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मतदाता सूची में नाम रखने या हटाने का फैसला कौन करता है? ECINET, ERONET और सॉफ्टवेयर कंट्रोल का पूरा गणित

ECINET ERONET ECI Controversy: जानिए भारत में वोटर लिस्ट (इलेक्टोरल रोल) का प्रबंधन ERONET और ECINET से कैसे होता है, नाम हटाने की कानूनी ताकत किसके पास है और सॉफ्टवेयर के केंद्रीकरण को लेकर क्यों विवाद खड़ा हुआ है।

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मतदाता सूची में नाम रखने या हटाने का फैसला कौन करता है? ECINET, ERONET और सॉफ्टवेयर कंट्रोल का पूरा गणित

Who Decides Who Stays On Electoral Roll: जब भी कोई व्यक्ति वोटर बनने के लिए अप्लाई करता है, वोटर लिस्ट में जानकारी ठीक करवाने, घर बदलने या नाम हटवाने के लिए अप्लाई करता है, तो वह एप्लीकेशन चुनाव अधिकारियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले डिजिटल सिस्टम में चली जाती है। सालों तक, यह ज्यादातर काम ERONET के जरिए होता था, जो भारत के चुनाव आयोग (ECI) का वोटर लिस्ट मैनेजमेंट सिस्टम है। अब इसके काम ECI के बड़े ECINET प्लेटफॉर्म में शामिल कर लिए गए हैं।

इन दोनों सिस्टम की जांच-पड़ताल हो रही है क्योंकि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने वोटर लिस्ट डेटाबेस के सेंट्रलाइजेशन (एक जगह कंट्रोल होने) और राज्यों में चुनाव अधिकारियों की एक्सेस की सीमा को लेकर चिंता जताई है, जबकि ये अधिकारी ही कानूनी तौर पर यह काम करने के लिए अधिकृत हैं।

तो, ये सिस्टम असल में कैसे काम करते हैं? आखिर कौन तय करता है कि वोटर का नाम लिस्ट में जोड़ा जाएगा या हटाया जाएगा? और सॉफ्टवेयर कंट्रोल का मुद्दा क्यों बन गया है? आइए, इस बारे में विस्तार से जानते हैं।

ERONET क्या है?

ERONET को फरवरी-मार्च 2018 में वोटर लिस्ट एप्लीकेशन और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं को मैनेज करने के लिए एक सेंट्रलाइज्ड डिजिटल सिस्टम के तौर पर बनाया और लॉन्च किया गया था। इसके आने से पहले, वोटर लिस्ट को राज्य-स्तर के कई सिस्टम के जरिए मैनेज किया जाता था।

इसे इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) ने बनाया था।

लॉन्च के समय, ECI ने एक आधिकारिक बयान में कहा था कि स्प्रेडशीट से लेकर राज्य-विशिष्ट सॉफ्टवेयर तक 36 अलग-अलग सिस्टम थे। ERONET का मकसद एक कॉमन डेटाबेस और वोटर लिस्ट एप्लीकेशन को प्रोसेस करने का एक कॉमन तरीका बनाकर इन प्रक्रियाओं को एक जैसा (स्टैंडर्डाइज) करना था।

असल में, ERONET वह बैक-एंड सिस्टम था जिसके ज़रिए चुनाव अधिकारी नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन, वोटरों के माइग्रेशन या घर बदलने, वोटर लिस्ट की एंट्री में सुधार, एंट्री हटाने या उस पर आपत्ति जताने और वोटर लिस्ट से जुड़ी दूसरी प्रक्रियाओं के लिए एप्लीकेशन प्रोसेस करते थे।

ECI ने इस सिस्टम को 'सेंट्रलाइज्ड फॉर्म प्रोसेसिंग सिस्टम' और इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफ़िसर (ERO) के लिए फैसला लेने में मदद करने वाला सिस्टम बताया था।

क्या ERONET खुद तय करता है कि कौन वोटर बनेगा? ECI के अनुसार, ऐसा नहीं है। मौजूदा विवाद को समझने के लिए यह बात बहुत जरूरी है। 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' के तहत विधानसभा क्षेत्र की वोटर लिस्ट (इलेक्टोरल रोल) तैयार करने और उसमें बदलाव करने का कानूनी अधिकार 'इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर' (ERO) के पास होता है।

