SIR Row: चुनाव आयोग की ओर से चलाए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। इसी बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता आरके सिंह ने सोशल मीडिया पर एक लंबा ओपन लेटर जारी कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। आरके सिंह ने दावा किया कि एसआईआर की प्रक्रिया में कानून का उल्लंघन किया गया और मतदाता सूची से बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटाए गए।
आरके सिंह ने अपने पोस्ट की शुरुआत देशवासियों से सवाल करते हुए की कि अगर भारत को लोकतंत्र बनाए रखना है तो उन्हें यह समझना होगा कि एसआईआर के नाम पर क्या किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि CEC ज्ञानेश कुमार और उनके 'बॉस' कानून का उल्लंघन कर रहे हैं।
'पूरे देश में SIR का आदेश गैरकानूनी'
आरके सिंह ने अपने पत्र में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 का हवाला देते हुए दावा किया कि स्पेशल रिवीजन केवल विशेष परिस्थितियों में और लिखित कारणों के आधार पर किया जा सकता है। उनका आरोप है कि पूरे देश में एक साथ गहन पुनरीक्षण का आदेश देना कानून के अनुरूप नहीं था। उन्होंने सवाल उठाया कि पूरे देश में SIR कराने का फैसला आखिर किसने लिया? पूरे चुनाव आयोग ने या सिर्फ CEC ज्ञानेश कुमार ने?
यह सवाल ऐसे समय में आया है जब SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की रिपोर्ट सामने आई हैं। मीडिया रिपोर्टों में चुनाव आयुक्त एसएस संधू और विवेक जोशी की ओर से कुछ फैसलों पर आपत्तियों का जिक्र किया गया है। हालांकि आयोग ने कहा है कि उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
आरके सिंह ने आरोप लगाया कि SIR के दौरान पुराने मतदाता रोल में दर्ज लोगों के नाम हटाए गए और कई मामलों में अपील लंबित होने के बावजूद नई सूची का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने RP Act की धारा 22 का हवाला देते हुए कहा कि किसी मतदाता का नाम हटाने का अधिकार निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी यानी ERO के पास है और इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। आरके सिंह का दावा है कि 2003 के बाद मतदाता सूची में जोड़े गए कई लोगों के नाम बिना पर्याप्त जांच और बिना नोटिस के हटा दिए गए। उन्होंने इसे कानून के खिलाफ बताया।
'वोटर पर ही डाल दिया गया पात्रता साबित करने का बोझ'
आरके सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के लाल बाबू हुसैन बनाम निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी मामले का भी जिक्र किया। उनका कहना है कि किसी मतदाता को अयोग्य ठहराने के लिए संबंधित प्राधिकरण या आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति को आधार और सबूत देने चाहिए, न कि मतदाता को ही अपनी पात्रता साबित करने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए।
आरके सिंह के मुताबिक एसआईआर में कई लोगों को नए मतदाता के रूप में Form 6 भरने और अपनी पात्रता से जुड़े दस्तावेज देने पड़े। उन्होंने आरोप लगाया कि इससे गरीब, मजदूर और ऐसे लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए जिनके पास जन्म प्रमाणपत्र या पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।
फॉर्म 6 में नए एपेंडिक्स को लेकर सवाल
आरके सिंह ने फॉर्म 6 में जोड़े गए एक नए एपेंडिक्स को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। उनके मुताबिक इस एपेंडिक्स में आवेदक से 2003 की मतदाता सूची में अपने माता-पिता के नाम का सीरियल नंबर बताने को कहा गया। उन्होंने सवाल किया कि 18 साल का कोई नया मतदाता 2026 में 2003 की मतदाता सूची कहां से और कैसे हासिल करेगा? उन्होंने आरोप लगाया कि इस वजह से युवा मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन में परेशानी हुई।
यह मुद्दा हालिया एसआईआर विवाद में भी प्रमुख रहा है। इंडियन एक्स्प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को लेकर चुनाव आयोग के भीतर आपत्तियां दर्ज की गई थीं।
'बड़ी संख्या में फॉर्म 7 पर आपत्तियां कैसे स्वीकार हुए?'
