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'इंदु जी क्या हुआ आपको, भूल गई बाप को..', इमरजेंसी के दौरान खूब चर्चा में रही नागार्जुन की ये कविता

जनकवि नागार्जुन अपने विचारों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध थे। सत्ता, नेता या अफसर किसी का भय उन्हें नहीं था। जहां मौका मिलता, मंच हो या सड़क, वे अपनी बात बिना लाग-लपेट के कह देते थे।

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25 जनवरी 1975 को इंदिरा गांधी ने देशभर में इमरजेंसी लगा दी थी।

Nagarjun Poem Against Emergency: 25 जून 1975 भारतीय राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण तारीख के तौर पर दर्ज है। यही वह तारीख है जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्देश पर देशभर में इमरजेंसी लगा दी गई थी। उसी इमरजेंसी के दौर में बेहद कमाल के कवि नागार्जुन जनकवि के तौर पर उभरे। इमरजेंसी और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलनों में उनकी भूमिका को लेकर अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन उन्हें करीब से जानने वाले मानते हैं कि वे अपने विचारों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध थे। सत्ता, नेता या अफसर किसी का भय उन्हें नहीं था। जहां मौका मिलता, मंच हो या सड़क, वे अपनी बात बिना लाग-लपेट के कह देते थे।

जेपी आंदोलन और इंदिरा सरकार की मनमानी के बीच पटना के कदमकुआं के किसी साहित्य सम्मेलन में तमाम वक्ताओं के बीच बैठे जनकवि बाबा नागार्जुन ने जब माइख संभाला तो ऐसी कविता पढ़ डाली जो हमेशा के लिए उनकी पहचान बन गई। आप भी पढ़े वो कविता:

इंदु जी क्या हुआ आपको?

इंदु जी क्या हुआ आपको?

सत्ता की मस्ती में

भूल गई बाप को?

इन्दु जी, इन्दु जी, क्या हुआ आपको?

बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!

क्या हुआ आपको?

क्या हुआ आपको?

आपकी चाल-ढाल देख- देख लोग हैं दंग

हकूमती नशे का वाह-वाह कैसा चढ़ा रंग

सच-सच बताओ भी

क्या हुआ आपको

यों भला भूल गईं बाप को!

छात्रों के लहू का चस्का लगा आपको

काले चिकने माल का मस्का लगा आपको

किसी ने टोका तो ठस्का लगा आपको

अन्ट-शन्ट बक रही जनून में

शासन का नशा घुला ख़ून में

फूल से भी हल्का

समझ लिया आपने हत्या के पाप को

इन्दु जी, क्या हुआ आपको

बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!

बचपन में गांधी के पास रहीं

तरुणाई में टैगोर के पास रहीं

अब क्यों उलट दिया 'संगत' की छाप को?

क्या हुआ आपको, क्या हुआ आपको

बेटे को याद रखा, भूल गई बाप को

इन्दु जी, इन्दु जी, इन्दु जी, इन्दु जी...

रानी महारानी आप

नवाबों की नानी आप

नफ़ाख़ोर सेठों की अपनी सगी माई आप

काले बाज़ार की कीचड़ आप, काई आप

सुन रहीं गिन रहीं

गिन रहीं सुन रहीं

सुन रहीं सुन रहीं

गिन रहीं गिन रहीं

हिटलर के घोड़े की एक-एक टाप को

एक-एक टाप को, एक-एक टाप को

सुन रहीं गिन रहीं

एक-एक टाप को

हिटलर के घोड़े की, हिटलर के घोड़े की

एक-एक टाप को...

छात्रों के ख़ून का नशा चढ़ा आपको

यही हुआ आपको

यही हुआ आपको

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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