लक्ष्मण झूला योग नगरी ऋषिकेश में में गंगा नदी के ऊपर बना है, जिसे इंजीनियरिंग का बेहतरीन नमूना कहा जा सकता है। यह धार्मिक आस्था और पर्यटन का प्रतीक भी है।
ऋषिकेश में लक्ष्मण झूला को 11 अप्रैल 1930 को जनता के लिए खोला गया था। यह 124 मीटर लंबा लोहे का पुल है जो तारों पर झूलता है। ऋषिकेश आने वाले लोग लक्ष्मण झूला देखने जरूर जाते हैं।
मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण ने यहीं पर जूट की रस्सियों से एक अस्थायी पुल बनाकर गंगा नदी पार की थी। यही कारण है कि इस पुल का नाम लक्ष्मण झूला पड़ा। हिंदओं में इसकी गहरी आस्था है और ऋषिकेश आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए लक्ष्मण झूला विशेष महत्व रखता है। यहां पास में ही लक्ष्मण मंदिर भी है।
साल 1889 में कलकत्ता (आज कोलकाता) के सेठ सूरजमल झुहानूबला ने स्वामी विशुदानंद से प्रेरणा लेकर जूट की रस्सियों की जगह लोहे की तारों से यहां पर एक मजबूत पुल बनवाया। यह पुल 284 फीट लंबा था। लेकिन 1924 में आई भीषण बाढ़ में बह गया।
बाद में अंग्रेजों ने 1927 में पुल का नए सिरे से निर्माण कार्य शुरू किया। 1929 में 6 फीट चौड़ा और 450 फीट लंबा लोहे की तारों का पुल बन गया, जिसे 11 अप्रैल 1930 को जनता के लिए खोल दिया गया। इस झूला पुल पर उस समय जीप और हल्के वाहन भी चल सकते थे।
गंगा नदी से 70 फीट की ऊंचाई पर लोहे की तारों से बना यह पुल काफी मजबूत था। गंगा के एक छोर से दूसरे छोर तक इसमें कोई पिलर नहीं है, बल्कि यह झूला पुल यानी सस्पेंशन ब्रिज है। करीब 94 साल तक यह पुल टिका। लक्ष्मण झूला को कई फिल्मों और टीवी सीरियल में भी दर्शाया गया है।
लक्ष्मण झूला को सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया गया है। IIT रुड़की की एक सर्वे रिपोर्ट में साल 2019 में इसे आवागमन के लिए असुरक्षित करार दे दिया गया था। जुलाई 2019 में इसे राज्य सरकार ने बंद कर दिया। स्थानीय लोगों की मांग पर बाद में पैदल यात्रियों के लिए खोला गया, लेकिन फिर 3 अप्रैल 2022 को इसे पूरी तरह से बंद कर दिया गया।
2019 में बंद किए जाने के बाद जब जनता की मांग पर इसे फिर शुरू किया गया तो पुल की सपोर्टिंग वायर टूटने के बाद इसे साल 2022 में बंद करना पड़ा। किसी अनहोनी के डर के चलते फिलहाल लक्ष्मण झूला पूरी तरह से बंद है।