India's First Superfast Train: भारतीय रेलवे दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेलवे नेटवर्क संचालित करती है। इस नेटवर्क में जहं साधारण, ट्रेंने चलती हैं वहीं वंदे भारत और शताब्दी जैसी हाई स्पीड ट्रेनें भी। वहीं, रेलवे द्वारा चलाई जाने वाली ट्रेंनो में कई ऐसी भी हैं, जिन्हें सुपरफास्ट का दर्जा मिला है। आज हम ऐसी ही एक ट्रेन के बारे में जानेंगे जो 96 साल से लगातार पटरियों पर दौड़ रही है। आज हम आपको बताएंगे भारत की पहली सुपरफास्ट ट्रेन के बारे में... वो कौन सी थी और यह कहां से कहां तक चलती है, साथ ही इसे कब शुरू किया गया था। आज हम आपको इसी ट्रेन के बारे में बताएंगे....
1930 में की गई थी शुरू
भारत में रेलवे का एक बड़ा नेटवर्क है, जिसके जरिए यात्री देश के एक कोने से दूसरे कोने में जाते हैं। इस विशाल रेलवे नेटवर्क में आज वंदे भारत, वंदे भारत स्लीपर, शताब्दी और राजधानी जैसी हाई स्पीड और बेहद लग्जरी ट्रेनें चल रही हैं और बुलेट और हाईड्रोजन ट्रेन चलाने की दिशा में काम हो रहा है, लेकिन शायद आप यह जानकर चौंक जाएं कि आज से करीब 96 साल पहले 1930 में भारत में एक ऐसी ट्रेन चलाई गई जिसे देश की पहली सुपरफास्ट ट्रेन का खिताब हासिल है।
देश की पहली डीलक्स ट्रेन भी
देश की पहली सुपरफास्ट ट्रेन का नाम डेक्कन क्वीन है, जिसे ट्रेन की रानी भी कहा जाता है। एक जून 1930 को शुरू की गई डेक्कन क्वीन भारत की पहली डीलक्स ट्रेन भी है। अंग्रेजों के जमाने में इसकी शुरुआत मुंबई और पुणे के बीच की गई थी। उस समय पुणे को डेक्कन (दक्कन) के नाम से जाना जाता था, इसीलिए इस ट्रेन का नाम डेक्कन क्वीन या दक्कन की रानी रखा गया। यह अपनी एतिहासिक विरासत को साथ लेकर आज भी मुंबई और पुणे के बीच चल रही है।
अंग्रेज अफसरों के लिए घुडदौड़ देखने जाने के लिए हुई थी शुरू
1930 में जब इसकी शुरुआत हुई थी, तब यह सप्ताह में सिर्फ एक दिन ही चलती थी। इसमें सात-सात कोचों के दो रेक लगाए गए थे। पहली बार इसे बॉम्बे प्रेसीडेंसी, कल्याण और पुणे के बीच चलाया गया था। उसके बाद इसे बॉम्बे से पुणे के बीच धनी यात्रियों, जिनमें अंग्रेज ही होते थे, और अंग्रेज अफसरों के लिए पुणे रेस कोर्स में घुड़दौड़ देखने जाने के लिए चलाया गया।

देश की पहली डीलक्स ट्रेन भी
1943में भारतीयों को मिली सफर की अनुमति
इस बेहद लग्जरी ट्रेन में सफर का अपना ही मजा है। इससे मुंबई से पुणे तक पहुंचने में तीन घंटे का वक्त लगता है। शुरू में भले ही यह वीकली ट्रेन थी, और शुरू में इसमें भारतीयों के यात्रा करने पर पाबंदी थी, फिर जब अंग्रेज यात्रियों की संख्या गिरने लगी तो 1943 में भारतीयों के लिए भी इसका सफर करने की अनुमति दी गई। और बाद में इसे दैनिक में बदल दिया गया।
इंग्लैंड में बनाए गए थे अंडरफ्रेम कोच
शुरू में एक कोच को चांदी के रंग में लाल रंग की मोल्डिंग के साथ रंगा गया था, जबकि अन्य को शाही नीले रंग में सुनहरी रेखाओं के साथ रंगा गया था। इसके रेकों के कोच के अंदर के फ्रेम को इंग्लैंड में बनाया गया था, जबकि कोचों के ढांचे ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे की मतुंगा कार्यशाला में बनाए गए थे । सेवा में शुरू में प्रथम और द्वितीय श्रेणी की सीटें शामिल थीं, लेकिन 1 जनवरी, 1949 को प्रथम श्रेणी को एक नए डिजाइन वाली द्वितीय श्रेणी से बदल दिया गया। फिर जून 1955 में तृतीय श्रेणी भी शुरू की गई।
नाम पर दर्ज हैं कई रिकॉर्ड
देश की आजादी से पहले शुरू हुई डेक्कन क्वीन का इतिहास केवल इतना ही नहीं है कि यह भारत की पहली सुपरफास्ट ट्रेन है, बल्कि यह देश की पहली लंबी दूरी की इलेक्ट्रिक ट्रेन है। इसके अलावा, यह पहली वेस्टिब्यूल वाली ट्रेन, 'महिलाओं के लिए आरक्षित' डिब्बे वाली पहली ट्रेन और डाइनिंग कार वाली पहली ट्रेन है।
डेक्कन क्वीन में सफर का अपना ही मजा
इस ट्रेन के विस्टाडोम कोच छत को पारदर्शी कांच से बनाया गया है। जिनमें सफर के दौरान ऐसा लगता है जैसे खुले आसमान के नीचे सफर कर रहे हों। कांच की छत वाले इस कोच में सफर के दौरान यात्री सह्याद्री की पहाड़ियों और खंडाला घाटों के मनोरम दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। इसकी मूविंग कुर्सियां भी सफर को दोगुना कर देती हैं।