यह सॉफ्टवेयर आवेदनों को प्रोसेस कर सकता है, जानकारी की तुलना कर सकता है, संभावित डुप्लिकेट या गड़बड़ियों की पहचान (फ्लैग) कर सकता है और अधिकारी को जानकारी दे सकता है। लेकिन कंप्यूटर से मिलने वाला फ्लैग अपने आप में कोई कानूनी फैसला नहीं है कि कोई व्यक्ति अयोग्य है।

उदाहरण के लिए, अगर सिस्टम को एक जैसे नाम, उम्र और दूसरी जानकारी वाले दो वोटर रिकॉर्ड मिलते हैं, तो वह उन्हें संभावित डुप्लिकेट के तौर पर फ्लैग कर सकता है। इसके बाद चुनाव अधिकारी रिकॉर्ड की जांच कर सकते हैं, दस्तावेज मांग सकते हैं या फील्ड वेरिफिकेशन कर सकते हैं और फिर तय कर सकते हैं कि क्या कार्रवाई की जानी चाहिए। दूसरे शब्दों में, सिस्टम का मकसद कानूनी तौर पर फैसला लेने वाले अधिकारी की मदद करना है, न कि उनकी जगह लेना।

ECINET क्या है?

जनवरी 2026 में, ECI ने ERONET के मुख्य कामों को ECINET नाम के एक बड़े और एकीकृत प्लेटफॉर्म में मिला दिया। यह ECI का मुख्य IT प्लेटफॉम है, जो 40 से ज्यादा ऐसे एप्लीकेशन और वेबसाइटों को एक साथ लाता है जिन्हें आयोग ने सालों से वोटरों, उम्मीदवारों, राजनीतिक पार्टियों और चुनाव अधिकारियों के लिए बनाया था।

ECI का मौजूदा टेक्नोलॉजी पेज ECINET को उस प्लेटफॉर्म के तौर पर बताता है जिसके जरिए उसके कई एप्लीकेशन और सर्विस दी जा रही हैं। आयोग इसे 'ECINET पोर्टल (पहले ERONET) का इलेक्टोरल रोल मॉड्यूल' कहता है।

आम वोटरों के लिए, यह प्लेटफॉर्म वोटर रजिस्ट्रेशन, वोटर लिस्ट में नाम खोजना और एप्लीकेशन से जुड़ी कई तरह की सुविधाएं देता है। ECI का वोटर पोर्टल अभी नए वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए फॉर्म 6, नाम हटाने या आपत्ति के लिए फॉर्म 7, और घर बदलने, सुधार और उससे जुड़े अनुरोधों के लिए फ़ॉर्म 8 देता है।

जरूरी बात यह है कि ERONET और ECINET दो पूरी तरह से अलग इलेक्टोरल डेटाबेस नहीं हैं। वोटर लिस्ट से जुड़े जो काम पहले ERONET के जरिए होते थे, उन्हें अब ECINET में मिला दिया गया है।

इन सिस्टम को एक जगह लाने (सेंट्रलाइजेशन) का मामला विवादित क्यों हो गया है?

इन सिस्टम को एक जगह लाना कोई नई बात नहीं है। वोटर लिस्ट को डिजिटल बनाना और अलग-अलग राज्यों के सिस्टम को एक कॉमन इंफ्रास्ट्रक्चर पर लाना एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया रही है। अभी का मुद्दा ज्यादा खास है: सिस्टम तक पहुंच को कौन कंट्रोल करता है, और क्या सॉफ्टवेयर राज्य-स्तर के कानूनी अधिकारियों को कानून से मिली शक्तियों का इस्तेमाल करने देता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने वोटर लिस्ट डेटा को एक जगह लाने और ERONET/ECINET तक पहुंच को लेकर बार-बार चिंता जताई थी। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि संधू ने इस बात पर चिंता जताई थी कि कुछ मुख्य चुनाव अधिकारियों, जिला चुनाव अधिकारियों और EROs के पास सिस्टम तक सही और पूरी पहुंच नहीं थी, जैसा कि उन्होंने बताया था।

इसलिए, चिंता सिर्फ एक सेंट्रल डेटाबेस होने की नहीं है, बल्कि कानूनी अधिकार और तकनीकी अधिकार के बीच के रिश्ते की है। अगर किसी ERO के पास फैसला लेने का कानूनी अधिकार है, लेकिन सॉफ्टवेयर उस फैसले को दर्ज करने, बदलने या लागू करने की इजाजत नहीं देता है, तो एक सवाल उठता है: तकनीकी ढांचा कानून द्वारा ERO को दिए गए अधिकार को कैसे प्रभावित करता है? मौजूदा बहस में यही मुख्य मुद्दा उठाया गया है।

सेंट्रलाइजेशन (केंद्रीकरण) के मुद्दे पर ECI का क्या कहना है?

