Noida News: नोएडा के सेक्टर 21 स्थित स्टेडियम में एक ऐसा कैफे है। जिसे एसिड अटैक (Acid Attack Survivor) सर्वाइवर चलाती हैं। यह कैफे ऐसे लोगों द्वारा चलाया जा रहा है जिनको अभी तक हमारे समाज ने पूरी तरीके से नहीं अपनाया है। देश में हर साल करीब 100 मामले एसिड अटैक के आते हैं। जिनमें लड़कियों के चेहरे पर तेजाब डालकर उनका चेहरा खराब कर दिया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि यह लड़कियां अपने चेहरे को लेकर किसी के सामने न जा पाएं। किसी से नजर ना मिला पाए और जीवन भर मानसिक कुंठा में घुटने को मजबूर हो जाए। लेकिन इन सब के बीच नोएडा में चलाए जा रहे इस कैफे के लोगों के हौसले को आप सलाम करने से नहीं रोक पाएंगे।

कैफे की एक तस्वीर
शीरोज नाम कैसे पड़ा?
शीरोज नाम शी और हीरोज से मिलकर तैयार हुआ है। ये दिल्ली एनसीआर का पहला ऐसा कैफै है, जिसे एसिड अटैक सर्वाइवर लड़कियां चलाती हैं। इस कैफे को 7 से ज्यादा एसिड अटैक सर्वाइवर लड़कियां मिलकर चलाती हैं। ये वो लड़कियां हैं जो हादसे के बाद कई महीनों तक अपने घर रहीं। अपने आप को मजबूत किया और फिर से कुछ कर गुजरने की ठानी। ये लड़कियां सबके सामने आकर मेहनत कर रही हैं और अपना घर चला रही हैं।
कैफ में काम करती हैं एसिड सर्वाइवर
नोएडा प्राधिकरण ने की खास मदद
शीरोज हैंगआउट के PRO अजय तोमर बताते हैं कि एसिड अटैक सर्वाइवर की मदद करने में नोएडा प्राधिकरण का अहम योगदान रहा है। नोएडा अथॉरिटी ने उन्हें सेक्टर 21 स्थित स्टेडियम में जगह दी। प्राधिकरण के अलावा छांव फाउंडेशन ने भी उनकी मदद की। इसके अलावा समय-समय पर अलग-अलग NGO के माध्यम से उन्हें सामाजिक और आर्थिक तौर पर मदद मिलती रहती है।
आपस में मस्ती करती हुईं एसिड सर्वाइवर
आगरा से हुई शीरोज कैफे की शुरुआत
मिरर नाउ से बातचीत करते हुए पीआरओ अजय तोमर ने बताया कि शीरोज कैफे की शुरूआत साल 2014 में आगरा से हुई। उस समय छांव फाउंडेशन की मदद से एसिड अटैक सर्वाइवर की मदद करने की पहल की गई थी। इसके बाद साल 2016 में लखनऊ और 2021 में नोएडा में शीरोज हैंगआउट के दूसरे कैफे खोले गए।
कौन हैं नोएडा में शीरोज चलाने वाली एसिड अटैक सर्वाइवर
नोएडा में 7 से ज्यादा एसिड अटैक सर्वाइवर शीरोज कैफे का संचालन करती हैं। जिनमें हरियाणा के रोहतक की रहने वाली रितु, यूपी के बलरामपुर की रहने वाली नगमा, वहीं ओडिशा की रहने वाली मानिनि हैं। रितु पर 26 मई साल 2012 पर तेजाब से हमला किया गया था। वहीं नगमा पर साल 2014 और मानिनि पर 2016 में यह भयावह घटना घटी थी।
दीवार पर की गई पेंटिंग बहुत कुछ कहती है
