What are Fossile Fuels: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत सरकार ने देश में ईंधन आपूर्ति को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। सरकार ने स्पष्ट किया है कि पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और एलपीजी की सप्लाई पूरी तरह सामान्य बनी हुई है और देश में इनकी पर्याप्त मात्रा उपलब्ध है। आधिकारिक बयान के मुताबिक, देश की सभी तेल रिफाइनरियां अपनी पूर्ण क्षमता के साथ संचालन कर रही हैं और कच्चे तेल का पर्याप्त भंडार भी रखा गया है। इसके अलावा सरकार ने यह भी बताया कि पेट्रोल और डीजल के उत्पादन के मामले में भारत आत्मनिर्भर है तथा घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए इन ईंधनों के आयात की आवश्यकता नहीं पड़ रही है।
वहीं, पेट्रोल और डीजल की वैश्विक कमी के पीछे कई प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। इनमें होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और बड़े तेल उत्पादक देशों द्वारा उत्पादन में की गई कटौती शामिल हैं। इन परिस्थितियों के चलते ईंधन की सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है और कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। इसका असर एशिया और यूरोप के बाजारों पर भी पड़ रहा है, जहां ईंधन की उपलब्धता को लेकर संकट की स्थिति बनती जा रही है। पर क्या आपने यह सोचा है कि, जिस पेट्रोल-डीजल और प्राकृतिक गैस को लेकर इतने गंभीर हालात बने हुए हैं, वो कहां से आते हैं? आज हम आपको बताएंगे कि फॉसिल फ्यूल्स क्या होते हैं और ये कैसे बनते हैं? तो आइए जानें इसके बारे में।

पृथ्वी की सतह पर जीवाश्म ईंधन (प्रतीकात्मक फोटो)
क्या होते हैं फॉसिल फ्यूल्स?
फॉसिल फ्यूल्स यानी जीवाश्म ईंधन ऐसे हाइड्रोकार्बन युक्त पदार्थों का समूह है, जिनकी उत्पत्ति जैविक अवशेषों से हुई है और जो पृथ्वी की सतह (Earth Crust) के भीतर पाए जाते हैं। इन्हें ऊर्जा के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में उपयोग किया जाता है। जीवाश्म ईंधनों में कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, ऑयल शेल, बिटुमेन, टार सैंड और भारी तेल शामिल होते हैं। इन सभी में कार्बन मौजूद होता है और इनका निर्माण उन भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के कारण हुआ, जो प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) से उत्पन्न जैविक पदार्थों के अवशेषों पर लाखों-करोड़ों सालों तक प्रभाव डालती रहीं। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया की शुरुआत आर्कियन युग (Archean Eon) (लगभग 4 अरब से 2.5 अरब वर्ष पहले) में हुई थी। डेवोनियन काल (Devonian Period) (लगभग 419.2 मिलियन से 358.9 मिलियन वर्ष पूर्व) से पहले पाए जाने वाले अधिकांश कार्बन युक्त पदार्थ शैवाल और बैक्टीरिया से बने थे, जबकि इस काल के दौरान और इसके बाद बनने वाले अधिकांश कार्बनिक पदार्थों का स्रोत मुख्य रूप से पौधे रहे।
जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल
Britannica पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, सभी जीवाश्म ईंधनों को हवा या हवा से प्राप्त ऑक्सीजन की उपस्थिति में जलाकर ऊर्जा के रूप में गर्मी प्राप्त की जा सकती है। इस उत्पन्न गर्मी का इस्तेमाल सीधे किया जा सकता है, जैसे घरों में इस्तेमाल होने वाली भट्टियों या हीटरों में। इसके अलावा, इसी गर्मी की मदद से भाप तैयार की जाती है, जो जनरेटर को चलाकर बिजली उत्पादन में सहायक होती है। कुछ अन्य परिस्थितियों में, जैसे जेट विमानों में इस्तेमाल होने वाले गैस टरबाइन में, फॉसिल फ्यूल्स के जलने से उत्पन्न गर्मी दहन से बनने वाली गैसों का तापमान और दबाव बढ़ा देती है। इससे आवश्यक मोटिव पावर प्राप्त होती है, जो इंजन को चलाने में मदद करती है।

जीवाश्म ईंधन के उपयोग (प्रतीकात्मक फोटो)
18वीं शताब्दी से बढ़ रहा है लगातार उपयोग
18वीं शताब्दी की शुरुआत में ग्रेट ब्रिटेन में शुरू हुई औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के बाद से जीवाश्म ईंधनों का उपयोग लगातार तेजी से बढ़ता गया है। आज औद्योगिक रूप से विकसित देशों में कुल ऊर्जा खपत का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा इन्हीं ईंधनों से पूरा होता है। हालांकि समय-समय पर इनके नए भंडार खोजे जाते रहते हैं, फिर भी पृथ्वी पर उपलब्ध प्रमुख जीवाश्म ईंधनों के संसाधन सीमित हैं। आर्थिक रूप से कितनी मात्रा में इनका दोहन किया जा सकता है, इसका सटीक आकलन करना मुश्किल है। इसका कारण ऊर्जा खपत की बदलती दरें, भविष्य में इनकी कीमतों का अनुमान और तकनीकी प्रगति जैसे कई कारक हैं।
आधुनिक तकनीकों के विकास ने ईंधनों को निकालना संभव बनाया
हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग (Fracking), रोटरी ड्रिलिंग और डायरेक्शनल ड्रिलिंग जैसी आधुनिक तकनीकों के विकास ने जीवाश्म ईंधनों के छोटे और कठिन स्थानों पर मौजूद भंडारों को भी अपेक्षाकृत कम लागत में निकालना संभव बना दिया है। इससे कुल मिलाकर ऐसे संसाधनों की मात्रा बढ़ी है, जिन्हें उपयोग के लिए प्राप्त किया जा सकता है। इसके साथ ही, पारंपरिक हल्के और मध्यम श्रेणी के तेल के भंडार कम होने लगे तो कई पेट्रोलियम कंपनियों ने भारी तेल के उत्पादन की ओर रुख किया। इसके अलावा टार सैंड और ऑयल शेल जैसे स्रोतों से तरल पेट्रोलियम निकालने पर भी ध्यान बढ़ाया गया है।
