Harmful effect of Crackers Smoke: दिवाली की रात पटाखे जलाए, खूब आतिशबाजी हुई और अगली सुबह उठे तो आसमान में धुआं पहले से कम नजर आया। सड़कों पर भी सफाई हो चुकी थी। आपको लगा होगा कि चलो, अब प्रदूषण भी कम हो गया होगा। लेकिन जरा ठहरिए! क्या वाकई ऐसा है?
अगर आपको लगता है कि पटाखों का धुआं छंटने के साथ उसका प्रदूषण भी खत्म हो जाता है, तो आप गलत हैं। असल चिंता तो इसके बाद शुरू होती है। पटाखे जलने पर जो बारीक कण और रासायनिक तत्व निकलते हैं, वे सिर्फ हवा में नहीं रहते। इनका कुछ हिस्सा जमीन पर गिरता है, मिट्टी में मिलता है और बारिश या सफाई के पानी के साथ नालों, तालाबों और नदियों तक पहुंच सकता है।
यानी जिस प्रदूषण को हम आंखों से देखना बंद कर देते हैं, वह पर्यावरण में अपना असर छोड़ता रह सकता है। हवा, मिट्टी और पानी तीनों इसकी चपेट में आ सकते हैं। आइए समझते हैं कि आखिर पटाखे जलाने के बाद प्रदूषण का सफर कहां-कहां तक पहुंचता है।
धुआं छंट गया, लेकिन हवा में क्या-क्या रह गया
पटाखे जलने के बाद धुआं तो दिखाई देता है, लेकिन उसके साथ निकले सभी प्रदूषक हमारी आंखों को नजर नहीं आते। इनमें PM2.5 और PM10 जैसे बेहद छोटे कण भी शामिल होते हैं।
अब PM2.5 को ही समझ लीजिए। ये इतने बारीक होते हैं कि सांस के साथ फेफड़ों के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंच सकते हैं। PM10 आकार में इनसे बड़े होते हैं, लेकिन ये भी श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा पटाखों में इस्तेमाल होने वाले रसायनों और धातुओं के सूक्ष्म कण भी हवा में फैलते हैं। सल्फर डाइऑक्साइड जैसी गैसें भी वायु गुणवत्ता को खराब कर सकती हैं।
मुश्किल यह है कि धुआं दिखाई देना बंद हो सकता है, लेकिन हवा में मौजूद बारीक कण तुरंत गायब नहीं होते। कुछ कण धीरे-धीरे जमीन पर बैठ जाते हैं, तो कुछ मौसम और हवा की गति के हिसाब से वातावरण में बने रह सकते हैं। इसलिए अगली सुबह आसमान साफ दिखने पर राहत की सांस लेना जल्दबाजी हो सकती है। हवा में प्रदूषण का स्तर जानने के लिए AQI और प्रदूषकों की वास्तविक मात्रा देखना जरूरी है।
पटाखों की राख के साथ जमीन पर क्या-क्या पहुंचता है
अब जरा उस राख और कचरे के बारे में सोचिए जो दिवाली के बाद सड़कों, पार्कों और घरों के आसपास दिखाई देता है। हम अक्सर इसे सामान्य कचरा समझकर साफ कर देते हैं। लेकिन पटाखों के जले हुए अवशेषों में सिर्फ कागज और बारूद नहीं होता।
पटाखों में अलग-अलग रंग और प्रभाव पैदा करने के लिए बेरियम, स्ट्रॉन्शियम, कॉपर, एल्युमिनियम, पोटैशियम और एंटीमनी जैसे तत्व इस्तेमाल किए जा सकते हैं। पटाखे फूटने के बाद इनका कुछ हिस्सा हवा में फैलता है और कुछ राख या छोटे कणों के रूप में जमीन पर जमा हो जाता है।
अब सवाल है कि सफाई होने के बाद क्या ये सारे रासायनिक अवशेष भी हट जाते हैं? जरूरी नहीं! दरअसल ये कुछ कण मिट्टी में मिल जाते हैं। कुछ उसकी ऊपरी परत में जमा रह सकते हैं। खासकर उन जगहों पर जहां बड़े पैमाने पर आतिशबाजी होती है, वहां ऐसे अवशेषों के जमा होने की आशंका बढ़ जाती है।
मिट्टी की सेहत भी बिगाड़ सकते हैं पटाखों के रसायन
हम अक्सर मिट्टी के प्रदूषण पर बात नहीं करते। हवा खराब हो तो सांस लेने में परेशानी होती है और पानी गंदा हो तो वह दिखाई देने लगता है। लेकिन मिट्टी के भीतर होने वाले बदलाव आसानी से नजर नहीं आते।