ECI के अनुसार, बूथ लेवल ऑफिसर (BLO), असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (AERO), इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO), डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर (DEO) और चीफ़ इलेक्टोरल ऑफिसर (CEO) ECINET पर अपनी अलग-अलग ID और पासवर्ड के जरिए अपने-अपने काम करते रहते हैं। इसने कहा कि कोई और व्यक्ति, जिसमें आयोग का कोई दूसरा अधिकारी भी शामिल है, ECINET पर तय अधिकारी को सौंपे गए कानूनी काम को नहीं कर सकता है।

ECI ने आगे साफ किया कि सेंट्रलाइजेशन मुख्य रूप से डेटाबेस मैनेजमेंट और साइबर सुरक्षा के लिए है, जिन्हें सिस्टम को अनधिकृत एक्सेस, छेड़छाड़ और साइबर हमलों से बचाने के लिए केंद्रीय रूप से मैनेज किया जाना चाहिए। इसने इस साल की शुरुआत में विधानसभा चुनावों के दौरान वोटों की गिनती के दिन साइबर हमलों की लगभग 68 लाख कोशिशों का भी जिक्र किया है।

इसलिए, ECI ने इस सुझाव को खारिज कर दिया कि केंद्रीय तकनीक ERO के अधिकार की जगह ले लेती है।

ECI, ECINET के लिए और क्या बदलाव करने की योजना बना रहा है?

विवाद के बाद, ECI ने 26 सितंबर, 2026 को अपने ECINET सिस्टम की समीक्षा की घोषणा की ताकि यह जांचा जा सके कि क्या यह संबंधित कानूनों और नियमों की जरूरतों को पूरा करता है या नहीं।

इसने कहा, 'फील्ड अधिकारियों के पास अभी उनके कानूनी अधिकारों के अनुसार प्लेटफॉर्म तक रोल-बेस्ड एक्सेस है। समीक्षा एक सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा की जाएगी और इसमें IIT या IIIT का एक स्वतंत्र विशेषज्ञ भी शामिल होगा।'

ECI ने कहा कि राज्य के चीफ इलेक्टोरल ऑफिसरों (CEO) से मिले सुझावों के आधार पर ECINET में पहले ही कई अपग्रेड किए जा चुके हैं। इसने कहा कि फील्ड अधिकारियों द्वारा मांगी गई और अधिक फ्लेक्सिबिलिटी और बदलावों पर भी विचार किया जाएगा।

इसने बताया कि आगे चलकर, IT मॉड्यूल और पोर्टलों से जुड़ी पहलों पर आयोग के सामने मंजूरी के लिए रखने से पहले अधिकारियों की समिति द्वारा चर्चा की जाएगी।

'लॉजिकल विसंगति' (logical discrepancy) असल में क्या है? '

लॉजिकल डिसक्रेपेंसी (तार्किक विसंगति) असल में तब पता चलती है जब वोटर की जानकारी की तुलना वोटर लिस्ट के दूसरे डेटा से की जाती है।

उदाहरण के लिए, सिस्टम वोटर और उसके माता-पिता या रिश्तेदार की उम्र में कोई असामान्य अंतर; पुरानी और नई वोटर लिस्ट में नामों में अंतर; परिवार या रिश्ते-नाते की जानकारी में विसंगति; या स्पेलिंग या ट्रांसलिट्रेशन (लिप्यांतरण) में बदलाव की वजह से जानकारी मेल न खाने जैसी बातें पकड़ सकता है।

ऐसी विसंगति आगे जांच के लिए एक संकेत है, न कि कोई अंतिम फैसला। यह अंतर इसलिए जरूरी है क्योंकि ऑटोमेटेड मैचिंग सिस्टम डेटा के पैटर्न के आधार पर काम करते हैं, जबकि वोट देने की योग्यता के बारे में आखिरी फैसला सक्षम चुनाव अधिकारियों को कानूनी और तथ्यात्मक आधार पर करना होता है।

ECI, ECINET के लिए और क्या बदलाव करने की योजना बना रहा है?

