लैंड फॉर जॉब घोटाला एक बार फिर चर्चा में है। राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने लालू प्रसाद यादव, उनके बेटे और बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव तथा पत्नी राबड़ी देवी समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब इस मामले में कोर्ट 13 अक्टूबर को अपना आदेश सुनाएगा।
यह मामला न सिर्फ कानूनी रूप से बल्कि राजनीतिक दृष्टिकोण से भी बेहद अहम है। सीबीआई ने इसे बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का मामला बताया है, वहीं बचाव पक्ष का कहना है कि यह राजनीतिक प्रतिशोध का हिस्सा है।
दोनों पक्षों की दलीलें और कोर्ट का रुख
सुनवाई के दौरान लालू यादव की ओर से तर्क दिया गया कि जांच और एफआईआर दर्ज करने में कानून का उल्लंघन हुआ है। बचाव पक्ष ने कहा कि एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई और भ्रष्टाचार निरोधक कानून (Prevention of Corruption Act) की धारा 17A के तहत बिना अनुमति जांच की शुरुआत ही अवैध है।
सीबीआई के वरिष्ठ अधिवक्ता डी. पी. सिंह ने इन दलीलों का जोरदार विरोध किया। उन्होंने कहा कि धारा 17A पुराने यानी 2018 से पहले के मामलों पर लागू होती है या नहीं, यह सवाल सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ के सामने लंबित है और इस पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं आया है। इसलिए ट्रायल को रोका नहीं जा सकता।
सीबीआई का आरोप-गरीब लोग मुख्यमंत्री को गिफ्ट क्यों देंगे?
सीबीआई ने अदालत में कहा कि यह बेहद चौंकाने वाली बात है कि मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को गरीब लोग गिफ्ट दें। एजेंसी ने सवाल उठाया कि जिनके पास खुद पैसे नहीं थे, वे क्यों मुख्यमंत्री को जमीन गिफ्ट करेंगे। सीबीआई ने कहा कि यही इस घोटाले की असल तस्वीर है, जिसमें लालू यादव और उनके परिवार ने नौकरी दिलाने के बदले जमीनें हासिल कीं।
एजेंसी का दावा है कि बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है और ज्यादातर जमीन सौदे नकद पैसों से हुए। कुछ सेल डीड को छोड़कर जमीन के दस्तावेज परिवार के सदस्यों और उनकी कंपनियों के नाम पर दर्ज किए गए। सीबीआई ने अदालत को बताया कि रेलवे की नियुक्तियों में नियमों और प्रक्रिया की अनदेखी की गई और बिना विज्ञापन या नोटिस जारी किए ही उम्मीदवारों को नियुक्त किया गया।
क्या है लैंड फॉर जॉब घोटाला?
लैंड फॉर जॉब घोटाला 2004 से 2009 के बीच का है, जब लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री थे। आरोप है कि इस दौरान रेलवे में ग्रुप डी पदों पर उम्मीदवारों को नौकरी देने के बदले पटना की जमीनें ली गईं। सीबीआई का कहना है कि ये जमीनें बेहद कम दाम पर परिवार और उनकी कंपनियों के नाम ट्रांसफर कराई गईं।
बाद में इन उम्मीदवारों की सेवाओं को नियमित भी कर दिया गया। आरोप है कि पूरे मामले में पारदर्शिता की पूरी तरह अनदेखी की गई और नियमों को दरकिनार करके लाभ उठाया गया।
चार्जशीट और अब तक अदालत की कार्यवाही
सीबीआई अब तक इस मामले में दो चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। जुलाई 2023 में एजेंसी ने लालू, राबड़ी और तेजस्वी के खिलाफ नई चार्जशीट दाखिल की थी, जिसमें 14 अन्य व्यक्तियों और संस्थाओं को भी आरोपी बनाया गया। इन पर भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं और भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत आरोप लगाए गए हैं।
2023 में राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने लालू, तेजस्वी और राबड़ी को जमानत दी थी। विशेष जज गीतांजलि गोयल ने कहा था कि सभी आरोपी अदालत के समन पर पेश हुए हैं, इसलिए उन्हें राहत दी जाती है।
दिल्ली हाई कोर्ट में भी लालू की याचिका
लालू प्रसाद यादव ने इसी हफ्ते दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर कर सीबीआई की एफआईआर रद्द करने की मांग भी की है। उनका कहना है कि जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार से जरूरी अनुमति (sanction) नहीं ली गई थी। उनके वकीलों ने दलील दी कि बिना मंजूरी जांच की प्रक्रिया अवैध है। यह याचिका अभी हाई कोर्ट में विचाराधीन है।
असर सीधे तौर पर बिहार की राजनीति पर
इस मामले का असर सीधे तौर पर बिहार की राजनीति पर पड़ रहा है। लालू प्रसाद यादव पहले भी चारा घोटाले जैसे मामलों में सजा पा चुके हैं। 13 अक्टूबर को राउज़ एवेन्यू कोर्ट का फैसला इस घोटाले की दिशा तय करेगा। तब यह साफ होगा कि आरोप तय होंगे या नहीं और मुकदमा किस तरह आगे बढ़ेगा।
