Sep 09, 2026
आज रविवार आते ही दिमाग अपने आप कहता है, आराम का दिन! लेकिन पुराने समय में भारतीय मजदूरों के लिए रविवार कोई खास दिन नहीं था। कई मिल मजदूरों को सप्ताह के सातों दिन काम करना पड़ता था।
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लगातार काम करने से मजदूरों के पास आराम और परिवार के लिए समय ही नहीं बचता था। ऐसे में काम के बीच कम से कम एक दिन का ब्रेक मिलना जरूरी समझा जाने लगा।
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रविवार की छुट्टी का इतिहास खास तौर पर मुंबई की कपड़ा मिलों के मजदूरों से जुड़ा है। उस दौर में मील में बड़ी संख्या में लोग काम करते थे और काम के घंटे भी काफी लंबे होते थे।
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मजदूर नेता नारायण मेघाजी लोखंडे ने कामगारों की इस परेशानी को गंभीरता से उठाया। उन्होंने सिर्फ अपनी बात नहीं रखी, बल्कि मजदूरों को साथ लेकर साप्ताहिक छुट्टी की मांग को आंदोलन का रूप दिया।
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लोखंडे मजदूरों के लिए बेहतर कामकाजी व्यवस्था चाहते थे। उनकी मांगों में साप्ताहिक अवकाश के अलावा रोजाना आराम का समय और काम के निश्चित घंटों जैसी बातें भी शामिल थीं।
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24 अप्रैल 1890 को मुंबई के महालक्ष्मी रेसकोर्स में करीब 10 हजार मजदूरों की बड़ी सभा हुई। इस जुटान ने दिखाया कि कामगार अपनी मांगों को लेकर कितनी मजबूती से एकजुट हो सकते हैं।
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आखिरकार 10 जून 1890 को रविवार को साप्ताहिक छुट्टी देने का फैसला हुआ। यही तारीख भारत में मजदूरों के लिए रविवार के अवकाश के इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
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आज हमें रविवार की छुट्टी बिल्कुल सामान्य लगती है, लेकिन इसके पीछे कामगारों की आवाज और लंबा संघर्ष था। आराम का एक दिन भी कभी मजदूरों के लिए हासिल किया गया अधिकार था।
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आज संडे का मतलब नींद पूरी करना, परिवार के साथ समय बिताना या दोस्तों से मिलना हो सकता है। लेकिन इस आराम के पीछे मजदूरों की मेहनत और अपने अधिकार के लिए खड़ी हुई एक पूरी कहानी छिपी है।
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