाल ने कन्नौज पर अपना प्रभाव जमाया। उसने अपने समर्थक चक्रायुध को वहां का राजा बना दिया और कन्नौज में भव्य दरबार आयोजित कर खुद को उत्तर भारत का अधिपति घोषित कर दिया। इतिहासकार आर सी मजूमदार बताते हैं कि यह पाल साम्राज्य का स्वर्णकाल था।

नागभट्ट द्वितीय और सत्ता की वापसीImage Credit : AI Image06 / 08

नागभट्ट द्वितीय और सत्ता की वापसी

प्रतिहार शक्ति पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। वत्सराज के उत्तराधिकारी नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज पर सत्ता के लिए जोरदार वापसी की। उसने धर्मपाल और उसके समर्थकों को हराकर कन्नौज पर फिर कब्जा कर लिया। लेकिन जल्द ही राष्ट्रकूट राजा गोविंद तृतीय ने आक्रमण कर प्रतिहारों के साम्राज्य को झकझोर दिया।

देवपाल का उत्कर्ष और पाल शक्ति का चरमImage Credit : AI Image07 / 08

देवपाल का उत्कर्ष और पाल शक्ति का चरम

धर्मपाल के बाद देवपाल ने पाल साम्राज्य को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उसने उत्तर भारत के बड़े हिस्से पर प्रभुत्व कायम किया और पाल सत्ता हिमालय से विंध्य तक फैल गई। हालांकि उनके बाद कमजोर उत्तराधिकारियों के चलते पाल साम्राज्य धीरे-धीरे ढलान पर चला गया।

कन्नौज संघर्ष का अंतिम अध्यायImage Credit : AI Image08 / 08

कन्नौज संघर्ष का अंतिम अध्याय

9वीं सदी के मध्य में प्रतिहार शासक भोज ने हालात का फायदा उठाया। उसने पालों और राष्ट्रकूटों, दोनों को पराजित कर कन्नौज को अपनी राजधानी बना दिया। भोज और उनके उत्तराधिकारी महेंद्रपाल के समय प्रतिहार साम्राज्य अपने चरम पर पहुंचा। और प्रतिहारों की जीत के साथ लगभग एक सदी तक चला त्रिपक्षीय संघर्ष समाप्त हुआ।

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