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आरक्षण, हिंदुत्व और संघ के पंजीकरण पर RSS सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले के बेबाक बोल, जानें- क्या कहा?

RSS Reservation Review Statement: RSS के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने आरक्षण, हिंदुत्व और संघ के पंजीकरण पर स्पष्ट विचार रखे हैं। उन्होंने कहा कि जब तक भेदभाव खत्म नहीं होता, तब तक आरक्षण रहना चाहिए।

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आरक्षण, हिंदुत्व और संघ के पंजीकरण पर RSS सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले के बेबाक बोल, जानें- क्या कहा?

Dattatreya Hosabale: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने देश के कई ज्वलंत मुद्दों पर संघ का स्पष्ट रुख सामने रखा है। आरक्षण की समीक्षा, हिंदुत्व की परिभाषा और संघ के पंजीकरण (Registration) जैसे विषयों पर उनके बयान राजनीतिक हलकों में खासे चर्चा का विषय बने हुए हैं।

1. आरक्षण पर रुख: 'जब तक भेदभाव खत्म न हो, तब तक रहना चाहिए आरक्षण'

आरक्षण के मुद्दे पर बात करते हुए दत्तात्रेय होसबाले ने स्पष्ट किया कि समाज में समानता लाने और ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिए यह व्यवस्था जरूरी है:

भेदभाव समाप्त होने तक समर्थन: जिन लोगों के साथ अतीत में भेदभाव हुआ है और जो सामाजिक रूप से पिछड़े हुए हैं, उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था तब तक जारी रहनी चाहिए जब तक समाज से यह भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता।

पात्रों को मिले लाभ: उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आरक्षण का वास्तविक और सही लाभ उन लोगों तक पहुंचना चाहिए जो वास्तव में इसके पात्र हैं।

वोटबैंक पॉलिटिक्स से दूर: होसबाले ने दो टूक कहा कि आरक्षण जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दे पर किसी भी प्रकार की राजनीति या वोटबैंक की गंदी राजनीति नहीं होनी चाहिए।

2. हिंदुत्व और पहचान: 'हिंदू है तो ही हिंदुत्व है'

हिंदू और हिंदुत्व की वैचारिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए सरकार्यवाह ने कहा:

अटूट संबंध: 'हिंदू है तो ही हिंदुत्व है और हिंदुत्व ही हर हिंदू की असली पहचान है।'

उनका यह बयान सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उस दृष्टिकोण को रेखांकित करता है जिसमें भारतीय संस्कृति और जीवन पद्धति को राष्ट्र की मूल आत्मा माना गया है।

3. RSS का पंजीकरण और कानूनी स्थिति: 'संघ समाज से अलग नहीं'

संघ के रजिस्ट्रेशन और कानूनी पहलुओं पर बात करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि:

समाज का हिस्सा: संघ कोई अलग या बाहरी इकाई नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर समाज को संगठित करने और राष्ट्र निर्माण का कार्य करने वाला संगठन है।

कानून और पंजीकरण: देश का कानून भी इस बात की मांग नहीं करता कि समाज को संगठित करने जैसे रचनात्मक कार्यों के लिए किसी प्रकार के अनिवार्य पंजीयन की आवश्यकता हो।

न्यायालय का रुख: उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कहीं (जैसे तमिलनाडु में) स्थानीय सरकारों द्वारा अनुमति नहीं भी दी जाती है, तो न्यायपालिका से इस दिशा में स्पष्ट अनुमति और अधिकार प्राप्त होते हैं।

Nitin Arora
नितिन अरोड़ाauthor

नितिन अरोड़ा टाइम्स नाउ नवभारत में न्यूज डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया में उनका 6 वर्षों का अनुभव है। वह राजनीति, देश–विदेश की बड़ी घटनाओं और समसामयिक मुद्दों को गहराई से समझकर उन्हें सटीक और सरल भाषा में प्रस्तुत करने में माहिर हैं। उन्होंने अपने करियर में लगातार करंट अफेयर्स, पॉलिटिकल डेवलपमेंट्स, डिप्लोमैटिक घटनाएं और डिफेंस सेक्टर से जुड़े विषयों पर प्रभावशाली कॉन्टेंट तैयार किया है और अबतक 6 हजार से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं। विभिन्न टॉपिक्स पर एक्सप्लेनेर, डेटा-आधारित रिपोर्ट्स और विश्लेषणात्मक कॉपी लिखने में उनकी मजबूत पकड़ है।

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