दिल्ली में चल रहा कॉकरोच जनता पार्टी का प्रोटेस्ट लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। बड़ी तादाद में युवा इस आंदोलन से जुड़ रहे हैं। आंदोलन में कई तो ऐसे हैं जो अभी बालिग भी नहीं हुए हैं। मीडिया और सोशल मीडिया में इस आंदोलन से जुड़े जो वीडियोज आए हैं उनमें इस तरह की बातें भी सामने आई हैं कि बहुत से बच्चे और वयस्क अपने माता-पिता से बिना पूछे या फिर उनसे छिपाकर प्रोटेस्ट में शामिल हुए हैं। कुछ का कहना है कि उनके परिवार वाले यहां आने की इजाजत कभी नहीं देते, इसलिए बिना बताए आ गए हैं।
अब यहां सवाल उठता है कि बच्चों और पेरेंट्स में ये कम्युनिकेशन गैप कहां से आया। आखिर क्यों बच्चों को लगता है कि अगर वो अपने पापा-मम्मी से किसी प्रोटेस्ट में जाने को कहेंगे तो वो मना कर देंगे। ऐसे में ये हर माता-पिता को ये जानना जरूरी है कि अगर उनका बच्चा, भले ही वो वयस्क हो या किशोर, किसी आंदोलन का हिस्सा बनना चाहता है तो वो उसे कैसे गाइड करें।
बच्चा प्रोटेस्ट में जाने को कहे तो क्या करें पेरेंट्ंस
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के रिसर्च स्कॉलर इंद्र बहादुर यादव कहते हैं कि भारतीय समाज में ज्यादातर अभिभावक नहीं चाहते कि उनका बच्चा पढ़ने-लिखने की उम्र में किसी आंदोलन या प्रोटेस्ट का हिस्सा बने। उन्हें लगता है कि बच्चे को इन सब में नहीं पड़ना चाहिए। इसी कारण बच्चों में भी ये आम धारणा बन गई है कि घरवालों से पूछेंगे तो वो मना ही करेंगे।
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अपने साथ काम करने वाले एक साथी पत्रकार से जब मैंने पूछा कि क्या आप अपने बच्चे को किसी प्रोटेस्ट में शामिल होने की इजाजत देंगे? उनका जवाब था कि अगर वो वयस्क है तो खुद से तय करे कि उसके लिए क्या सही है और क्या गलत। हां अगर मुझे लगेगा कि उसका फैसला गलत है या उसे खुद अपने फैसले पर पूरा भरोसा नहीं हो रहा है तो मैं उसे गाइड करूंगा। उसे समझाने की कोशिश करूंगा कि क्यों उसे उस प्रोटेस्ट का हिस्सा बनना चाहिए या क्यों नहीं बनना चाहिए।

दिल्ली में जंतर मंतर पर चल रहे प्रोटेस्ट की फाइल फोटो (PTI)
बच्चों से पूछें ये सवाल
आलोक कुमार केंद्रीय विद्यालय में अर्थशास्त्र के टीचर और दो बच्चों के पिता हैं। उनका मानना है कि बच्चों को किसी भी बात के लिए साफ मना करने से पहले उससे कुछ बातें जरूर पूछनी चाहिए। उनसे पूछें कि क्या तुम वहां अपनी मर्जी से जाना चाहते हो या फिर किसी दोस्त या सोशल मीडिया के प्रभाव में आकर ये फैसला ले रहे हो। पहले उनकी बात को सुनें, समझें और तब मना करें या अनुमति दें। बिना उनका पक्ष जाने उन्हें ना बोल देना बच्चे को आपसे भावनात्मक रूप से दूर करने लगता है।
मशहूर मनोवैज्ञानिक डॉ. लिसा डैमूर भी अपनी किताब अनटैंजल्ड (Untangled) में इसी बात को कुछ यूं समझाती हैं कि बच्चों की हर असहमति को बदतमीजी मान लेना उनके व्यक्तित्व के विकास को सीमित कर सकता है। बेहतर यह है कि माता-पिता उनकी बातों को सुने, विचारों को समझे और फिर उनके साथ तथ्यों पर चर्चा करें।
पेरेंटिंग एक्सपर्ट डॉ. मिशेल बोरबा, अपनी चर्चित किताब थ्राइवर्स में लिखती हैं कि समझदार माता-पिता वो होते हैं जो अपने बच्चों से सही सवाल पूछना जानते हैं। सही सवालों से ही पेरेट्स बच्चों की सोच, समझ और प्रेरणा का पता लगा सकते हैं।
तो अगर बच्चा किसी प्रोटेस्ट में शामिल होने के लिए आपसे पूछे तो बतौर अभिभावक आपका फर्ज बनता है कि आप उससे पूछें कि तुम इस प्रोटेस्ट के बारे में कितना कुछ जानते समझते हो? या तुम वहां जाकर क्या करना चाहते हो? हो सकता है वह सिर्फ दोस्तों के साथ जाना चाहता हो और ये भी हो सकता है कि वह सचमुच किसी सामाजिक मुद्दे को लेकर संवेदनशील हो।
बच्चों की राय जानना क्यों है जरूरी