मिट्टी में कई तरह के सूक्ष्म जीव और बैक्टीरिया होते हैं। ये उसकी उर्वरता बनाए रखने में मदद करते हैं। पटाखों से निकले मेटल पार्टिकल्स की अधिक मात्रा में मिट्टी में जमा होने से इन सूक्ष्म जीवों की गतिविधियों और यहां तक कि पौधों की ग्रोथ पर भी असर पड़ सकता है।
एक और चिंता परक्लोरेट (Perchlorate) जैसे रसायनों को लेकर भी है। इसका इस्तेमाल कुछ पटाखों में ऑक्सीडाइजर के रूप में किया जाता है। यह पानी में आसानी से घुल सकता है और मिट्टी से बहकर दूसरे स्थानों तक पहुंच सकता है।
केरल में आतिशबाजी के बाद मिट्टी और पानी के नमूनों पर किए गए एक अध्ययन में परक्लोरेट के अवशेष मिले थे। अध्ययन में मिट्टी में इसकी मात्रा आतिशबाजी के तीसरे दिन सबसे अधिक दर्ज की गई। यानी पटाखे जलाने के बाद सिर्फ कुछ घंटे नहीं, बल्कि उसके बाद के दिनों में भी पर्यावरण में रासायनिक अवशेष मौजूद रह सकते हैं।
पटाखों का प्रदूषण पानी तक कैसे पहुंच जाता है
यह बात शायद आपको हैरान करे, लेकिन पटाखों से निकले रसायन पानी को भी प्रभावित कर सकते हैं। दिवाली के अगले दिन घरों और सड़कों की सफाई होती है। कई जगह पानी डालकर पटाखों की राख और अवशेष बहा दिए जाते हैं। बारिश होने पर भी जमीन पर जमा कचरा बहकर नालियों और जलस्रोतों तक पहुंच सकता है।
यहीं से परेशानी बढ़ती है। राख, धातुओं के कण और पानी में घुलने वाले रसायन नालों, तालाबों और नदियों तक पहुंच सकते हैं। परक्लोरेट जैसे रसायन पानी में घुल सकते हैं। वहीं कॉपर, जिंक, लेड और एंटीमनी जैसे धातु तत्व भी जलस्रोतों में पहुंच सकते हैं।
इसका एक उदाहरण साल 2025 में सामने आए न्यूयॉर्क के एक अध्ययन में देखने को मिला। जुलाई में हुई आतिशबाजी के बाद शोधकर्ताओं ने ईस्ट रिवर के पानी के नमूनों की जांच की। इसके नतीजों में जिंक, लेड, एंटीमनी और कॉपर की मात्रा आतिशबाजी के बाद पहले की तुलना में दोगुनी अधिक पाई गई।
माना कि यह अध्ययन एक खास जगह और घटना से जुड़ा है। और हर जगह इसका असर एक जैसा हो, यह जरूरी नहीं। लेकिन इससे इतना जरूर समझ आता है कि आतिशबाजी का असर सिर्फ आसमान में फैलने वाले धुएं तक सीमित नहीं रहता। बल्कि यह काफी आगे तक परेशान करता है।
पानी में रहने वाले जीवों के लिए भी बढ़ सकती है परेशानी
जरा सोचिए, अगर पटाखों के रासायनिक अवशेष किसी तालाब या नदी में पहुंच जाएं तो वहां रहने वाली मछलियों और दूसरे जलीय जीवों पर क्या असर होगा? इसके कुछ धातु तत्व अधिक मात्रा में मौजूद हों तो जलीय जीवों के विकास, प्रजनन और सामान्य बायोलॉजिकल एक्टिविटीज को भी प्रभावित कर सकते हैं।
कुछ प्रदूषक जीवों के शरीर में जमा भी हो सकते हैं। फिर खाद्य श्रृंखला के जरिए उनका असर दूसरे जीवों तक पहुंचने की आशंका रहती है। सबसे बड़ी बात यह है कि पानी का साफ दिखाई देना उसके प्रदूषण मुक्त होने की गारंटी नहीं है। कई बार पानी में मौजूद रासायनिक तत्वों का पता सामान्य आंखों से नहीं लगाया जा सकता। इसके लिए जांच की जरूरत होती है।
क्या बारिश पटाखों का सारा प्रदूषण धोकर साफ कर देती है
अक्सर कहा जाता है कि बारिश हो जाए तो हवा साफ हो जाती है। यह बात कुछ हद तक सही है, लेकिन पूरी तस्वीर नहीं है। बारिश हवा में मौजूद कुछ प्रदूषक कणों को नीचे जमीन पर ला सकती है। इससे हवा में उनकी मात्रा कम हो सकती है। लेकिन सवाल है कि जो कण हवा से नीचे आए, वे गए कहां?
