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किताबें तो खरीद लाए पर पढ़ने का नहीं हुआ मन, जानिए कैसे मोटिवेशन से गिल्ट तक पहुंच जाती है ये आदत

कई बार लोग सिर्फ किताबें इकट्ठा करने के शौकीन होते हैं। उन्हें ऐसा भ्रम होता है कि घर में अच्छी और बड़ी किताबें होने मात्र से उनका बौद्धिक स्तर बढ़ रहा है।

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किताबें तो खरीद लाए पर पढ़ने का नहीं हुआ मन, जानिए कैसे मोटिवेशन से गिल्ट तक पहुंच जाती है ये आदत (Photo: iStock)

क्या आपके घर में भी ऐसी कई किताबें रखी हैं जिन्हें आपने कभी खोला तक नहीं है? यह सिर्फ आपकी अकेली की समस्या नहीं है। दुनिया भर में अनगिनत लोग खुद को बेहतर बनाने, नई आदतें सीखने या प्रेरित होने की उम्मीद में किताबें खरीद तो लेते हैं, लेकिन वे अलमारी की शोभा बनकर रह जाती हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इसके पीछे एक गहरा मानसिक चक्र काम करता है।

किताब खरीदने से मिलती है संतुष्टि

जब हम सेल्फ-हेल्प या किसी प्रेरणादायक किताब को खरीदते हैं, तो हमारा मस्तिष्क एक अजीब सी खुशी महसूस करता है। हमें ऐसा लगता है कि जैसे ही हमने किताब खरीदी, हमने उस समस्या का समाधान भी पा लिया। यह तात्कालिक संतुष्टि हमें उस पल के लिए एक बेहतर इंसान होने का अहसास कराती है, भले ही हमने उसका एक पन्ना भी न पढ़ा हो।

इसके अलावा, किताबें खरीदते समय हम भविष्य के एक आदर्श संस्करण की कल्पना करते हैं। हमें लगता है कि इस किताब को पढ़कर हम अनुशासित, ज्ञानी या अधिक प्रोडक्टिव बन जाएंगे। लेकिन असल जिंदगी की व्यस्तताएं और ऊर्जा की कमी के चलते वह आदर्श कल्पना हकीकत में नहीं बदल पाती और किताबें सिर्फ कलेक्शन बनकर रह जाती हैं।

क्या कहती है जापानी फिलॉस्फी

बिना पढ़े किताबें जमा करने की इस प्रवृत्ति को जापानी संस्कृति में 'सुइयोनिच' कहा जाता है। इसका अर्थ है पढ़ने की नीयत से किताबें खरीदना और उन्हें घर में ढेर के रूप में इकट्ठा करते जाना। यह एक आम ह्यूमन बिहेवियर है, जो ज्ञान प्राप्त करने की हमारी आंतरिक इच्छा को दर्शाती है।

जो किताबें प्रेरणा के रूप में खरीदी जाती हैं, वे समय के साथ मानसिक अपराधबोध का कारण बनने लगती हैं। जब भी नजर उन धूल फांकती किताबों पर पड़ती है, तो एक अधूरापन और खुद से असंतोष महसूस होता है। यह गिल्ट इस बात की याद दिलाता है कि हमने अपने तय किए गए लक्ष्यों को पूरा नहीं किया है।

कई बार लोग सिर्फ किताबें इकट्ठा करने के शौकीन होते हैं। उन्हें ऐसा भ्रम होता है कि घर में अच्छी और बड़ी किताबें होने मात्र से उनका बौद्धिक स्तर बढ़ रहा है। इसे 'कलेक्टर का भ्रम' कहा जाता है, जहां किताबों के स्वामित्व को ज्ञान प्राप्ति के बराबर मान लिया जाता है।

ई-कॉमर्स वेबसाइट्स और ऑनलाइन सेल्स ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा दिया है। एक क्लिक पर किताबें आसानी से घर पहुंच जाती हैं, जिससे इन्हें खरीदने की प्रक्रिया बहुत सरल हो गई है। बिना सोचे-समझे की गई यह खरीदारी बाद में बिना पढ़ी किताबों के अंबार में बदल जाती है।

इस मानसिक चक्र से कैसे बाहर निकलें?

इस अपराधबोध से बचने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि नई किताबें खरीदने से पहले घर में मौजूद उन किताबों को पढ़ें जो पहले से शेल्फ में रखी हैं। एक समय में एक ही किताब पढ़ने का लक्ष्य रखें और अपनी पढ़ने की वास्तविक क्षमता को पहचानकर ही खरीदारी करें।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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