भारत की पहली महारत्न कंपनी कौन? क्यों बनाई गई यह कैटेगरी, अब हैं कितनी?

Maharatna Companies: भारत की सरकारी कंपनियों यानी Central Public Sector Enterprises (CPSEs) में ‘महारत्न’ दर्जा सबसे ऊंची श्रेणी माना जाता है। यह केवल सम्मान का दर्जा नहीं है, बल्कि इसके साथ कंपनियों को कई बड़े कारोबारी और वित्तीय फैसले लेने की ज्यादा स्वतंत्रता मिलती है। इसका मकसद ऐसी मजबूत सरकारी कंपनियों को तेजी से फैसले लेने में सक्षम बनाना है, ताकि वे देश के साथ-साथ विदेशी बाजारों में भी बड़े स्तर पर कारोबार कर सकें। आइए जानते हैं कि भारत में महारत्न कैटेगरी की शुरुआत कैसे हुई, पहली कंपनियां कौन थीं और इसके क्या फायदे हैं।

Authored by: Ramanuj SinghUpdated Aug 12 2026, 16:13 IST
​दिसंबर 2009 में शुरू हुई महारत्न कैटेगरी​Image Credit : Representative image istock01 / 07

​दिसंबर 2009 में शुरू हुई महारत्न कैटेगरी​

महारत्न कैटेगरी शुरू करने का फैसला दिसंबर 2009 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने लिया था और फरवरी 2010 में इसकी व्यवस्था लागू हुई। इसके पीछे मुख्य सोच यह थी कि देश की बड़ी और अच्छा प्रदर्शन करने वाली सरकारी कंपनियों को कारोबार बढ़ाने के लिए ज्यादा स्वायत्तता दी जाए। उस समय सरकार चाहती थी कि मजबूत सरकारी कंपनियां हर बड़े कारोबारी फैसले के लिए मंत्रालयों की मंजूरी का इंतजार न करें और बाजार में मौजूद अवसरों का तेजी से फायदा उठा सकें।

​ये थीं भारत की पहली चार महारत्न कंपनियां​Image Credit : Representative image istock02 / 07

​ये थीं भारत की पहली चार महारत्न कंपनियां​

मई 2010 में पहली बार चार सरकारी कंपनियों को महारत्न का दर्जा दिया गया। इनमें इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC), नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (NTPC), ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ONGC) और स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAIL) शामिल थीं। इन चारों कंपनियों को 19 मई 2010 को महारत्न का दर्जा देने के आदेश जारी किए गए थे। इनका चयन उनके बड़े कारोबार, मजबूत वित्तीय स्थिति, देश के लिए रणनीतिक महत्व और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की क्षमता को देखते हुए किया गया था।

​आखिर महारत्न कैटेगरी बनाने की जरुरत क्यों पड़ी?​Image Credit : Representative image istock03 / 07

​आखिर महारत्न कैटेगरी बनाने की जरुरत क्यों पड़ी?​

महारत्न व्यवस्था का सबसे बड़ा उद्देश्य सरकारी कंपनियों को तेजी से कारोबारी फैसले लेने की आजादी देना था। बड़ी कंपनियों के सामने अक्सर निवेश, अधिग्रहण, संयुक्त उपक्रम और विदेशी विस्तार जैसे कई मौके आते हैं। अगर हर फैसले के लिए सरकारी मंजूरी जरूरी हो, तो कारोबार के अवसर हाथ से निकल सकते हैं। इसलिए सरकार ने बेहतर प्रदर्शन करने वाली बड़ी Navratna कंपनियों को ज्यादा अधिकार देने की व्यवस्था बनाई। इससे वे निजी और विदेशी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा में तेजी से फैसले ले सकें।

​महारत्न योजना किसी एक व्यक्ति की देन नहीं​Image Credit : Representative image istock04 / 07

​महारत्न योजना किसी एक व्यक्ति की देन नहीं​

महारत्न कैटेगरी को किसी एक नेता या व्यक्ति के दिमाग की उपज बताना पूरी तरह सही नहीं होगा। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस व्यवस्था का ढांचा Department of Public Enterprises (DPE) ने तैयार किया था। दिसंबर 2009 में केंद्र सरकार ने इसे मंजूरी दी। DPE सरकारी कंपनियों से जुड़ी नीतियों, उनके प्रदर्शन और स्वायत्तता से संबंधित मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए महारत्न व्यवस्था को एक व्यापक सरकारी नीति और संस्थागत प्रयास का परिणाम माना जाता है।

