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'संविधान को कभी स्वीकार्य नहीं किया, इसलिए प्रस्तावना में बदलाव चाहता है RSS', कांग्रेस नेता जयराम ने बोला हमला

कांग्रेस नेता ने कहा कि संविधान चूंकि 'मनुस्मृति के हिसाब' से नहीं लिखा गया, इसलिए वह इसे पसंद नहीं करती है। रमेश ने आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय हसबोले के बयान का जवाब देते हुए यह बात कही। हसबोले ने गुरुवार को कहा कि 'संविधान में समाजवादी एवं धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्द जबरन डाले गए। इस पर दोबारा से विचार करना चाहिए।'

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जयराम रमेश ने आरएसएस पर साधा निशाना।

Jairam Ramesh : कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने शुक्रवार को कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने कभी भी संविधान को स्वीकार्य नहीं किया। वह शुरुआत से ही संविधान निर्माताओं पर हमले करती आई है। कांग्रेस नेता ने कहा कि संविधान चूंकि 'मनुस्मृति के हिसाब' से नहीं लिखा गया, इसलिए वह इसे पसंद नहीं करती है। रमेश ने आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय हसबोले के बयान का जवाब देते हुए यह बात कही। हसबोले ने गुरुवार को कहा कि 'संविधान में समाजवादी एवं धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्द जबरन डाले गए। इस पर दोबारा से विचार करना चाहिए।' हसबोले ने यह टिप्पणी आपातकाल के 50वें वर्ष पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कही।

'संविधान मनुस्मृति से प्रेरित नहीं इसलिए पसंद नहीं'

रमेश ने 'एक्स' पर पोस्ट किया, "आरएसएस ने कभी भी भारत के संविधान को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। इसने 30 नवंबर, 1949 के बाद से डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू और इसके निर्माण में शामिल अन्य लोगों पर निशाना साधा। आरएसएस के अपने शब्दों में संविधान मनुस्मृति से प्रेरित नहीं था।" उन्होंने दावा किया कि आरएसएस और भाजपा ने बार-बार नए संविधान का आह्वान किया है। रमेश ने कहा, "2024 के लोकसभा चुनाव में यही प्रधानमंत्री मोदी का चुनावी नारा था। लेकिन भारत की जनता ने इस नारे को निर्णायक रूप से खारिज कर दिया। फिर भी, संविधान के मूल ढांचे को बदलने की मांग लगातार आरएसएस के तंत्र द्वारा की जाती रही है।

'...तब ये शब्द जोड़े गए'

उन्होंने उच्चतम न्यायालय के एक फैसले की प्रति साझा करते हुए कहा, 'भारत के प्रधान न्यायाधीश ने स्वयं 25 नवंबर, 2024 को उसी मुद्दे पर एक फैसला सुनाया था, जिसे अब एक प्रमुख आरएसएस पदाधिकारी द्वारा फिर से उठाया जा रहा है। क्या वे कम से कम उस फैसले को पढ़ने का कष्ट करेंगे?" आपातकाल पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आरएसएस सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने कहा था, ‘बाबासाहेब आंबेडकर ने जो संविधान बनाया, उसकी प्रस्तावना में ये शब्द कभी नहीं थे। आपातकाल के दौरान जब मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, संसद काम नहीं कर रही थी, न्यायपालिका पंगु हो गई थी, तब ये शब्द जोड़े गए।’

उन्होंने कहा था कि इस मुद्दे पर बाद में चर्चा हुई लेकिन प्रस्तावना से उन्हें हटाने का कोई प्रयास नहीं किया गया। होसबोले ने कहा, ‘इसलिए उन्हें प्रस्तावना में रहना चाहिए या नहीं, इस पर विचार किया जाना चाहिए।’

Alok Rao
आलोक कुमार रावauthor

19 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय आलोक राव ने प्रिंट, न्यूज एजेंसी, टीवी और डिजिटल चारों ही माध्यमों में काम किया है। इस लंबे अनुभव ने उन्हें समाचारों की समझ, प्रेजेंटेशन, डिटेलिंग और न्यूजरूम डायनेमिक्स में असाधारण दक्षता प्रदान की है। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों में विशेष रुचि रखने के साथ-साथ जियो-पॉलिटिक्स एवं डिफेंस की स्टोरीज में इनकी खासी दिलचस्पी है। आलोक ने अलग-अलग माध्यमों में काम करते हुए समाचारों की समझ, प्रस्तुति और विश्लेषण में मजबूत दक्षता विकसित की है और अब तक 25,000 से अधिक आर्टिकल तैयार कर चुके हैं। तथ्यों की गहन जांच, मजबूत न्यूज सेंस और तेज निर्णय क्षमता उनकी पत्रकारिता की प्रमुख खासियतें हैं।

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