सड़क सुरक्षा, इमरजेंसी मेडिकल केयर और पैदल यात्रियों के अधिकारों से जुड़ी जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विश्वनाथन की बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट के पास पैदल यात्रियों की सुरक्षा और वाहनों की ओवरस्पीडिंग रोकने के उपायों पर गंभीरता से विचार किया। कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ सिग्नल लगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि वाहनों और पैदल यात्रियों की आवाजाही को समग्र रूप से देखकर समाधान निकालना होगा।
दिल्ली हाईकोर्ट के पास पैदल यात्रियों की मुश्किल
अमिकस क्यूरी और वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने बताया कि भारत मंडपम के बाद पैदल यात्रियों के लिए सड़क पार करने की पर्याप्त जगह नहीं है। करीब 100 मीटर आगे एक सिग्नल लगाया गया है। इस पर जस्टिस पारदीवाला ने पूछा- “क्या सिर्फ रेड लाइट लगाने से समस्या हल हो जाएगी?” अमिकस ने कहा कि इस पूरे इलाके का ट्रैफिक और पैदल यात्रियों की आवाजाही देखने के लिए विशेषज्ञों की मदद से कमेटी बनाई जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि पहले दिल्ली हाईकोर्ट की तरफ जाने के लिए राइट टर्न था, लेकिन अब वह बंद है। लोगों को बाईं ओर उतरकर सड़क पार करनी पड़ती है और वहां फुटओवर ब्रिज भी नहीं है।पुराना किला की खूबसूरती भी बनी चुनौती
सड़क पर कोई बड़ा निर्माण करने के सुझाव पर अमिकस ने कहा कि इससे पुराना किला का दृश्य और उसकी खूबसूरती प्रभावित हो सकती है। जस्टिस पारदीवाला ने दोनों सड़कों को जोड़ने वाले इन-बिल्ट ब्रिज का सुझाव दिया। इस पर ASG ने बताया कि एक तरफ पुराना किला है और दूसरी तरफ भी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अवशेष हैं। कोर्ट ने दिन खत्म होने तक इस मुद्दे पर एक पेज की नोट देने को कहा, ताकि उसे आदेश में शामिल किया जा सके।बुजुर्गों के लिए फुटओवर ब्रिज पर चढ़ना मुश्किल
अमिकस ने कहा कि उम्रदराज लोग फुटओवर ब्रिज पर चढ़ने में सक्षम नहीं होते। उन्होंने लिफ्ट लगाने का सुझाव दिया। साथ ही वाहनों की रफ्तार नियंत्रित करने के लिए रंबल स्ट्रिप्स और सड़क डिजाइन में बदलाव की बात कही।वाहन ट्रैकिंग डिवाइस पर केंद्र से रिपोर्ट तलब
सुप्रीम कोर्ट ने व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम डिवाइसेज के मुद्दे पर भी सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि 13 मई के आदेश में इस संबंध में कई निर्देश दिए गए थे। अमिकस ने बताया कि केंद्र के हलफनामे में वाहन निर्माताओं के साथ हुई बातचीत का जिक्र नहीं है। ASG ने बताया कि मोटर व्हीकल सोसाइटी के साथ बातचीत हुई है। उसके मुताबिक चार पहिया वाहनों में डिवाइस डीलरों की ओर से लगाए जा रहे हैं, लेकिन निर्माताओं की ओर से प्री-फिट नहीं किए जा रहे। इस पर अमिकस ने कहा कि अगर डिवाइस वाहन में पहले से फिट होंगे तो उनके अनुपालन की निगरानी करना आसान होगा।
जस्टिस पारदीवाला- निर्माता नहीं, नियम लागू कराना किसकी जिम्मेदारी?
जस्टिस पारदीवाला ने सवाल किया कि जब वैधानिक प्रावधान और नियम पहले से मौजूद हैं तो इन निर्देशों की जरूरत क्यों पड़ रही है। कोर्ट ने पूछा कि डीलर नियमों के मुताबिक वाहन बेच रहा है या नहीं, यह कौन सुनिश्चित करेगा? क्या इसकी जिम्मेदारी RTO पर डाली जानी चाहिए? कोर्ट ने यह भी पूछा कि जब वाहन PUC के लिए आता है तो क्या उस समय यह जांच नहीं हो सकती कि जरूरी डिवाइस लगाए गए हैं या नहीं। कोर्ट ने वाहन पर किसी तरह का प्रमाणपत्र लगाने की संभावना पर भी सवाल किया।स्पीड गवर्नर पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
अमिकस ने बताया कि ओवरस्पीडिंग बड़ी संख्या में मौतों की वजह बन रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि Vehicle Tracking System और Speed Limiting Device/Speed Limiting Function (SLD/SLF) अलग-अलग उद्देश्य पूरा करते हैं। जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि नियम 18 में अधिसूचित वाहनों में SLD/SLF के फिटमेंट का प्रावधान है, जिसे मैन्युफैक्चरिंग या डीलरशिप स्तर पर लगाया जाना है। उन्होंने मोटर व्हीकल एक्ट के सेक्शन 56 और संबंधित नियमों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि जब डीलर वाहन बेचकर उसकी डिलीवरी करता है, तब यह सुनिश्चित करने के लिए कोई प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए कि वाहन में जरूरी डिवाइस लगा हुआ है।
National Road Safety Board पर भी सुप्रीम कोर्ट की नजर
सुनवाई के दौरान नेशनल रोड सेफ्टी बोर्ड का मुद्दा भी उठा। जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि कानून में संशोधन के बाद सेक्शन 215 के तहत केंद्र को नेशनल रोड सेफ्टी बोर्ड गठित करना है और Section 215(2) में उसके कार्य निर्धारित हैं। कोर्ट को बताया गया कि बोर्ड का गठन 30 जून को हो चुका है और उसकी पहली बैठक 21 जुलाई को हुई थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने जानना चाहा है कि बोर्ड पूरी तरह कार्यशील हुआ है या नहीं। अगली सुनवाई में इसकी स्थिति बताने को कहा गया।यूपी के कानून पर भी सुप्रीम कोर्ट ने मांगी स्थिति
सुनवाई में उत्तर प्रदेश के एक कानून को लेकर भी सवाल उठा। अमिकस ने UP Criminal Law Composition of Abatement and Composition of Trials, 2023 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया। उनका कहना है कि कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिली और इसके चलते मोटर व्हीकल एक्ट से जुड़े कुछ आपराधिक मुकदमों के खत्म होने का असर हो सकता है। अमिकस ने मांग की कि ऐसे मामलों में खास तौर पर उन अपराधों की पहचान की जाए जिन अपराधों में समझौता करके मामला खत्म नहीं किया जा सकता, जिन अपराधों में सजा देना कानूनन जरूरी है या बार-बार अपराध करने वाले मामले हों। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से इस पर स्पष्ट स्थिति और रिपोर्ट मांगी।यूपी सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि गैर-समझौतायोग्य अपराधों, अनिवार्य सजा वाले अपराधों और दोहराए गए अपराधों पर मुकदमा न चलाने का कोई औचित्य नहीं है। हालांकि, कानून को चुनौती देने के मुद्दे पर राज्य से और स्पष्ट रिपोर्ट मांगी गई है।