उनमें से कुछ जमीन पर जमा हो जाते हैं। कुछ बारिश के पानी के साथ नालियों और जलस्रोतों तक पहुंच सकते हैं। यानी प्रदूषण खत्म होने के बजाय एक जगह से दूसरी जगह पहुंच सकता है। इसलिए बारिश को पटाखों से होने वाले प्रदूषण का स्थायी समाधान समझना ठीक नहीं होगा।
आखिर कितने दिनों तक बना रह सकता है पटाखों का प्रदूषण
इसका कोई एक जवाब नहीं है। हर प्रदूषक का व्यवहार अलग होता है। हवा में मौजूद कुछ कण कुछ घंटों या दिनों में कम हो सकते हैं। वहीं मौसम और वातावरण की परिस्थितियों के आधार पर कुछ महीन कण लंबे समय तक मौजूद रह सकते हैं।
2016 में प्रकाशित एक वैज्ञानिक समीक्षा में बताया गया था कि कुछ परिस्थितियों में आतिशबाजी से निकले कण एक महीने तक हवा में निलंबित रह सकते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर शहर में हर बार पटाखे जलाने के बाद प्रदूषण एक महीने तक बना रहेगा। मिट्टी और पानी में पहुंचे रासायनिक तत्वों के खत्म होने की अवधि भी अलग-अलग हो सकती है। यह उनकी प्रकृति, मात्रा और आसपास के पर्यावरण पर निर्भर करती है।
पटाखे जलाने के बाद इन बातों का भी रखें ध्यान
अब सवाल है कि हम क्या कर सकते हैं? सिर्फ पटाखे जलाने के बाद सड़क साफ कर देना काफी नहीं है। यह भी देखना होगा कि उनका कचरा कहां जा रहा है।
- पटाखों की राख और जले हुए अवशेषों को इधर-उधर न छोड़ें।
- पटाखों का कचरा नालियों या जलस्रोतों में न बहाएं।
- राख और अवशेषों को इकट्ठा करके स्थानीय कचरा निपटान व्यवस्था के अनुसार हटाएं।
- खेती वाली जगह और जलस्रोतों के आसपास आतिशबाजी करने से बचें।
- बच्चों और पालतू जानवरों को पटाखों के अवशेषों से दूर रखें।
जहां संभव हो, पटाखों की जगह दीये और रोशनी से त्योहार मनाएं।
धुआं गायब का मतलब प्रदूषण खत्म होना नहीं
दिवाली पर रोशनी और खुशियां बांटना अच्छी बात है। लेकिन क्या कुछ मिनटों की आतिशबाजी के बाद पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को नजरअंदाज कर देना सही है?
हम अक्सर प्रदूषण को तभी गंभीरता से लेते हैं, जब आसमान धुंधला दिखता है, आंखों में जलन होती है या सांस लेने में परेशानी होने लगती है। लेकिन पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कई प्रदूषक ऐसे होते हैं, जिन्हें हम देख तक नहीं सकते। पटाखों का धुआं छंटने के बाद भी बारीक कण हवा में रह सकते हैं। रासायनिक अवशेष मिट्टी में जमा हो सकते हैं और पानी के साथ दूसरे जलस्रोतों तक पहुंच सकते हैं।
इसलिए अगली बार जब दिवाली की सुबह आपको आसमान साफ दिखाई दे, तो यह मानकर न चलें कि सब कुछ ठीक हो गया है। हो सकता है धुआं हमारी आंखों से ओझल हो गया हो, लेकिन उसका असर अभी भी हमारे आसपास मौजूद हो। यही इस प्रदूषण की सबसे चिंताजनक बात है।