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के रिसर्च स्कॉलर इंद्र बहादुर यादव कहते हैं कि अभिभावकों की जिम्मेदारी बनती है कि किसी भी आंदोलन में शामिल होने से पहले बच्चे को उस मुद्दे के अलग-अलग पक्ष पढ़ने के लिए कहें। केवल सोशल मीडिया या अपने आसपास के लोगों से सुनी बातों के आधार पर राय बनाना सही नहीं है। उसे विश्वसनीय समाचार स्रोतों और विभिन्न दृष्टिकोणों को पढ़ने के लिए प्रेरित करें। इससे उसकी क्रिटिकल थिंकिंग भी विकसित होगी।
यहां चाइल्ड डेवलपमेंट एक्सपर्ट डॉ. डैनियल सीगल की उस अहम बात का जिक्र भी जरूरी है जो उन्होंने अपनी प्रसिद्ध किताब द होल ब्रेन चाइल्ड (The Whole Brain Child) में लिखा है। वो कहते हैं कि हमें कोई भी फैसला बच्चे की उम्र, उसकी भावनात्मक परिपक्वता और परिस्थिति के हिसाब से लिया जाना चाहिए। अगर बच्चा 10 साल का है, तो वही फैसला उचित नहीं होगा जो 17 साल के समझदार किशोर के लिए हो सकता है।
तो पेरेंट्स को यहां ये भी समझना होगा कि हर बच्चा समान रूप से परिपक्व नहीं होता। छोटे बच्चों का किसी भी तरह के प्रदर्शन में जाना उचित नहीं है। वहीं 17-18 साल के बच्चे अगर विषय को समझते हैं और जिम्मेदारी से व्यवहार कर सकते हैं, तो उनके साथ खुलकर बात करें और तब कोई फैसला लें।
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बच्चा प्रोटेस्ट में जाए तो उसे सुरक्षा का पाठ जरूर पढ़ाएं
जैसा कि हम सबने देखा कि किस तरह से दिल्ली के जंतर मंतर पर चल रहे आंदोलन में माहौल बिगड़ा और सुरक्षाबलों को लाठी चार्ज करना पड़ा। इस लाठीचार्ज में कई बच्चे बुरी तरह घायल हो गए।
ऐसे में बच्चा अगर किसी प्रोटेस्ट का हिस्सा बन रहा है तो उसे बताना जरूरी है कि वह खुद को कैसे सुरक्षित रखे। यूपी पुलिस में कोतवाल के पद से रिटायर उमाशंकर पांडे ने बताया कि अगर बच्चे किसी प्रोटेस्ट का हिस्सा बन रहे हैं तो इन बातों का जरूर ध्यान रखें:
- प्रोटेस्ट में किसी भी हिंसक या तनावपूर्ण स्थिति से तुरंत दूर हो जाए।
- किसी के भी उकसावे में आकर अफवाह फैलाने या तोड़फोड़ करने में भागीदार न बने।
- अगर माहौल बिगड़ता दिखे, तो बहादुरी दिखाने के बजाय वहां से निकल जाने में ही समझदारी है।
- अगर उसे किसी भी पल लगे कि उसे यहां से चले जाना चाहिए तो वह चला जाए, दोस्तों या अपने ग्रुप के चक्कर में ना पड़े।

किसी भी आंदोलन में जाने से पहले बच्चों को जरूर सिखाएं ये सेफ्टी रूल्स (PTI)
उमाशंकर पांडे कहते हैं कि माता-पिता अपने बच्चों को जरूर बताएं कि ये सारे नियम उन्हें डराने के लिए नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनने और खुद को सुरक्षित रखने के लिए हैं।
बच्चों के लिए बनें जिम्मेदार पेरेंट
ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक सर केन रॉबिन्सन कहा करते थे कि शिक्षा का उद्देश्य बच्चों के दिमाग को भरना नहीं, उन्हें सोचने के काबिल बनाना है। यही बात घर पर होने वाली परवरिश पर भी लागू होती है। जरूरी नहीं बच्चा हर मुद्दे पर आपकी राय से सहमत हो। अगर आपने उसे सही तथ्य खंगालना, सवाल पूछना, विरोध का सम्मान करना और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना सिखा दिया, तो आपने अपनी जिम्मेदारी निभा दी।
वैसे भी बच्चे लोकतंत्र का पहला सबक अपने घर से ही सीखते हैं। अगर घर में सवाल पूछने की आजादी नहीं होगी, तो समाज में भी वे सवाल पूछने से डरेंगे। अगर घर में हर असहमति को विद्रोह समझा जाएगा, तो वे अपनी जिज्ञासा दबाना सीख जाएंगे।
इसका ये कतई मतलब नहीं है कि किसी भी तरह के प्रोटेस्ट में बच्चे को जाने दिया जाए। सही मायने में एक समझदार अभिभावक का काम सिर्फ अनुमति देना या रोकना नहीं है। बच्चे को तथ्यों के आधार पर सोचने, जिम्मेदारी से निर्णय लेने और सुरक्षित रहने की सीख देना है। यही सीख आगे चलकर उसे एक जागरूक और जिम्मेदार नागरिक बनने में मदद भी करेगी।
