Radio Signal: ब्रह्मांड अनंत रहस्यों से भरा हुआ है और खगोलविद लगातार एक के बाद एक रहस्यों को सुलझाने में जुटे हुए हैं, लेकिन फिर भी समुदंर के एक कण के बराबर ही ब्रह्मांड के बारे में तकरीबन जान पाए हैं। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि ब्रह्मांड का लगातार चौतरफा विस्तार हो रहा है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ब्रह्मांड में आखिर बार-बार कहां से रेडिया सिग्नल आते हैं? क्या एलियंस से इनका कोई संबंध है? आकाशदर्शियों के बीच स्पेस से आने वाले रेडियो सिग्नल हमेशा कौतुहल में बने रहे हैं। रेडियो सिग्नल खगोलविदों के लिए रोमांचक और अनसुलझी पहले बने हुए हैं। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा फास्ट रेडियो बर्स्ट्स (FRBs) की होती है। इन सिग्नल की उत्पत्ति कहां से होती है? इसके बारे में स्पष्ट जवाब तो नहीं है, लेकिन कुछ संभावित स्त्रोतों के आधार पर कई थ्योरीज जरूर सामने आई हैं।
क्या फास्ट रेडियो बर्स्ट है?
फास्ट रेडियो बर्स्ट को पहली बार 2007 में खोजा गया था और तब से खगोलविद इसके मूल स्रोत को खोजने की दिशा में काम कर रहे हैं। फास्ट रेडियो बर्स्ट प्रकाश की चमकीली चमक होती है, जो कुछ मिलीसेकंड के लिए दिखाई देती है और फिर गायब हो जाती है। फास्ट रेडियो बर्स्ट वाले कुछ सिग्नल एक बार आते हैं, लेकिन कुछ रिपीट मोड पर काम करते हैं। जिसका मतलब है कि कुछ-कुछ समय में फास्ट रेडियो बर्स्ट दर्ज किए जाते हैं।
खगोलविदों ने सुलझाई गुत्थी
पिछले साल खगोलविदों को एक ऐसे सिग्नल के बारे में पता चला, जो हर दो घंटे में दोहरा रहा था और खगोलविदों ने अंतत: इस रहस्य से पर्दा उठा दिया है। बकौल खगोलविद, पहली बार यह सिग्नल करीब एक दशक पहले देखा गया था। इस रेडियो सिग्नल की खोज ऑस्ट्रेलिया की सिडनी यूनिवर्सिटी में शोध कर रही खगोलविद आइरिस डी रुइटर ने की। खगोलविद आइरिस ने पिछले साल लो फ्रीक्वेंसी एरे (LOFAR) टेलीस्कोप से मिले डेटा को खंगालते हुए इस सिग्नल को खोजा था।
पहली बार यह सिग्नल 2015 के डेटा में देखे गए थे। इसके बाद खगोलविदों ने इस स्रोत से छह और बार ऐसे ही सिग्नल दर्ज किए। ये रेडियो सिग्नल कुछ सेकंड से लेकर कई मिनट तक की हो सकती है। इन सिग्नल की सबसे खास बात यह थी कि यह हर दो घंटे में खुद को दोहराती थीं।
कहां से आ रहे थे ये सिग्नल?
बकौल रिपोर्ट, दो घंटे में दोहराने वाला अजीबोगरीब रेडियो सिग्नल एक बाइनरी सिस्टम से आ रहा है जिसमें एक मरता हुआ तारा और उसका लाल बौना तारा शामिल हैं। मरते हुए तारे को व्हाइट ड्वार्फ कहा जाता है। इन तारों का ईंधन पूरी तरह से समाप्त हो जाता है और यह सिकुड़ जाते हैं और एक सफेद चमकदार बिंदु तक पहुंच जाते हैं। इन्हें ही व्हाइट ड्वार्फ कहते हैं।
इन सिग्नलों की खासियत
अंतरिक्ष में मडराने वाले सिग्नलों की सबसे खास बात तो यह है कि वे अरबों प्रकाश वर्ष दूर से आते हैं। रेडियो सिग्नल भी अलग-अलग तरह के हो सकते हैं, लेकिन ऐसे रेडियो सिग्नल ब्रह्मांड के प्रांरभिक काल से उत्पन्न हो सकते हैं। एक साल पुराने रहस्यमयी सिग्नल से अलग हटकर फास्ट रेडियो बर्स्ट की बात करें तो इनकी अवधि मिलीसेकंड स्केल में होने की वजह से इनका पता लगाना और अंतरिक्ष में उनकी स्थिति निर्धारित करना बेहद मुश्किल हो सकता है।
पिछले साल वाले अजीबोगरीब सिग्नल खगोलविदों को फास्ट रेडियो बर्स्ट के कुछ-कुछ समान लगे, लेकिन दोनों में महत्वपूर्ण अंतर थे। फास्ट रेडियो बर्स्ट कुछ मिलीसेकंड के लिए चमकते हैं, जबकि अजीबोगरीब सिग्नल कई सेकंड से कुछ मिनट तक जारी रहते हैं।
कहां से पैदा हो रहे सिग्नल
खगोलविदों ने अजीबोगरीब सिग्नल के स्रोत को लेकर बारीकी से काम किया और उन्हें पता चला कि ILTJ1101 नामक एक बाइनरी सिस्टम, जो पृथ्वी से लगभग 1600 प्रकाश वर्ष स्थित है, से सिग्नल आ रहे हैं, इसमें मौजूद एक व्हाइट ड्वार्फ और लाल बौना, जिसे रेड ड्वार्फ कहते हैं, जो करीब-करीब चक्कर काट रहे हैं। इन तारों के बीच तीव्र चुंबकीय क्षेत्र है, जहां से यह रेडियो सिग्नल पैदा हो रहे हैं।
खगोलविदों ने अमेरिका के एरिजोना स्थित मल्टीपल मिरर टेलीस्कोप (MMT) और टेक्सास स्थित मैकडोनाल्ड ऑब्जर्वेजरी की मदद से इस रहस्य को सुलझाया। उन्हें पता चला कि व्हाइट ड्वार्फ और रेड ड्वार्फ हर 125.5 मिनट में एक-दूसरे के चारों ओर घूम रहे हैं जिनके बीच मौजूद चुंबकीय क्षेत्र से तरंगे उठ रही हैं।