आरके सिंह ने मतदाताओं के नाम हटाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 7 को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि अगर बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटाने के लिए बड़ी संख्या में में आपत्तियां दाखिल की गईं, तो इन्हें किसने दाखिल किया और चुनाव अधिकारियों ने इन्हें किस आधार पर स्वीकार किया? उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जिन लोगों के नाम से आपत्तियां दाखिल की गईं, क्या वे व्यक्तिगत रूप से अधिकारियों के सामने पेश हुए थे? इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आरके सिंह की पोस्ट से नहीं होती है।
बंगाल के 16 लाख मतदाताओं का भी जिक्र
आरके सिंह ने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए दावा किया कि करीब 16 लाख ऐसे मतदाता, जिन्हें ERO ने वैध पाया था, अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सके क्योंकि चुनाव आयोग की ओर से उनके खिलाफ अपील की गई थी।
उन्होंने सवाल किया कि ये अपील किस आधार पर दाखिल की गईं और इन्हें दाखिल करने का अधिकार किसने दिया। आरके सिंह ने दावा किया कि इन मतदाताओं के वोट देने का अधिकार प्रभावित हुआ।
एसआईआर और मतदाता सूची को लेकर पश्चिम बंगाल में पहले से राजनीतिक विवाद चल रहा है और विपक्षी दल चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाते रहे हैं।
'तार्किक विसंगति' पर भी उठाए सवाल
आरके सिंह ने SIR में इस्तेमाल किए जा रहे 'तार्किक विसंगति' के नियम को लेकर भी सवाल उठाया। उनके मुताबिक ग्रामीण और गरीब परिवारों में बच्चों और माता-पिता की उम्र कई बार अनुमान के आधार पर दर्ज होती है। ऐसे परिवारों के पास जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज भी नहीं होते।
आरके सिंह ने दावा किया कि पिता और बच्चे की उम्र के बीच एक निश्चित अंतर से कम पाए जाने पर इसे 'तार्किक विसंगति' मानकर कई नामों को सूची से बाहर किया गया।
उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में संबंधित मतदाता की सुनवाई होनी चाहिए थी।
'सबसे ज्यादा असर गरीबों पर'
आरके सिंह ने अपने पत्र में SIR के सामाजिक प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई। उनका दावा है कि मतदाता सूची से बाहर होने वाले लोगों में गरीब, मजदूर और दूसरे राज्यों में काम करने वाले लोग बड़ी संख्या में हैं। उन्होंने कहा कि रोज कमाकर खाने वाला व्यक्ति एक महीने के लिए अपने गांव या शहर वापस आकर दस्तावेज जुटाने और प्रक्रिया पूरी करने में सक्षम नहीं हो सकता। उन्होंने सवाल किया कि अगर किसी व्यक्ति के पास जन्म प्रमाणपत्र या दूसरे दस्तावेज नहीं हैं तो क्या सिर्फ इस वजह से उसका वोट का अधिकार प्रभावित होना चाहिए?
'अवैध प्रवासियों पर नहीं, गरीब भारतीयों पर असर'
आरके सिंह ने अपने पत्र में अवैध प्रवासियों को लेकर भी दावा किया। उनका आरोप है कि SIR की प्रक्रिया का सबसे ज्यादा असर गरीब भारतीय नागरिकों पर पड़ा है, जबकि अवैध रूप से भारत में आने वाले लोगों के पास पहले से दस्तावेज मौजूद हो सकते हैं। आरके सिंह ने चुनाव आयोग के डिजिटल वोटर सिस्टम को लेकर भी सवाल उठाया।
उनका आरोप है कि 'तार्किक विसंगति' के नाम पर डिजिटल सिस्टम कई लोगों के नाम शामिल होने से रोक रहा है। उन्होंने दावा किया कि कानून के तहत मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की जिम्मेदारी ERO की है, लेकिन एसआईआर के दौरान प्रक्रिया को केंद्रीकृत किया गया। आरके सिंह ने आरोप लगाया कि दो चुनाव आयुक्तों ने भी इस तरह के केंद्रीकरण को लेकर आपत्ति जताई थी।
हालिया रिपोर्टों में चुनाव आयोग के भीतर डिजिटल सिस्टम और मतदाता सूची से संबंधित प्रक्रियाओं पर मतभेदों का जिक्र हुआ है। इसके बाद ECI ने ECINET सॉफ्टवेयर की स्वतंत्र तकनीकी समीक्षा कराने का फैसला भी बताया है।
आरके सिंह ने अपने पोस्ट में दावा किया कि एसआईआर के जरिए अब तक 13 करोड़ नाम हटाए जा चुके हैं और यह प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। उन्होंने इसे कुल मतदाताओं का करीब 13 फीसदी बताया और 2024 लोकसभा चुनाव में एनडीए और इंडी गठबंधन के बीच वोट शेयर के अंतर का हवाला देते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने का चुनावों पर असर पड़ सकता है।
'CEC ने खुद लिए फैसले या किसी के निर्देश पर?'
