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समलैंगिक शादी को कानूनी मान्यता नहीं, SC की संवैधानिक पीठ के फैसले की 10 मुख्य बातें

  • Written by: टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल
  • Updated Oct 17, 2023, 01:35 PM IST

Supreme Court Verdict On Same Sex Marriage: प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा कि केंद्र एवं राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए लैंगिक झुकावों के चलते एलजीबीटीक्यू समुदाय के साथ किसी तरह का भेदभाव न हो। यह समुदाय भी अन्य नागरिकों की तरह हर तरह की सुविधाएं पाने का हकदार है। कोर्ट ने सरकार को एक समिति बनाने का निर्देश दिया है। यह समिति समलैंगिक समुदाय को सुविधाएं देने पर विचार करेगी।

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समलैंगिक शादी के कानूनी अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला।

Photo : PTI

Supreme Court Verdict On Same Sex Marriage: समलैंगिक समुदाय को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को अपना अहम फैसला सुनाते हुए सेम-सेक्स की शोदी को कानूनी मान्यता देने से इंकार कर दिया। शादी को कानूनी मान्यता देने की अर्जियों को प्रधान न्यायाधीश की अगुवाई वाली संवैधानिक पीठ ने 3-2 के अपने फैसले से खारिज कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने समुदाय को सुरक्षा, लाभ एवं सेवाएं देने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों को निर्देश दिया। प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा कि केंद्र एवं राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए लैंगिक झुकावों के चलते एलजीबीटीक्यू समुदाय के साथ किसी तरह का भेदभाव न हो। यह समुदाय भी अन्य नागरिकों की तरह हर तरह की सुविधाएं पाने का हकदार है। कोर्ट ने सरकार को एक समिति बनाने का निर्देश दिया है। यह समिति समलैंगिक समुदाय को सुविधाएं देने पर विचार करेगी।

  1. उच्चतम न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इंकार किया। न्यायमूर्ति हिमा कोहली ने न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट्ट के लिखे फैसले से सहमति जताई। न्यायमूर्ति भट्ट ने कहा कि समलैंगिक जोड़ों को बिना किसी बाधा एवं परेशानी के एक साथ रहने का अधिकार है। जस्टिस भट्ट ने प्रधान न्यायाधीश, न्यायमूर्ति कौल की इस बात से सहमति जताई कि संविधान में विवाह के किसी मौलिक अधिकार की गारंटी नहीं दी गई है। उन्होंने कहा कि कानून के अभाव में विवाह का कोई योग्य अधिकार नहीं है। गोद लेने के समलैंगिक जोड़ों के अधिकार पर प्रधान न्यायाधीश से असहमति जताई और कहा कि उन्होंने कुछ चिंताएं व्यक्त की हैं। जस्टिस भट्ट ने कहा कि वह प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ के कुछ विचारों से सहमत और कुछ से असहमत हैं।
  2. जस्टिस कौल ने अपना फैसला पढ़ते हुए कहा कि सेम-सेक्स समुदाय को कानूनी मान्यता शादी की समानता की तरफ एक बढ़ा हुआ कदम है। हालांकि, शादी ही अंतिम पड़ाव नहीं है। हमें स्वायत्तता बनाए रखना चाहिए क्योंकि यह दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं करता। जस्टिस किशन कौल ने कहा कि 'गैर-विपरीत लिंग वाला समुदाय संविधान के तहत सुरक्षा पाने का अधिकारी है।'
  3. कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार एवं केंद्र शासित प्रदेश समलैंगिक समुदाय को देश का हिस्सा बनने के अधिकार पर भेदभाव नहीं कर सकतीं। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि समलैंगिक समुदाय के व्यक्तियों के अधिकारों एवं उनकी पात्रता पर निर्णय करने के लिए केंद्र सरकार एक समिति बनाएगी। यह समिति समलैंगिक जोड़ों को राशन कार्ड में 'परिवार'के रूप में शामिल करने पर विचार करेगी। ग्रेच्युटी, पेंशन से जुड़े अधिकारों एवं संयुक्त बैंक अकाउंट्स में समलैंगिक जोड़े किसी को नामित कर सकें, समिति इसका रास्ता निकालेगी।
  4. अविवाहित जोड़ों को गोद लेने से बाहर नहीं रखा गया है, लेकिन नियम 5 यह कहकर उन्हें रोकता है कि जोड़े को 2 साल तक स्थिर वैवाहिक रिश्ते में रहना होगा। जेजे अधिनियम अविवाहित जोड़ों को गोद लेने से नहीं रोकता है, लेकिन केवल तभी जब CARA इसे नियंत्रित करता है लेकिन यह JJ अधिनियम के उद्देश्य को विफल नहीं कर सकता है।
  5. प्रधान न्यायाधीश ने केंद्र एनं राज्य सरकारों को समलैंगिक लोगों के अधिकारों के बारे में जागरूक करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने अपने निर्देश में कहा है कि सरकारें समलैंगिक जोड़ों के लिए 'गरिमा गृह' और उनके लिए हॉट लाइन की व्यवस्था करे। सरकार यह भी सुनिश्चित करे कि इंटर-सेक्स बच्चों को ऑपरेशन के लिए बाध्य न किया जाए। समलैंगिक जोड़ों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से पहले पुलिस को प्रारंभिक जांच करनी चाहिए।
  6. प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि विपरीत लिंग वाले व्यक्तियों को भौतिक लाभ एवं सेवाएं देना और इन चीजों से समलैंगिकों को वंचित किया जाना, मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
  7. सीजेआई ने कहा कि समलैंगिक सहित सभी व्यक्तियों को अपने जीवन की नैतिक गुणवत्ता का चयन करने का अधिकार है। व्यक्ति का जेंडर और उसकी सेक्सुअलिटी से अलग है।
  8. फैसला पढ़ते हुए सीजेआई ने कहा कि समानता यह कहती है कि किसी व्यक्ति को उसके यौनिक झुकाव के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।
  9. प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा कि समलैंगिकता शहरी अवधारणा नहीं है या यह केवल समाज के ऊपरी तबके तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि मामले की सुनवाई करते हुए उन्होंने न्यायिक समीक्षा एवं शक्तियों के बंटवारे के संदर्भों को देखा है। सीजेआई ने कहा-शक्तियों के बंटवारे का सिद्धांत का मतलब यह है कि सरकार के तीनों अंग अलग-अलग तरह से काम करते हैं। कोई भी एक इकाई दूसरे के हिस्से का कार्य नहीं कर सकती।
  10. भारत सकार ने यह सुझाव दिया था कि कोर्ट यदि सूची तय करने का काम करेगी तो इससे शक्तियों के बंटवारे का सिद्धांत का उल्लंघन होगा। हालांकि, शक्तियों के बंटवारे का सिद्धांत न्यायिक समीक्षा की शक्ति को नहीं रोकता। संविधान की मांग है कि कोर्ट नागरिकों के मौलिक सिद्धांतों की सुरक्षा करे। मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए कोर्ट यदि निर्देश जारी करता है तो उसके इस रास्ते में शक्तियों के बंटवारे का सिद्धांत नहीं आता।
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