ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड हार्डिंज ने 1843 में आदेश जारी कर सरकारी दफ्तरों में रविवार की छुट्टी अनिवार्य की।यह फैसला इसलिए अहम था क्योंकि उससे पहले कर्मचारियों को हफ्ते में एक भी छुट्टी नहीं मिलती थी। प्रशासनिक दबाव, थकान और बढ़ते विरोध को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने यह बदलाव लागू किया।
ब्रिटिश राज में अधिकारी और कर्मचारी रोजाना 10–12 घंटे तक काम करते थे। लगातार शिकायतों, गिरती कार्यक्षमता और स्वास्थ्य समस्याओं के चलते आराम का एक दिन तय करना आवश्यक हो गया था।हार्डिंज के फैसले को मानव हित में बड़ा सुधार माना गया और इसे भारत के पहले "वर्क-रिफॉर्म" कदमों में गिना जाता है।
नारायण मेघाजी लोकहांडे, जिन्हें भारत का पहला ट्रेड यूनियन नेता कहा जाता है, ने 1881–1884 के बीच सप्ताहिक अवकाश को मजदूरों का अधिकार बनाने के लिए बड़ा आंदोलन चलाया।उन्होंने सरकार को ज्ञापन दिए, रैलियाँ निकालीं और "रविवार छुट्टी" को कानूनी रूप देने की मांग की। इस आंदोलन ने पूरे देश में मजदूर संगठनों को मजबूत किया।
उस समय फैक्टरियों में भारतीय मजदूर बिना छुट्टी के कठिन परिस्थितियों में काम करते थे। रविवार अवकाश लागू होने के बाद सरकारी दफ्तरों से प्रेरणा लेकर कई उद्योग इकाइयों ने भी यह नियम अपनाना शुरू किया।यह मजदूरों के जीवन में पहली बार "आराम और परिवार के समय" का अवसर था।
सरकारी दफ्तरों और कुछ फैक्टरियों में शुरुआत होने के बाद रविवार अवकाश धीरे-धीरे स्कूलों, रेलवे, पोस्ट ऑफिस और निजी संस्थानों में लागू होने लगा।20वीं सदी की शुरुआत तक यह एक स्थापित प्रणाली बन गई और पूरे भारत में कामकाजी ढांचे का हिस्सा बन गई।
आज रविवार सिर्फ अवकाश का दिन नहीं बल्कि परिवार, सामाजिक गतिविधियों और मानसिक आराम का दिन माना जाता है।कई राज्यों में रविवार को बाजारों में विशेष गतिविधियाँ, छुट्टियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी इस दिन तय होते हैं, जिससे समाजिक जीवन का संतुलन बना रहता है।
लॉर्ड हार्डिंज का वह आदेश इतिहास में एक छोटे प्रशासनिक कदम जैसा दिखता है, लेकिन इसका असर भारत की पूरी वर्क कल्चर पर पड़ा।आज सप्ताहिक अवकाश भारतीय समाज में एक नियमित और आवश्यक व्यवस्था है—और इसकी नींव 180 साल पहले एक अंग्रेज अफसर ने रखी थी