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देशभर के अपराधी क्यों पहुंचे दिल्ली, तिहाड़ जेल जाने के लिए आखिर होड़ क्यों मचाए हैं कैदी?

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Apr 8, 2023, 07:00 AM IST

Tihar Jail Prisoners Queues: कोरोना के दौरान जेल से भीड़ को कम करने के लिए कई कैदियों को पेरोल या जमानत पर रिहा किया गया था। इसके बाद से ये कैदी बाहर थे। सुप्रीम कोर्ट ने इन कैदियों को दोबारा सरेंडर करने के लिए 15 दिन का समय दिया था।

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तिहाड़ जेल

Photo : BCCL

Tihar Jail: क्या आपने कभी सुना है कि जेल जाने के लिए भी होड़ मच सकती है? नहीं न...हालांकि, ऐसा जरूर हुआ है। दिल्ली में तिहाड़ जेल जाने के लिए कैदियों में होड़ मची हुई है, पूरे अनुशासन और सभ्य तरीके से बड़े-बड़े दुर्दांत अपराधी लाइन लगाए हुए हैं और अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। ये कैदी देशभर से दिल्ली की तिहाड़ जेल में सरेंडर करने के लिए पहुंचे हैं।

दरअसल, कैदियों की इस लंबी लाइन के पीछे सुप्रीम कोर्ट का एक अल्टीमेटम है, जिसकी समयसीमा आज यानी 8 अप्रैल को खत्म हो रही है। ऐसे में पुलिसिया सख्ती से बचने किे लिए देशभर के अपराधी तिहाड़ जेल के बाहर जमा हो गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 15 दिन में सरेंडर करने का दिया था आदेश

बता दें, कोरोना की पहली लहर के दौरान संक्रमण का खतरा कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कई कैदियों को जमानत या पैरोल पर रिहा किया था। ऐसा जेल से भीड़ को कम करने के लिए किया गया था। ये कैदी पिछले दो से तीन साल से जेल से बाहर चल रहे थे। बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी कैदियों को सरेंडर करने का आदेश दिया था। उन्हें 15 दिन का समय दिया गया था, जिसकी समयसीमा आज खत्म हो रही है।

चार हजार से ज्यादा कैदी हुए थे रिहा

कोरोना की पहली लहर को दौरान सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चार हजार से ज्यादा कैदियों को पेरोल या जमानत पर रिहा किया गया था। अप्रैल 2020 के आदेश के मुताबिक, 4683 कैदियों की रिहाई की गई थी। इसमें 1184 कैदी दोषी करार दिए गए थे, जबकि अन्य विचाराधीन कैदी थे। अब जब सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिया गया अल्टीमेटम खत्म हो रहा है तो ये कैदी सरेंडर करने के लिए तिहाड़ जेल के बाहर पहुंच गए हैं। जेल के बाहर कैदियों की एक लंबी लाइन देखी गई है और वे अपनी-अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।
प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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