नई दिल्ली: सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील या पोर्नोग्राफिक सामग्री देखने पर रोक लगाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नीति बनाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि यह मामला कानून की व्याख्या से अधिक सरकार की नीति और तकनीकी विशेषज्ञता से जुड़ा हुआ है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे, ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को सरकार के संबंधित विभागों के समक्ष प्रतिनिधित्व देने की सलाह दी।
अदालत ने कहा- मुद्दा महत्वपूर्ण, लेकिन कानूनी हस्तक्षेप से बाहर
अदालत ने इसे लेकर अपने आदेश में कहा कि याचिका में उठाया गया मुद्दा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसमें ऐसा कोई कानूनी प्रश्न नहीं है जिस पर सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़े। यह विषय नीति निर्माण, तकनीकी प्रगति और विशेषज्ञों की राय से जुड़ा हुआ है, इसलिए इस पर फैसला लेना संबंधित मंत्रालयों और विशेषज्ञ संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में आता है।
किसने की थी पब्लिक प्लेस पर पोर्न देखने पर रोक की मांग?
बता दें कि यह जनहित याचिका सामाजिक कार्यकर्ता बी.एल. जैन की ओर से दायर की गई थी। पीठ के सामने उनका पक्ष अधिवक्ता वरुण ठाकुर रख रहे थे। याचिका में केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वह पोर्नोग्राफी की उपलब्धता और इसके उपयोग पर नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय नीति तैयार करे। साथ ही, नाबालिगों की पहुंच को रोकने और सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी प्रकार की अश्लील सामग्री देखने पर प्रतिबंध लगाने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की गई थी।
याचिका में दावा किया गया था कि इंटरनेट पर पोर्नोग्राफिक सामग्री की उपलब्धता तेजी से बढ़ी है और इसके कारण बड़ी संख्या में लोग इसकी लत का शिकार हो रहे हैं। इसमें यह भी कहा गया कि हर सेकंड हजारों पोर्न वेबसाइटों को देखा जाता है और इंटरनेट के जरिए बड़ी मात्रा में अश्लील वीडियो प्रसारित किए जा रहे हैं।
याचिका में क्या दी गई थी दलील?
याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका के पक्ष में यह भी दलील दी कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69ए के तहत केंद्र सरकार के पास आपत्तिजनक या अवांछित सामग्री तक सार्वजनिक पहुंच को रोकने की शक्ति मौजूद है।याचिका में यह भी दावा किया गया कि पोर्नोग्राफिक सामग्री की बढ़ती खपत का संबंध यौन अपराधों में वृद्धि से हो सकता है, हालांकि इस संबंध में अदालत ने कोई टिप्पणी नहीं की और मामले को नीतिगत दायरे का विषय माना।
