अनंत ब्रह्मांड में अनंत राज भी छिपे हुए हैं, वैज्ञानिक इस बेहद रहस्यमयी दुनिया को लेकर जितना जानने का दावा करते हैं, उससे भी ज्यादा रहस्य आज भी नहीं सुलझे हैं। दूर-दराज की आकाशगंगाओं से लेकर न दिखने वाली डार्क एनर्जी तक,अंतरिक्ष के हर कोने में ऐसे राज छिपे हैं जिन्हें जानना अभी बाकी है। इस बीच, खगोल विज्ञानियों को पता चला है कि ब्रह्मांड धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है। इसमें नए तारों का जन्म धीरे-धीरे कम हो है। उनका मानना है कि ब्रह्मांड का सुनहरे दौर का खत्म होना शुरू हो गया है। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि ब्रह्मांड से तारे खत्म होते जा रहे हैं।शोध के बाद उठ रहे कई सवालबीते 20 सालों के अध्ययन के बाद खगोल विज्ञानियों के इस दावे ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिये हैं। अब लोग यह पूछ रहे हैं कि क्या ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है या कभी सिकुड़ेगा भी? क्या समय हर जगह एक-सा चलता है? और क्या पृथ्वी के बाहर भी जीवन संभव है?
ब्रह्मांड की उम्र लगभग 13.8 अरब साल है। इसकी शुरुआत को लेकर बिग-बैंग थ्योरी सर्वमान्य है। खगोलविदों का कहना है कि बिग-बैंग से पहले ब्रह्मांड सिमटा हुआ था, सभी भौतिक तत्व और उर्जा एक ही बिंदु पर थे, इसके बाद धीरे-धीरे इसने फैलना शुरू किया। फिर एक जोरदार विस्फोट से ब्रह्मांड का जन्म हुआ। बिग-बैंग के बाद ब्रह्मांड बहुत गर्म था, जब यह ठंडा हुआ तको गैस के बादल बने। बिग-बैंग के करीब 10-20 करोड़ साल बाद शुरुआती तारे बने। इन शुरुआती तारों में हाइड्रोजन और हीलीयम जैसी भारी गैसें थी। बिगबैंग के करीब 40 करोड़ साल के बाद गुरुत्वाकर्षण के कारण ब्रह्मांड में फैले तारों और अन्य कण एक-दूसरे के पास आने लगे, जिससे आकाशगंगा का निर्माण हुआ। शुरुआत में आकाशगंगाएं छोटे आकार में बनने लगी थीं, फिर ये एक-दूसरे में जुड़ने लगीं, जिससे विशाल आकाशगंगा बनीं। वहीं, कैसे बनते हैं तारेदरअसल, तारे गर्म गैस का भंडार होते हैं, इनका जन्म धूल और गैस के बड़े बादलों, जिन्हें 'नेब्युला' कहते हैं, के आपस में मिलने से होता है। गुरुत्वाकर्षण के कारण जब धूल और गैस के विशाल बादल आपस में मिल जाते हैं तो सभी नेब्युला की गर्मी से एक नवजात तारे का जन्म होता है।
तारों के जन्म होने के बाद भी उनमें मौजूद गैसे के कारण वे गर्म होते हैं, इस दौरान उनमें मौजूद हाइड्रोजन के परमाणु आपस में जुड़कर हीलियम बनाते हैं, इस पूरी प्रक्रिया को न्यूक्लियर फ्यूजन कहते हैं। जब न्यूक्लियर फ्यूजन की प्रक्रिया पूरी हो जाती है, उसके बाद से तारों से रोशनी और गर्मी निकलना शुरू हो जाती है। इसके बाद तारा अपने 'मुख्य क्रम' में स्थिर हो जाता है। ये प्रक्रिया अभी तक जारी है, हालांकि खगोलविदों का कहना है कि अब तारे बनने की प्रक्रिया में कमी देखी जा रही है।
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2013 में एक अंतरराष्ट्रीय खगोलविदों की टीम ने दावा था कि अंतरिक्ष में बनने वाले कुल तारों के 95% अब तक पैदा हो चुके हैं, इसका तात्पर्य है कि अब सिर्फ पांच प्रतिशत तारे बनना ही बाकी रह गया है। कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया के ब्रह्मांड विज्ञानी प्रोफेसर डगलस स्कॉट का भी कहना है कि वो आकाशगंगाएं ही हैं, जो गैसों के विशाल बादलों को तारों में परिवर्तित करती हैं, लेकिन अब इनके काम करने में गिरावट देखी जा रही है। उनका कहना है कि देखा जा रहा है कि बीते आठ अरब सालों में आकाशगंगाओ के तापमान में धीरे-धीरे गिरावट आ रही है।
हर तारे के अंदर ईंधन जलता रहता है। जब यह ईंधन खत्म होने लगता है,तो तारे का अंत शुरू हो जाता है। सूरज जैसे छोटे तारे ये बहुत धीरे-धीरे बदलते हैं। अरबों सालों में इनकी रोशनी कम होती जाती है। वहीं, जो बहुत बड़े तारे मतलब जो सूरज से आठ गुना या उससे ज़्यादा भारी होते हैं,वे जोरदार धमाके के साथ फटते हैं,जिसे सुपरनोवा कहते हैं। सुपरनोवा के जरिए इन मरे हुए तारों के अवशेषों से फिर से नए तारों का जन्म होता है, हालांकि विस्फोट के बाद बचा अवशेष हर बार नए तारों के जन्म के लिए पूरा नहीं होता। मरे तारों से नई पीढी के तारों के पास पहले से कम ईंधन बचता है। खगोलविदों का कहना है कि आखिरकार एक ऐसा दिन आएगा जब यह ईंधन इतना कम हो जाएगा कि नए तारों का निर्माण संभव नहीं होगा। यही कारण है कि ब्रह्मांड में छोटे और हल्के तारे ज्यादा पाए जाते हैं। हालांकि इस प्रक्रिया में अभी अरबों सालों का समय है। ब्रह्मांड विज्ञानी प्रोफेसर डगलस स्कॉट का कहना है कि संभव है कि नए तारे अगले 10 से 100 ट्रिलियन सालों तक बनते रहेंगे। ऐसे में अभी से घबराने की कोई जरूरत नहीं है।