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चुनावी बॉन्ड्स पर SC ने सुरक्षित रखा फैसलाः कहा- केंद्र-दानदाताओं के बीच इसे नहीं बनना चाहिए 'प्रतिकर' का जरिया

  • Edited by: टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल
  • Updated Nov 2, 2023, 11:59 PM IST

पीठ ने पूछा, ‘‘अगर ऐसा है तो सब कुछ मुक्त क्यों नहीं कर दिया जाता?" न्यायालये ने तीन दिनों तक दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश ने कुछ बिंदुओं पर विचार की आवश्यकता जताई।

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तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फाइल)

Photo : BCCL

उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि राजनीतिक दलों के चंदे से संबंधित चुनावी बॉण्ड योजना को सत्ता के केंद्रों और दानदाताओं के बीच ‘प्रतिकर’ का एक जरिया नहीं बनना चाहिए। न्यायालय ने चुनावी प्रक्रिया में नकदी का प्रभाव कम करने की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि विधायिका और कार्यपालिका एक ऐसी प्रणाली तैयार कर सकती है, जिसमें इस योजना की ‘खामियां’ न हों और यह अधिक पारदर्शी हो।

पीठ ने चुनावी बॉण्ड की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बहस के दौरान केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा, ‘‘आप अब भी एक ऐसी प्रणाली तैयार कर सकते हैं, जो आनुपातिक तरीके से संतुलन बनाए, बस यही कहना है।’’ संविधान पीठ ने 31 अक्टूबर को चार याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू की थी। इनमें कांग्रेस नेता जया ठाकुर, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) तथा गैर-सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) की याचिकाएं शामिल हैं।

संविधान पीठ में न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बी. आर. गवई, न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल थे। पीठ ने कहा कि जैसे ही किसी राजनीतिक दल को चुनावी बॉण्ड दिया जाता है, तो पार्टी को पता चल जाता है कि इसे किसने दिया है। मेहता ने कहा, "हां, उस पक्ष को पता चल जाएगा। दान देने वाला नहीं चाहता कि दूसरे पक्ष को इसकी जानकारी न हो।" उन्होंने कहा, "हमें व्यावहारिकता के आधार पर नीति बनानी होगी।" उन्होंने कहा कि हर पार्टी को पता है कि उन्हें चंदा देने वाले कौन हैं और अन्य पार्टी के संबंध में गोपनीयता की आवश्यकता है।

पीठ ने पूछा, ‘‘अगर ऐसा है तो सब कुछ मुक्त क्यों नहीं कर दिया जाता?" न्यायालये ने तीन दिनों तक दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश ने कुछ बिंदुओं पर विचार की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा, ‘‘पहला, चुनावी प्रक्रिया में नकदी को कम करने की आवश्यकता है। दूसरा, उस उद्देश्य के लिए अधिकृत बैंकिंग चैनल के उपयोग को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है और यही एकमात्र तरीका है जिससे आप नकदी कम कर सकते हैं। तीसरा, बैंकिंग चैनल के उपयोग को प्रोत्साहित करना है।’’ न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, ‘‘चौथा बिंदु, पारदर्शिता की आवश्यकता है और पांचवीं बात यह है कि इा योजना को सत्ता के केंद्रों और दानदाताओं के बीच ‘प्रतिकर’ का एक जरिया नहीं बनना चाहिए।’’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि पहले कंपनियों द्वारा दान देने की सीमा थी, लेकिन अब बिना ‘टर्नओवर’ वाली कंपनी भी दान दे सकती है। मेहता ने कहा कि मौजूदा योजना दानदाताओं को पारदर्शी तरीके से भुगतान करने का विकल्प देती है। जब मेहता ने इस मुद्दे से निपटने में सरकार के सकारात्मक दृष्टिकोण का उल्लेख किया, तो पीठ ने कहा, ‘‘हमें सरकार के मकसद में बिल्कुल भी जाने की ज़रूरत नहीं है। एक संविधान पीठ के तौर पर हमारा काम सरकार के उद्देश्यों से निपटने का नहीं है।’’ अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने भी इस मामले में अपनी दलीलें दीं।

पीठ ने कहा, "आज हमारे पास एक रूपरेखा है। हम उस रूपरेखा की वैधता का परीक्षण कर रहे हैं।" याचिकाकर्ताओं में से एक एडीआर की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने अपने प्रत्युत्तर में कहा कि ऐसे सबूत हैं जो बताते हैं कि लगभग सभी चुनावी बॉण्ड या तो केंद्र या राज्यों में सत्तारूढ़ दलों के पास गए हैं। उन्होंने कहा कि कुछ राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए चुनावी बॉण्ड कभी भी जारी किये जा सकते हैं।

सरकार की ओर से दो जनवरी 2018 को अधिसूचित इस योजना को ‘राजनीतिक फंडिंग’ में पारदर्शिता लाने के प्रयासों के तहत विभिन्न दलों को दिए जाने वाले नकद चंदे के विकल्प के रूप में पेश किया गया था। योजना के प्रावधानों के अनुसार, चुनावी बॉण्ड भारत के किसी भी नागरिक या भारत में निगमित या स्थापित इकाई द्वारा खरीदा जा सकता है। कोई भी व्यक्ति अकेले या अन्य व्यक्तियों के साथ संयुक्त रूप से चुनावी बॉण्ड खरीद सकता है। केवल जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत पंजीकृत राजनीतिक दल और लोकसभा या राज्य विधानसभा के पिछले चुनाव में कम से कम एक प्रतिशत वोट हासिल करने वाले दल चुनावी बॉण्ड प्राप्त करने के पात्र हैं।

अधिसूचना के अनुसार, चुनावी बॉण्ड को पात्र राजनीतिक दल द्वारा केवल अधिकृत बैंक के खाते के माध्यम से भुनाया जाएगा। शीर्ष अदालत ने अप्रैल 2019 में चुनावी बॉण्ड योजना पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था और यह स्पष्ट कर दिया था कि वह याचिकाओं पर गहन सुनवाई करेगी, क्योंकि केंद्र और निर्वाचन आयोग ने ‘महत्वपूर्ण मुद्दे’ उठाए थे, जिनका देश की चुनाव प्रक्रिया की शुचिता पर ‘व्यापक प्रभाव’ था।

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