UNESCO memory register: यूनेस्को की एशिया-पैसेफिक मेमोरी रजिस्टर में भारत की तीन और पांडुलिपियों को शामिल किया गया है। ये पांडुलिपियां महाभारत, राजतरंगिणी एवं अर्थशास्त्र ग्रंथों की हैं। इंडोनेशिया की राजधानी जाकार्ता में आयोजित 'मेमोरी ऑफ द एशिया-पैसेफिक रिजिनल रजिस्टर' के 11वें सत्र में इन्हें शामिल करने पर फैसला हुआ। इन ग्रंथों की पांडुलिपियां शामिल करने के लिए इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर द ऑर्ट्स (IGNCA) ने नामांकन तैयार किया था।
देश के लिए बेहद गर्व का क्षण-शेखावत
केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इन ग्रंथों को यूनेस्को की सूची में शामिल किए जाने को देश के लिए बेहद गर्व का क्षण बताया। शेखावत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, 'ये कालजयी रचनाएं हमारी समृद्ध परंपराओं, ऐतिहासिक अनुसंधान, दार्शनिक चिंतन और राज्य संचालन की कला का प्रतीक हैं। इनमें निहित ज्ञान आज भी पूरी मानवता को प्रेरित करता है।' इससे पहले अप्रैल 2025 में नाट्यशास्त्र और भगवद्गीता को भी यूनेस्को के मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर में शामिल किया गया था।
12वीं सदी का दुर्लभ ऐतिहासिक ग्रंथ है राजतरंगिणी
कश्मीरी इतिहासकार और लेखक कल्हण की राजतरंगिणी की मूल संरक्षित पांडुलिपि श्रीनगर स्थित ओरिएंटल रिसर्च लाइब्रेरी में रखी गई है। 12वीं सदी का दुर्लभ ऐतिहासिक ग्रंथ राजतरंगिणी संस्कृत भाषा में 1148 से 1149 ईस्वी के बीच लिखा गया था। इसे पारंपरिक कश्मीरी भोजपत्र पर शारदा लिपि में लिखा गया था। इस ग्रंथ में कश्मीर के इतिहास, वहां के राजवंशों, राजनीतिक घटनाक्रमों और सामाजिक-सांस्कृतिक पहलुओं का वर्णन किया गया है। इसकी रचना काव्य यानी कविता की साहित्यिक शैली में की गई है।
इस ग्रंथ में कुल 7,826 श्लोक हैं, जिन्हें आठ भागों में बांटा गया है। इन भागों को 'तरंग' कहा जाता है।
कश्मीर के सांस्कृतिक सार का भंडार है राजतरंगिणी
यूनेस्को ने इस ग्रंथ को सूची में शामिल करने के अपने फैसले पर टिप्पणी करते हुए कहा, 'राजतरंगिणी कश्मीर के सांस्कृतिक सार का भंडार है। कल्हण की आलोचनात्मक ऐतिहासिक दृष्टि, स्रोतों के इस्तेमाल, कालक्रम तय करने की उनकी अभिनव पद्धति और नैतिक चिंतन को दर्शाने वाली यह पांडुलिपि दक्षिण एशियाई साहित्य में दुर्लभ प्रारंभिक ऐतिहासिक चेतना का प्रमाण है।' यूनेस्को के इस रजिस्टर में शामिल किया गया दूसरा ग्रंथ कौटिल्य का अर्थशास्त्र है। यह राज्य संचालन, आर्थिक नीति, शासन व्यवस्था और सैन्य रणनीति पर आधारित प्राचीन संस्कृत ग्रंथ है। इस ग्रंथ की रचना विष्णुगुप्त ने की थी, जिन्हें चाणक्य के नाम से भी जाना जाता है। वे मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के प्रमुख सलाहकार थे। चौथी सदी ईसा पूर्व का यह ग्रंथ आज भी 16वीं सदी की एक संपूर्ण ताड़पत्र पांडुलिपि के रूप में संरक्षित है। यह पांडुलिपि ग्रंथ लिपि में लिखी गई है और मैसूर स्थित ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में रखी गई है।
अर्थशास्त्र को 15 पुस्तकों, 50 अध्यायों और 180 खंडों में विभाजित किया गया है।