ECI, ECINET के लिए और क्या बदलाव करने की योजना बना रहा है?

आधार-आधारित ई-साइन फीचर से क्या बदलाव आया है?

ECI ने वोटर रजिस्ट्रेशन, नाम हटाने और सुधार से जुड़े फॉर्म के लिए ऑथेंटिकेशन को मजबूत करने के मकसद से ECINET पर ई-साइन-आधारित पहचान वेरिफिकेशन प्रोसेस भी शुरू किया है।

इस प्रोसेस में आवेदक को C-DAC द्वारा चलाए जा रहे एक बाहरी प्लेटफॉर्म पर ले जाया जाता है, जहां आवेदक अपना आधार नंबर डालता है और आधार से जुड़े मोबाइल नंबर पर OTP प्राप्त करता है। इसके बाद आवेदक ECINET पर वापस आकर एप्लीकेशन सबमिट करने से पहले आधार-आधारित ऑथेंटिकेशन के लिए सहमति देता है।

इस बदलाव का मकसद एप्लीकेशन सबमिट करने वाले व्यक्ति और उस एप्लीकेशन के लिए इस्तेमाल की गई पहचान के बीच एक मजबूत कड़ी बनाना है।

वोटर का नाम हटाने के मामले में यह क्यों जरूरी है?

यह मुद्दा इसलिए अहम हो गया है क्योंकि ऐसे आरोप लगे हैं कि वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए एप्लीकेशन धोखाधड़ी से सबमिट किए जा सकते हैं।

इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण कर्नाटक का आलंद विधानसभा क्षेत्र है, जहां चुनाव अधिकारियों ने बताया कि नाम हटाने के लिए 6,018 'फॉर्म 7' एप्लीकेशन ऑनलाइन सबमिट किए गए थे।

वेरिफिकेशन के बाद, इनमें से केवल 24 एप्लीकेशन ही सही पाए गए। बाकी 5,994 एप्लीकेशन गलत पाए गए और उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया। अधिकारियों ने कहा कि नतीजतन, उन एप्लीकेशन के आधार पर किसी भी वोटर का नाम नहीं हटाया गया।

बाद में यह मामला उन एप्लीकेशन से जुड़ी परिस्थितियों की व्यापक जांच का हिस्सा बन गया।

यह एक अहम बात पर भी जोर देता है: किसी वोटर का नाम हटाने के लिए ऑनलाइन एप्लीकेशन सबमिट करने से ही वह वोटर वोटर लिस्ट से नहीं हट जाता। एप्लीकेशन का वेरिफिकेशन होना जरूरी है, जिसके बाद सक्षम अधिकारी फैसला लेते हैं।

ECINET के जरिए चुनावी सिस्टम को सेंट्रलाइज करने के क्या प्रशासनिक फायदे हैं?

सेंट्रलाइजेशन अलग-अलग सिस्टम को एक कॉमन प्लेटफॉर्म पर लाकर चुनाव प्रशासन को आसान बना सकता है। ECI अधिकारियों के अनुसार, इससे राज्यों में फॉर्म और प्रक्रियाओं को एक जैसा किया जा सकता है, डेटाबेस के बीच डुप्लिकेशन कम किया जा सकता है, एप्लीकेशन को ट्रैक करना आसान बनाया जा सकता है और डेटा में एकरूपता लाई जा सकती है।

इससे चुनाव अधिकारियों को कॉमन टूल्स का एक्सेस भी मिल सकता है और एक ही प्लेटफॉर्म के जरिए चुनावी सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

सेंट्रलाइजेशन से चुनाव से जुड़ी जानकारी के पब्लिकेशन और ट्रांसमिशन में भी तेजी आ सकती है। ECI ने कहा है कि ECINET ने उन्हें वोटिंग के रुझान और चुनाव से जुड़ी दूसरी जानकारी तेजी से अपलोड करने में मदद की है। बड़े पैमाने पर देखें तो, इस प्लेटफॉर्म का मकसद दर्जनों ऐसे एप्लीकेशन और सर्विस को एक ही तकनीकी ढांचे के तहत लाना है जो पहले अलग-अलग थे।

इस सिस्टम के डिजाइन को लेकर मुख्य चिंता क्या है?

