सबरीमाला में महिलाओं की एंट्री विवाद: 9 जजों की पीठ करेगी अब फैसला, 7 अप्रैल से शुरू होगी SC में सुनवाई
- Edited by: शिशुपाल कुमार
- Updated Feb 16, 2026, 01:22 PM IST
सुप्रीम कोर्ट ने केरल के शबरिमला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामलों की अंतिम सुनवाई के लिए नौ न्यायाधीशों की पीठ गठित करने का फैसला किया है।
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो- PTI)
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट किया कि केरल के सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और कथित भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर नौ न्यायाधीशों की पीठ अंतिम सुनवाई शुरू करेगी। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने बताया कि प्रधान न्यायाधीश द्वारा गठित की जाने वाली यह नौ सदस्यीय पीठ 7 अप्रैल 2026 से अहम सुनवाई प्रारंभ करेगी। अदालत ने संकेत दिया कि पूरी कार्यवाही 22 अप्रैल तक पूरी होने की संभावना है।
न्यायमित्र की नियुक्ति
सुनवाई के दौरान अदालत ने के. परमेश्वर और शिवम सिंह को ‘अदालत मित्र’ नियुक्त करने का निर्णय लिया। अदालत के अनुसार, शिवम सिंह सभी पक्षों के विचार न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। सबरीमाला फैसले की समीक्षा का समर्थन करने वाले पक्षों के लिए कृष्ण कुमार सिंह को नोडल अधिवक्ता नियुक्त किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश में क्या-क्या?
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्होंने उस फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन किया है, जिसमें सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी। अदालत के आदेश के मुताबिक, 7 से 9 अप्रैल तक पुनर्विचार याचिकाकर्ताओं या उनके समर्थन में पक्ष रखने वालों की दलीलें सुनी जाएंगी। 14 से 16 अप्रैल के बीच पुनर्विचार का विरोध करने वाले पक्षों को सुना जाएगा। यदि कोई प्रतिवाद शेष रहता है तो उसकी सुनवाई 21 अप्रैल को होगी, जिसके बाद अदालत मित्र अपनी अंतिम दलीलें पेश करेंगे।
पीठ ने सभी वकीलों को निर्धारित समय-सारणी का सख्ती से पालन करने का निर्देश भी दिया है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 4-1 के बहुमत से फैसला दिया कि सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति होगी। अदालत ने कहा कि जैविक आधार पर महिलाओं को प्रवेश से वंचित करना असंवैधानिक है। फैसले के बाद केरल में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। कई धार्मिक संगठनों और श्रद्धालुओं ने इसे परंपरा और आस्था में हस्तक्षेप बताया। इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले को व्यापक संवैधानिक सवालों—जैसे धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समानता के अधिकार—पर विचार के लिए बड़ी पीठ को सौंप दिया। अब यह मामला नौ जजों की संविधान पीठ के समक्ष विचाराधीन है।
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