आरके सिंह ने सबसे बड़ा सवाल यही उठाया कि जिन फैसलों को लेकर वह आपत्ति जता रहे हैं, वे आखिर किसके निर्देश पर लिए गए। उन्होंने पूछा कि क्या ये फैसले CEC ज्ञानेश कुमार ने खुद लिए या किसी दूसरे व्यक्ति अथवा संस्था के निर्देश पर लिए गए।
उन्होंने चुनाव आयोग के अंदर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हुए दावा किया कि Form 6 के एपेंडिक्स को जोड़ने का फैसला दो चुनाव आयुक्तों की असहमति के बावजूद किया गया।दूसरी ओर चुनाव आयोग ने 26 सितंबर की बैठक के बाद कहा कि SIR समेत आयोग के प्रमुख फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। आरके सिंह ने अपने पत्र में कहा कि विपक्ष की ओर से CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की बात की जा रही है, लेकिन उनके मुताबिक यह पर्याप्त नहीं होगा। उन्होंने विपक्षी दलों से आपराधिक मामले दर्ज कराने की मांग की।
'चुनाव में हिस्सा न लेने' की अपील की
आरके सिंह ने अपने पत्र में विपक्षी दलों के लिए एक बड़ा राजनीतिक सुझाव भी दिया। उन्होंने कहा कि सभी विपक्षी दलों को एकजुट होकर तब तक चुनाव में हिस्सा नहीं लेना चाहिए जब तक CEC और चुनाव आयुक्त इस्तीफा नहीं देते और नई नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव नहीं किया जाता। उन्होंने यह भी मांग की कि जिन राज्यों में मतदाता सूची से संबंधित अपील लंबित थीं, वहां हुए चुनावों को रद्द कर दोबारा चुनाव कराया जाए।
ईवीएम को लेकर भी सवाल
आरके सिंह ने ईवीएम पर भी सवाल उठाया। उन्होंने दावा किया कि कोई भी इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम पूरी तरह हैक-प्रूफ नहीं हो सकता और इसलिए चुनाव बैलेट पेपर से कराए जाने चाहिए। उन्होंने यह भी दावा किया कि आर्थिक और डिजिटल रूप से विकसित कई देश ईवीएम का इस्तेमाल नहीं करते।
यह दावा भी संदर्भ के साथ देखने की जरूरत है। अलग-अलग देशों में मतदान प्रणाली उनकी अपनी कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था के अनुसार अलग है। इसलिए केवल यह तथ्य कि कोई देश EVM इस्तेमाल नहीं करता, अपने आप में भारत की EVM प्रणाली के बारे में कोई निष्कर्ष नहीं देता।
सुप्रीम कोर्ट पर भी साधा निशाना
आरके सिंह ने SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट के रुख की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि एसआईआर को लेकर अदालत का फैसला गलत था और सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा पर सवाल उठाया। उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून को लेकर लंबित चुनौती पर भी सवाल उठाया और कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति ऐसी समिति से होनी चाहिए जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज शामिल हों।
SIR विवाद पर चुनाव आयोग ने क्या दी सफाई?
चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को जारी स्पष्टीकरण में कहा कि SIR और उससे जुड़े फैसले आयोग के तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने यह भी कहा कि आगे से बैठकों के एजेंडे पहले साझा किए जाएंगे और बैठक के मिनट्स जारी किए जाएंगे। आयोग ने ECINET सॉफ्टवेयर की समीक्षा के लिए एक समिति बनाने, कुछ मामलों में सुनवाई की प्रक्रिया आसान करने और कुछ राज्यों में दावे-आपत्तियों की समयसीमा बढ़ाने जैसे कदमों की भी जानकारी दी है।
