कांग्रेस नेता राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की लोकसभा की सदस्यता छिनी जा चुकी है। उन्हें दो साल की सजा हो चुकी है और कई मामले कोर्ट में लंबित हैं। जिसमें से मानहानि और भ्रष्टाचार के मामले शामिल हैं। राहुल गांधी को जब सजा हुई और उनकी सदस्यता जाने की बात कही जाने लगी, तब सबसे ज्यादा उस अध्यादेश की चर्चा होने लगी, जिसे अगर राहुल गांधी ने नहीं रोका होता तो आज उनकी सदस्यता नहीं जाती।
लालू यादव को बचाने वाला अध्यादेश!
बात यूपीए 2 की है। साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला सुनाया था, जिसमें कहा गया था कि अगर किसी सांसद या विधायक को दो साल या उससे अधिक की सजा होती है तो उनकी सदस्यता रद्द हो जाएगी। इस फैसले का सबसे ज्यादा प्रभाव तब राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव पर पड़ने वाला था। लालू यादव के खिलाफ चारा घोटाले की सुनवाई चल रही थी और उस पर जल्द ही फैसला आने वाला था। लालू तब कांग्रेस और सोनिया गांधी के काफी करीब थे। सरकार में शामिल भी थे। जिसके बाद मनमोहन सिंह की सरकार ने एक अध्यादेश लाने की घोषणा की। इस अध्यादेश से सुप्रीम कोर्ट का फैसला बेअसर हो जाता है। इस अध्यादेश को पारित भी कर दिया गया था।
राहुल गांधी की वो राजनीतिक भूल!
इस अध्यादेश के बारे में बताने के लिए 24 सितंबर 2013 को सरकार की तरफ से एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाया गया था। जिसमें इस अध्यादेश के बारे में बताया जाना था। बीच प्रेस कांफ्रेंस में राहुल गांधी की एंट्री होती है और वो इस अध्यादेश को बकवास करार दे देते हैं। राहुल गांधी कहते हैं- "यह अध्यादेश बकवास है, इसे फाड़कर फेंक देना चाहिए।"
और फाड़ दी कॉपी
अब याद आ रही होगी गलती!
अब जब राहुल गांधी की सदस्यता जा चुकी है, तब उन्हें शायद इस गलती का अहसास हो रहा होगा। कहा जा रहा है कि अगर यह अध्यादेश लागू हो जाता तो आज राहुल गांधी की सदस्यता नहीं जाती।
