चेहरा या संगठन, ममता के सामने बीजेपी की दुविधा; कैसे पार पाएगी भगवा पार्टी?
- Reported by: हिमांशु तिवारीEdited by: शिव शुक्ला
- Updated Jan 14, 2026, 09:36 PM IST
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी एक बड़े रणनीतिक सवाल से जूझ रही है। और वह सवाल है क्या वह ममता बनर्जी के मुकाबले किसी मुख्यमंत्री चेहरे को आगे बढ़ाए या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और ‘सामूहिक टीम मॉडल’ के सहारे चुनावी मैदान में उतरे। फिलहाल पार्टी के संकेत साफ हैं कि बंगाल में किसी एक नेता को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करने के बजाय सामूहिक नेतृत्व और केंद्रीय नेतृत्व की छवि के सहारे चुनाव लड़ा जाएगा।
नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी।
बीजेपी का तर्क है कि दिल्ली जैसे राज्यों में बिना मुख्यमंत्री चेहरे के भी चुनाव जीते जा चुके हैं और पार्टी की विचारधारा, संगठन तथा प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा ही सबसे बड़ा चुनावी हथियार है। लेकिन बंगाल की सियासत इस मॉडल के लिए सबसे कठिन परीक्षा मानी जा रही है। यहां ममता बनर्जी सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि पूरी राजनीति का केंद्र हैं एक ऐसा चेहरा, जो सत्ता, संगठन और जनभावनाओं तीनों को साधे हुए है।
सुवेंदु अधिकारी से लेकर सुकांत मजूमदार तक
पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने सुवेंदु अधिकारी को अनौपचारिक रूप से मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर आगे बढ़ाया था। नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराने के बाद वह बीजेपी के सबसे आक्रामक और चर्चित नेता बने और पार्टी ने 77 सीटें हासिल कीं। सुवेंदु अधिकारी को जमीनी संगठन, हिंदुत्व नैरेटिव और आक्रामक राजनीति में मजबूत माना जाता है।
हालांकि, पार्टी के भीतर नेतृत्व केवल सुवेंदु तक सीमित नहीं है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष अपने आक्रामक बयानों और कैडर आधारित राजनीति के लिए जाने जाते हैं। अग्निमित्रा पॉल तेज-तर्रार महिला नेता और मुखर हिंदुत्व चेहरा हैं, जिनकी विधानसभा और मीडिया में सक्रियता शहरी और महिला वोटरों में असर डालती है। सौमिक भट्टाचार्य संगठन और बौद्धिक वर्ग से संवाद का चेहरा माने जाते हैं, जबकि प्रदेश अध्यक्ष और सांसद सुकांत मजूमदार संगठन विस्तार और अनुशासन पर फोकस कर रहे हैं। इसके बावजूद पार्टी ने अभी तक किसी को भी औपचारिक मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित नहीं किया है।
टीएमसी का हमला: ‘दिल्ली से थोपी गई राजनीति’
तृणमूल कांग्रेस इस रणनीति को बीजेपी की कमजोरी बता रही है। टीएमसी का आरोप है कि बीजेपी के पास बंगाल में कोई मजबूत, सर्वमान्य चेहरा नहीं है, इसलिए वह सामूहिक नेतृत्व और केंद्रीय नेताओं के नाम पर चुनाव लड़ना चाहती है। ममता बनर्जी और टीएमसी नेताओं का कहना है कि बीजेपी बंगाल की राजनीति को दिल्ली से चलाना चाहती है और केंद्रीय एजेंसियों, ईडी और सीबीआई का इस्तेमाल कर चुनावी माहौल बनाने की कोशिश कर रही है।
ममता बनर्जी खुद सड़कों पर उतरकर यह संदेश दे रही हैं कि “बंगाल को बंगाल से ही चलाया जाएगा।” टीएमसी का दावा है कि बीजेपी बाहर से नेताओं को तोड़कर लाती है और उन्हें बंगाल की राजनीति का चेहरा बनाने की कोशिश करती है। सुवेंदु अधिकारी पर ममता के हालिया तीखे हमलों को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
विश्लेषकों की राय: बंगाल सबसे कठिन इम्तिहान
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, बीजेपी का सामूहिक नेतृत्व मॉडल कई राज्यों में सफल रहा है, लेकिन बंगाल इसके लिए सबसे कठिन परीक्षा है। भाषायी और सांस्कृतिक अस्मिता वाले राज्यों में बीजेपी की सफलता अक्सर मजबूत स्थानीय नेतृत्व पर निर्भर रही है। बंगाल में पार्टी के पास कई प्रभावशाली नेता हैं, लेकिन ममता बनर्जी के कद का कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं है।
दो राजनीतिक मॉडलों की सीधी टक्कर
कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल का चुनाव अब दो अलग-अलग राजनीतिक मॉडलों की लड़ाई बनता जा रहा है। एक तरफ बीजेपी है, जो सामूहिक नेतृत्व, नरेंद्र मोदी के नाम और हिंदुत्व-राष्ट्रवाद के एजेंडे पर भरोसा कर रही है। दूसरी तरफ ममता बनर्जी हैं, जो मजबूत चेहरे, जमीनी संगठन और बंगाली अस्मिता के साथ मुकाबले में उतरी हैं।
अब बड़ा सवाल यही है, क्या बीजेपी बिना मुख्यमंत्री चेहरे के सिर्फ सामूहिक नेतृत्व के भरोसे बंगाल की सत्ता तक पहुंच पाएगी, या ममता बनर्जी की जमीनी और व्यक्तित्व-आधारित राजनीति एक बार फिर भारी पड़ेगी? बंगाल का चुनाव इस सवाल का सबसे निर्णायक जवाब देगा।
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