मुख्य चिंता सिर्फ यह नहीं है कि चुनावी डेटा डिजिटल है या सेंट्रलाइज्ड (एक जगह से नियंत्रित)। असल चिंता यह है कि क्या यह टेक्नोलॉजी सही ढंग से दिखाती है कि चुनावी कानून कैसे अधिकार और जिम्मेदारियां तय करते हैं।

एक सेंट्रलाइज्ड सिस्टम चुनाव प्रशासन को तेज और एक जैसा बना सकता है। लेकिन वोटर लिस्ट में लोगों के अधिकार और कानूनी प्रक्रियाएं दोनों शामिल होती हैं, जैसे सुनवाई, आपत्तियां और गलतियों को सुधारने के मौके। इसलिए सॉफ्टवेयर का डिजाइन अहम हो जाता है।

उदाहरण के लिए, अगर कोई ऑटोमेटेड सिस्टम किसी वोटर को मार्क करता है, तो किसी अधिकारी के लिए उस मामले की जांच करने का तरीका होना चाहिए। अगर ERO यह तय करता है कि वोटर का नाम लिस्ट में बना रहना चाहिए, तो सिस्टम में उस फैसले को रिकॉर्ड करने की क्षमता होनी चाहिए। अगर नाम हटाने का फैसला गलत पाया जाता है, तो जिन अधिकारियों के पास इसे पलटने का कानूनी अधिकार है, उनके पास ऐसा करने का कोई कारगर तरीका होना चाहिए।

इसलिए, बड़ा मुद्दा यह है कि चुनावी कानून के ढांचे के भीतर टेक्नोलॉजी को कैसे काम करना चाहिए। अब विवाद इस बात पर है कि क्या सिस्टम का आर्किटेक्चर और एक्सेस कंट्रोल जमीनी स्तर पर अधिकारियों की कानूनी भूमिका को लगातार बनाए रखते हैं।

एक वोटर को इन सब बातों से क्या समझना चाहिए?

एक आम वोटर के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि ERONET सिर्फ एक ऐसी मशीन नहीं थी जो यह तय करती थी कि कौन वोट दे सकता है। यह वोटर लिस्ट की जानकारी को प्रोसेस और मैनेज करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक तकनीकी सिस्टम था, और ECINET अब वह बड़ा प्लेटफॉर्म है जिसमें उन कामों को शामिल किया गया है।

महत्वपूर्ण संस्थागत सवाल ये हैं कि डेटा पर कार्रवाई करने की क्षमता किसके पास है, गलत एंट्री को कौन ठीक कर सकता है, नाम हटाने के फैसले को कौन पलट सकता है, और क्या सॉफ्टवेयर कानूनी चुनाव अधिकारियों को वे काम करने के लिए जरूरी एक्सेस देता है या नहीं।

जैसे-जैसे भारत ज्यादा सेंट्रलाइज्ड डिजिटल चुनाव प्रशासन की ओर बढ़ रहा है, चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता न केवल सटीक डेटाबेस और एल्गोरिदम पर निर्भर करेगी, बल्कि स्पष्ट कानूनी अधिकार, ऑडिट की सुविधा, मानवीय जांच और गलत तरीके से नाम हटाने या धोखाधड़ी वाले एप्लीकेशन के खिलाफ प्रभावी सुरक्षा उपायों पर भी निर्भर करेगी।

Nitin Arora
नितिन अरोड़ाauthor

नितिन अरोड़ा टाइम्स नाउ नवभारत में न्यूज डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया में उनका 6 वर्षों का अनुभव है। वह राजनीति, देश–विदेश की बड़ी घटनाओं और समसामयिक मुद्दों को गहराई से समझकर उन्हें सटीक और सरल भाषा में प्रस्तुत करने में माहिर हैं। उन्होंने अपने करियर में लगातार करंट अफेयर्स, पॉलिटिकल डेवलपमेंट्स, डिप्लोमैटिक घटनाएं और डिफेंस सेक्टर से जुड़े विषयों पर प्रभावशाली कॉन्टेंट तैयार किया है और अबतक 6 हजार से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं। विभिन्न टॉपिक्स पर एक्सप्लेनेर, डेटा-आधारित रिपोर्ट्स और विश्लेषणात्मक कॉपी लिखने में उनकी मजबूत पकड़ है।

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