कब और कहां से शुरू हुई दिल्ली सल्तनत, कौन था इसकी गद्दी पर बैठने वाला पहला और आखिरी बादशाह?
- Authored by: Nilesh Dwivedi
- Updated Dec 10, 2025, 03:27 PM IST
Delhi Sultanate History: दिल्ली सल्तनत भारतीय इतिहास का एक ऐसा दौर था जिसने राजनीति, समाज और संस्कृति को गहराई से रूपांतरित किया। लगभग तीन सदियों तक चले इस शासन ने प्रशासन, सैन्य व्यवस्था और स्थापत्य कला की नई परंपराएं स्थापित कीं। राजधानी दिल्ली इस काल में सत्ता, संस्कृति और व्यापार का प्रमुख केंद्र बनकर उभरी। ऐसे में आइए जानें कब और कहां से शुरू हुई दिल्ली सल्तनत?
कब और कहां से शुरू हुई दिल्ली सल्तनत?
Delhi Sultanate History: दिल्ली सल्तनत भारतीय इतिहास का वह कालखंड है जिसने देश की राजनीति, संस्कृति और सामाजिक ढांचे को गहराई से प्रभावित किया। यह सल्तनत लगभग तीन सौ साल तक कायम रही और इस दौरान कई अलग-अलग वंशों ने शासन किया। दिल्ली सल्तनत की स्थापना भारतीय उपमहाद्वीप में नए राजनीतिक, प्रशासनिक और सैन्य ढांचे के निर्माण के साथ हुई। इसे स्थापित करने का उद्देश्य न केवल शासकीय सत्ता का केंद्रीकरण था, बल्कि उस समय के सामाजिक और धार्मिक परिदृश्य में संतुलन बनाना भी था।
इस काल में राजधानी के रूप में दिल्ली ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह सिर्फ प्रशासनिक केंद्र नहीं था, बल्कि कला, संस्कृति और व्यापार का भी प्रमुख केंद्र बन गया। सल्तनत काल के दौरान कई प्रकार की स्थापत्य कला, मस्जिदें, किले और स्मारक बने, जो आज भी भारतीय इतिहास और वास्तुकला की महान उपलब्धियों के रूप में खड़े हैं। सल्तनत के समय में शासन प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए कई नीतियां और प्रशासनिक सुधार किए गए। सेना, कर प्रणाली और न्यायपालिका में नए ढांचे बनाए गए, जिनका प्रभाव आने वाले समय के मुगल शासन पर भी पड़ा। इसके साथ ही, इस काल में समाज में विभिन्न वर्गों और समुदायों के बीच संबंधों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने भी अपनी छाप छोड़ी। दिल्ली सल्तनत की शुरुआत और अंत के समय की परिस्थितियां अलग-अलग थीं, लेकिन इसने भारतीय इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ी। इसकी स्थापना और अंत दोनों ही राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण घटनाएं मानी जाती हैं, जो इस अवधि को इतिहास में यादगार बनाती हैं।

कुतुब मीनार
कब और कहां से शुरू हुई दिल्ली सल्तनत?
दिल्ली सल्तनत पर कुल पांच प्रमुख राजवंशों गुलाम, खिलजी, तुगलक, सैयद और लोदी ने क्रमबद्ध रूप से शासन किया। इसकी शुरुआत 1206 ईस्वी में गुलाम वंश के संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक से होती है (दिल्ली सल्तनत का पहला बादशाह), जो मोहम्मद गोरी का पूर्व दास और सेनापति था। गुलाम वंश (1206–1290) ने न केवल सल्तनत की नींव रखी, बल्कि कुतुबमीनार और कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद जैसी महत्वपूर्ण स्थापत्य धरोहरों का निर्माण भी कराया। इसी काल में अमीर खुसरो जैसे प्रतिभाशाली विद्वानों को संरक्षण मिला और ‘चालीसा’ नामक शक्तिशाली सैनिक संगठन की स्थापना की गई। बलबन जैसे प्रभावशाली शासकों ने ‘सिजदा’ और ‘पाइबोस’ जैसी फारसी प्रथाओं को अपनाकर शासन व्यवस्था को अधिक केंद्रीकृत और अनुशासित बनाया। हालांकि अंततः कमजोर उत्तराधिकारियों और आंतरिक संघर्षों के कारण यह वंश धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ गया।

सिकंदर लोदी का मकबरा
कौन था दिल्ली सल्तनत का आखिरी बादशाह?
सिकंदर लोदी के निधन के बाद इब्राहिम लोदी दिल्ली सल्तनत के सिंहासन पर आसीन हुआ। वह लोदी वंश के साथ-साथ पूरी दिल्ली सल्तनत का अंतिम सुल्तान माना जाता है। इब्राहिम लोदी ने 1517 से 1526 ईस्वी तक लगभग नौ वर्ष शासन किया। उसके शासनकाल की प्रमुख उपलब्धियों में ग्वालियर की विजय ही उल्लेखनीय रही। इसके विपरीत, मेवाड़ के महाराणा सांगा के विरुद्ध लड़े गए खतौली (1517–18) और धौलपुर (1519) के युद्धों में उसे करारी हार झेलनी पड़ी। मेवाड़ और दिल्ली के बीच आगे भी कई संघर्ष हुए, लेकिन हर बार दिल्ली की सेना पराजित ही हुई। परिणामस्वरूप इब्राहिम लोदी की प्रतिष्ठा के साथ-साथ उसकी सैन्य शक्ति भी कमजोर पड़ती गई। अंततः 21 अप्रैल 1526 को बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच पानीपत का पहला युद्ध हुआ, जिसमें बाबर की रणनीतिक दक्षता, नेतृत्व क्षमता और प्रभावी तोपखाने ने निर्णायक भूमिका निभाई। इस संघर्ष में इब्राहिम लोदी मारा गया और इसी के साथ दिल्ली सल्तनत का युग समाप्त हो गया। यद्यपि इब्राहिम लोदी को एक सक्षम योद्धा माना जाता है, लेकिन सैन्य कौशल और नेतृत्व की दृष्टि से बाबर उससे अधिक प्रभावी सिद्ध हुआ।