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साहस और संस्कृति की पहचान था ये राजवंश, कई सौ साल किया दक्षिण भारत की भूमि पर राज

Chola Dynasty History: भारत का इतिहास अपनी समृद्धि और विविधताओं के कारण अनोखा है। इस गौरवशाली अतीत में एक ऐसा वंश है जो प्रमुख और प्रभावशाली राजवंश के रूप में उभरता है। इस वंश के राजाओं ने दक्षिण भारत पर लंबे समय तक शासन कर तमिल संस्कृति और भारतीय इतिहास में अमूल्य योगदान दिया। इस नाते इसे दुनिया के सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले राजवंशों में से एक माना जाता है। तो आइए जानें इसके बारे में।

Chola Dynasty History

साहस और संस्कृति की पहचान था दक्षिण का ये राजवंश

Photo : टाइम्स नाउ डिजिटल

Chola Dynasty History: भारत का इतिहास अत्यंत समृद्ध और विविधताओं से भरा है, जो इसे अन्य देशों से अलग और विशेष बनाता है। इसका गौरवशाली अतीत प्राचीन राजवंशों और उनके प्रभावशाली शासकों से और भी समृद्ध हुआ है। इस संदर्भ में, चोल वंश भारतीय इतिहास के प्रमुख और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण राजवंशों में से एक है। चोल राजवंश ने दक्षिण भारत पर लंबे समय तक शासन किया और उनके साम्राज्य का समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति पर गहरा प्रभाव पड़ा। लगभग कई 100 सालों तक सत्ता में रहने वाले चोल अपने समय के सबसे लंबे शासन करने वाले राजवंशों में गिने जाते हैं। दक्षिण भारत के महानतम शासकों में से एक माने जाने वाले चोलों ने तमिल संस्कृति और भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

Chola Dynasty History

चोल वंश का इतिहास

कब हुई थी चोल वंश की स्थापना?

आर सी मजूमदार जैसे प्रमुख इतिहासकारों का मानना है कि, इस वंश की स्थापना 9वीं शताब्दी के दौरान हुई। कुछ का कहना है कि इस वंश की स्थापना तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में हुई थी, जबकि अन्य विद्वान मानते हैं कि उनका वास्तविक शासन नौवीं शताब्दी में पल्लवों को पराजित करने के बाद शुरू हुआ। चोलों का शासन 13वीं शताब्दी तक बना रहा, जिससे यह दक्षिण भारत के सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले साम्राज्यों में से एक बन गया। सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व से पहले चोलों के बारे में लिखित प्रमाण कम उपलब्ध हैं, और उनके बारे में जानकारी का मुख्य स्रोत संगम काल का प्राचीन तमिल साहित्य है। सामान्य धारणा है कि चोल पांड्य और चेरा वंश के शासकों के समान थे। अशोक के शिलालेखों में भी चोलों का उल्लेख मिलता है; हालांकि वे अशोक के अधीन नहीं थे, उनके साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बने हुए थे।

किसने की चोल वंश की स्थापना?

विजयालय चोल ने चोल वंश की नींव रखी। आठवीं शताब्दी में उन्होंने तंजौर पर विजय प्राप्त की और भारतीय इतिहास के सबसे गौरवशाली साम्राज्यों में से एक की स्थापना की। इस तरह तंजौर चोल साम्राज्य की पहली राजधानी के रूप में प्रसिद्ध हुई। विजयालय चोल के शासन के बाद, चोल साम्राज्य आदित्य प्रथम और उनके उत्तराधिकारियों के हाथों में आया। यह समय चोलों के लिए शक्ति और समृद्धि का युग माना जाता है और इसे मध्यकालीन चोल काल के रूप में जाना जाता है। चोल वंश के कई शासकों ने इसे दक्षिण भारत के सबसे प्रभावशाली साम्राज्यों में से एक बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनमें से सबसे प्रमुख और सफल राजा राजराज प्रथम थे। उनके नेतृत्व में चोल साम्राज्य दक्षिणी भारत, श्रीलंका, मालाबार तट, लक्षद्वीप और मालदीव से लेकर उत्तर में गंगा के मैदानों तक विस्तारित हुआ। राजराज प्रथम के बाद उनके पुत्र राजेंद्र चोल ने वंश की सत्ता संभाली।

Chola Dynasty History

चोल वंश का इतिहास

चोल वंश का पतन कैसे हुआ?

राजाराजा चोल तृतीय और उनके उत्तराधिकारी राजेंद्र चोल तृतीय के शासनकाल में चोल साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा और उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। चोल साम्राज्य के पतन की शुरुआत मुख्य रूप से श्रीविजया पर उनके नियंत्रण कम होने से हुई, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने अपने कई विदेशी क्षेत्र खो दिए। हालांकि, दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में चोलों का शासन 12वीं शताब्दी के अंत तक जारी रहा, लेकिन 13वीं शताब्दी की शुरुआत में पांड्य वंश ने सत्ता संभाली और अंततः चोल साम्राज्य के पतन का मार्ग प्रशस्त किया।

 Nilesh Dwivedi
Nilesh Dwivedi author

निलेश द्विवेदी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में काम कर रहे हैं। वे शहरों से जुड़ी लोकल घटनाएं, क्राइम, राजनीति, इंफ्रास्ट्रक्चर और राज्यवार अप... और देखें

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