बहुत से पेरेंट्स की समस्या है कि बच्चों को किसी चीज के लिए ना या मना करना उनके लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है। दरअसल कई बार ना सुनने के बाद बच्चा रोने लगता है, गुस्सा करता है या जिद पकड़ लेता है तो कई माता-पिता अपना फैसला बदल देते हैं। लगता है कि बच्चे को परेशान करने से अच्छा है कि उसकी बात मान ली जाए। ये भूल जाते हैं कि हर बार बच्चे की नाराजगी से बचने के लिए ‘ना’ को ‘हां’ में बदल देना सही तरीका नहीं है। बच्चों के लिए सीमाएं तय करना उनके भावनात्मक विकास का भी हिस्सा है।
बच्चे का नाराज होना हमेशा गलत नहीं
बच्चे का ‘नहीं’ सुनकर दुखी या नाराज होना स्वाभाविक है। शोध बताते हैं कि बच्चों को उचित सीमाओं का अनुभव होने से वे धीरे-धीरे निराशा और अपनी भावनाओं को संभालना सीखते हैं। भावनात्मक नियंत्रण का मतलब यह नहीं कि बच्चा कभी गुस्सा या दुख महसूस न करे। इसका मतलब है कि वह इन भावनाओं को समझे और समय के साथ उन्हें संभालना सीखे।
ना कहें तो साफ और शांत तरीके से
जब बच्चे से किसी बात के लिए मना करना हो तो अपनी बात स्पष्ट रखें। ऐसा न कहें कि शायद बाद में या अभी नहीं, अगर आपका फैसला वास्तव में ‘नहीं’ है। उदाहरण के लिए, बच्चा चॉकलेट खरीदने की जिद करे तो साफ कहें कि आज चॉकलेट नहीं खरीदेंगे।
साथ ही बच्चे की भावना को भी समझें। आप कह सकते हैं, ‘मैं समझ सकता हूं कि तुम्हें बुरा लग रहा है, क्योंकि तुम्हें चॉकलेट चाहिए थी।’ इसके बाद अपनी सीमा पर कायम रहें। इससे बच्चे को यह संदेश मिलता है कि उसकी भावना गलत नहीं है, लेकिन हर इच्छा पूरी होना भी जरूरी नहीं है।
बार-बार मना करके फिर मान जाना ठीक नहीं
अगर बच्चा लगातार जिद करे और माता-पिता आखिर में अपना फैसला बदल दें, तो बच्चा एक पैटर्न सीख सकता है। उसे लग सकता है कि ज्यादा देर तक जिद करने पर जवाब बदल सकता है। इसलिए अगर किसी बात के लिए ‘ना’ कहा है तो उस फैसले पर कायम रहना जरूरी है।
खुद अपने गुस्से को संभालें
बच्चे भावनाओं को सिर्फ समझाने से नहीं, देखकर भी सीखते हैं। इसलिए जब आपको गुस्सा आए तो बच्चे के सामने खुद को शांत करने की कोशिश करें। गहरी सांस लेना या कुछ देर रुकना उन्हें दिखाता है कि गुस्से में भी खुद को संभाला जा सकता है।
अगर बच्चा रो रहा है या टैंट्रम कर रहा है तो तुरंत गुस्से में प्रतिक्रिया देने के बजाय शांत रहें। उसके पास बैठकर कह सकते हैं, ‘मुझे पता है कि तुम परेशान हो, लेकिन अब हमें घर जाना है।’ इस तरह आप बच्चे की भावना को स्वीकार करते हैं, लेकिन अपनी सीमा भी बनाए रखते हैं।
खेल-खेल में सिखाएं भावनाएं संभालना
बच्चों के साथ खिलौनों या कहानी के जरिए ऐसी परिस्थितियों की एक्टिंग भी की जा सकती है, जहां उन्हें ‘ना’ सुनना पड़े। इससे वे निराशा, गुस्से और इंतजार जैसी भावनाओं को शब्दों में समझना सीख सकते हैं।
साथ ही जब बच्चा किसी मुश्किल स्थिति में खुद को संभाल ले तो उसकी तारीफ करें। छोटी-सी कोशिश पर दिया गया सकारात्मक प्रोत्साहन उसे उस व्यवहार को दोहराने के लिए प्रेरित कर सकता है।
सबसे जरूरी बात यह है कि छोटे बच्चे हर बार ‘ना’ को बिना रोए स्वीकार कर लें, ऐसी उम्मीद करना भी ठीक नहीं। उनकी भावनात्मक समझ और खुद पर नियंत्रण की क्षमता अभी विकसित हो रही होती है। इसलिए अचानक किसी पसंदीदा काम को रोकने के बजाय पहले से चेतावनी देना बेहतर है। जैसे, खेल खत्म करने से पांच मिनट पहले बता दें कि अब घर जाने का समय होने वाला है।
आखिरकार, बच्चे को ‘ना’ कहना उसे सिर्फ किसी चीज से रोकना नहीं है। सही तरीके से कही गई ‘ना’ उसे यह सीख देती है कि निराश होना जिंदगी का हिस्सा है और थोड़ी देर परेशान होने के बाद भी खुद को संभालकर आगे बढ़ा जा सकता है।