​आज कितनी कंपनियां महारत्न हैं?​Image Credit : Representative image istock05 / 07

​आज कितनी कंपनियां महारत्न हैं?​

समय के साथ इस लिस्ट में कई और बड़ी सरकारी कंपनियां शामिल हुई हैं। मौजूदा सूची में BHEL, BPCL, GAIL, Coal India, HPCL, SAIL, NTPC, REC, PFC, Power Grid, IOC, ONGC, Oil India और HAL शामिल हैं। यानी कुल 14 कंपनियां महारत्न कैटेगरी में हैं। इन कंपनियों का संबंध ऊर्जा, पेट्रोलियम, बिजली, कोयला, रक्षा, वित्त और भारी उद्योग जैसे देश के महत्वपूर्ण क्षेत्रों से है। बेहतर प्रदर्शन करने वाली पात्र नवरत्न कंपनियों को समय-समय पर महारत्न का दर्जा दिया जाता रहा है।

​महारत्न बनने के बाद कंपनियों को क्या फायदा मिलता है?​Image Credit : Representative image istock06 / 07

​महारत्न बनने के बाद कंपनियों को क्या फायदा मिलता है?​

महारत्न का सबसे बड़ा फायदा कंपनियों के बोर्ड को मिलने वाली अधिक वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता है। इससे कंपनियां बड़े निवेश, संयुक्त उपक्रम, सहायक कंपनियां बनाने, रणनीतिक साझेदारी और अन्य कारोबारी फैसले अपेक्षाकृत ज्यादा स्वतंत्रता के साथ ले सकती हैं। पारंपरिक व्यवस्था में महारत्न कंपनियों के बोर्ड को एक परियोजना में 5,000 करोड़ रुपये तक निवेश करने की शक्ति दी गई है, हालांकि यह निर्धारित नियमों और सरकारी दिशा-निर्देशों के अधीन होती है। इससे कंपनियों को बाजार में मौजूद अवसरों पर तेजी से निर्णय लेने में मदद मिलती है। महारत्न कंपनियों को मिलने वाली स्वायत्तता का दायरा समय और जरुरत के हिसाब से बदला भी जा सकता है। उदाहरण के लिए, 2026 में Power Grid के मामले में सरकार ने उसकी कुछ निवेश शक्तियों की सीमा को विशेष रूप से बढ़ाकर प्रति सब्सिडियरी 7,500 करोड़ रुपये किया है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि महारत्न कंपनियों को पूरी तरह सरकारी नियंत्रण से बाहर कर दिया गया है। उन्हें अभी भी सरकार की व्यापक नीतियों, निर्धारित नियमों और वित्तीय सीमाओं का पालन करना होता है।

​महारत्न बनने के लिए क्या है जरुरी?​Image Credit : Representative image istock07 / 07

​महारत्न बनने के लिए क्या है जरुरी?​

किसी सरकारी कंपनी को महारत्न का दर्जा हासिल करने के लिए कई शर्तें पूरी करनी होती हैं। सबसे पहले कंपनी का नवरत्न CPSE होना जरूरी है। इसके अलावा कंपनी का भारतीय शेयर बाजार में लिस्टेड होना और SEBI के नियमों के अनुसार न्यूनतम सार्वजनिक हिस्सेदारी रखना जरूरी है। पिछले तीन वर्षों में उसका औसत सालाना टर्नओवर 25,000 करोड़ रुपये से अधिक, औसत वार्षिक नेटवर्थ 15,000 करोड़ रुपये से अधिक और औसत वार्षिक मुनाफा 5,000 करोड़ रुपये से अधिक होना चाहिए। इसके साथ कंपनी की महत्वपूर्ण वैश्विक मौजूदगी या अंतरराष्ट्रीय कारोबार भी होना चाहिए। इन शर्तों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि महारत्न का दर्जा केवल उन्हीं सरकारी कंपनियों को मिले जो बड़े स्तर पर कारोबार संभालने, निवेश करने और वैश्विक कंपनियों से मुकाबला करने की क्षमता रखती हों।

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