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उद्धव-राज के बीच नहीं हो पाएगी सुलह? दोनों दलों के नेताओं ने दिए ये संकेत; जानिए क्यों आ रही अड़चनें

उद्धव-राज में सुलह के संकेत की चर्चा के बीच दोनों दलों के नेताओं ने कहा, राह आसान नहीं है। मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने कहा है कि मराठी मानुष के हित में एकजुट होना कठिन नहीं है, वहीं महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा है कि वह छोटी-मोटी लड़ाइयां छोड़कर आगे बढ़ने को तैयार हैं, बशर्ते राज्य के हितों के खिलाफ काम करने वालों को तरजीह न दी जाए।

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उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का हो पाएगा मिलन?

Maharashtra Politics: उद्धव ठाकरे और उनके चचेरे भाई राज ठाकरे के बीच सुलह की अटकलों के जोर पकड़ने पर, शिवसेना (उबाठा) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के नेताओं ने कहा है कि हालांकि इससे एक संभावना बनती दिख रही है, लेकिन व्यक्तिगत संबंध और संगठनात्मक तालमेल समेत कुछ बाधाएं हैं, जिन्हें दूर करने की जरूरत है।

क्या ठाकरे भाईयों के बीच सुलह होना हो गया तय?

ठाकरे भाइयों के बीच संभावित सुलह की चर्चा तेज हो गई है तथा उनके बयानों से संकेत मिल रहे हैं कि वे 'मामूली मुद्दों' को नजरअंदाज कर सकते हैं तथा अलग होने के लगभग दो दशक बाद एक बार फिर हाथ मिला सकते हैं। मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने कहा है कि मराठी मानुष के हित में एकजुट होना कठिन नहीं है, वहीं महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा है कि वह छोटी-मोटी लड़ाइयां छोड़कर आगे बढ़ने को तैयार हैं, बशर्ते राज्य के हितों के खिलाफ काम करने वालों को तरजीह न दी जाए।

सबसे कठिन राजनीतिक दौर से गुजर रही हैं दोनों पार्टियां

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने शनिवार को अपने सोशल मीडिया हैंडल पर एक पोस्ट में बिना कोई संदर्भ दिए कहा, 'मुंबई और महाराष्ट्र के लिए एकजुट होने का समय आ गया है। शिवसैनिक मराठी अस्मिता की रक्षा के लिए तैयार हैं।' उद्धव-राज फिलहाल विदेश में हैं। राज के अप्रैल के आखिरी हफ्ते में और उद्धव के मई के पहले हफ्ते में लौटने की उम्मीद है।

सुलह की चर्चा ऐसे समय में हो रही है जब दोनों पार्टियां अपने चुनावी प्रदर्शन के मामले में सबसे खराब दौर और अपने सबसे कठिन राजनीतिक दौर से गुजर रही हैं। वर्ष 2024 के विधानसभा चुनावों में शिवसेना (उबाठा) ने 20 सीटें जीतीं, जबकि मनसे को एक भी सीट नहीं मिली। हालांकि, दोनों पार्टियों के नेताओं ने कहा है कि राज के बयान पर उद्धव की प्रतिक्रिया से अटकलें लगाई जा सकती हैं, लेकिन यह कहना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल है।

2005 में राज ठाकरे ने छोड़ दी थी शिवसेना, क्या थी वजह?

शिवसेना (उबाठा) के एक नेता ने कहा कि दोनों चचेरे भाई अलग-अलग मिजाज के हैं। पिछले दो दशकों से भी ज्यादा समय से पुरानी बातों के कारण उनमें एक-दूसरे के प्रति अविश्वास की भावना पैदा हो गई है। राज ने 2005 में शिवसेना छोड़ दी थी और इसके लिए उद्धव को जिम्मेदार ठहराया था। राज ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि वह बाल ठाकरे के अलावा किसी और के अधीन काम नहीं कर सकते।

जब राउत बोले- राजनीति की वजह से पारिवारिक रिश्ते नहीं टूटते

पिछले हफ्ते शिवसेना (उबाठा) के नेता संजय राउत ने कहा कि राजनीति की वजह से पारिवारिक रिश्ते नहीं टूटते। लेकिन व्यक्तिगत संबंध सिर्फ दो व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं हैं- यह उनके परिवारों, विशेषकर दोनों चचेरे भाइयों के बेटों आदित्य (उद्धव के पुत्र) और अमित (राज के पुत्र) के बारे में भी है--जिन्हें अंततः संगठन का नेतृत्व करने के लिए तैयार किया जा रहा है।

शिवसेना के इतिहास पर लिखी गई किताब 'जय महाराष्ट्र' के लेखक प्रकाश अकोलकर ने कहा कि यह 2019 में अविभाजित शिवसेना, कांग्रेस और अविभाजित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के बीच हुए गठबंधन से अलग होगा। अकोलकर ने कहा, 'उद्धव और राज के बीच लड़ाई व्यक्तिगत और पारिवारिक झगड़ा है, जहां दोनों भाई पारिवारिक (बाल ठाकरे की) विरासत हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।'

उन्होंने कहा कि बाल ठाकरे की पत्नी मीना परिवार की मुखिया थीं और पर्दे के पीछे रहकर पार्टी में अहम भूमिका निभाती थीं। अकोलकर ने कहा, 'अब, (उद्धव और राज की) पत्नियों का अपनी-अपनी पार्टियों पर अच्छा-खासा प्रभाव है तथा अगर सुलह की कोई संभावना बनती है तो वे भी इसी तरह की भूमिका निभाएंगी।'

नितेश राणे ने उद्धव और राज को लेकर उठाया था ये सवाल

महाराष्ट्र के मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता नितेश राणे ने पिछले सप्ताह सवाल उठाया था कि क्या उद्धव ठाकरे ने राज के बयान पर प्रतिक्रिया देने से पहले अपनी पत्नी रश्मि से सलाह ली थी। शिवसेना (उबाठा) के एक नेता ने माना कि दोनों दलों का एक साथ आना कठिन है। उद्धव-राज के एक साथ आने की संभावना से दोनों दलों के समर्थक उत्साहित हैं, लेकिन कार्यकर्ताओं और पार्टी नेताओं के एक वर्ग के लिए यह बात शायद उतनी उत्साहजनक नहीं है।

तो सीटों का बंटवारा कैसे किया जाएगा? मनसे ने पूछा ये सवाल

मनसे के एक नेता ने कहा, 'जब हम मुंबई में सीट बंटवारे पर चर्चा करेंगे, तो सीटों का बंटवारा कैसे किया जाएगा? जीतने योग्य और न जीतने योग्य सीटों का बंटवारा कैसे होगा? दादर और वर्ली जैसे इलाकों का क्या होगा, जहां दोनों पार्टियों का मजबूत आधार है? अन्य शहरों का क्या होगा, जहां शिवसेना (उबाठा) और मनसे का मजबूत जनाधार है।' उन्होंने विचारधाराओं का सवाल भी उठाया।

जहां राज खुद को मराठी-हिंदुत्व नेता के रूप में पेश कर रहे हैं, वहीं उद्धव ने पार्टी को अधिक समावेशी बनाने, विशेषकर मुस्लिम समुदाय के साथ मेलजोल बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया है। मनसे नेता ने पूछा, 'अगर उद्धव ने हमसे भाजपा से नाता तोड़ने को कहा, तो क्या वह कांग्रेस के साथ भी ऐसा ही करेंगे?' पिछले सप्ताह मनसे प्रवक्ता और पार्टी के मुंबई अध्यक्ष संदीप देशपांडे ने पूछा था कि क्या उद्धव मनसे के उन 17,000 कार्यकर्ताओं से माफी मांगेंगे, जिनपर उनके मुख्यमंत्री रहते हुए मस्जिदों के बाहर लाउडस्पीकर के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए पुलिस में मामले दर्ज किए गए थे।

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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