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वोट चोरी का बम: राहुल गांधी के आरोपों की दूसरी किश्त से पहले मद्रास HC का ये आदेश जरूर पढ़ लें

मद्रास हाईकोर्ट ने 2024 लोकसभा चुनावों में वोटर लिस्ट में हेराफेरी के आरोपों पर दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने याचिका को निराधार बताते हुए याचिकाकर्ता पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।

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मद्रास हाई कोर्ट (फाइल फोटो साभार: ANI)

Photo : ANI

Vote Theft Row: आज राहुल गांधी अपने आरोपों की दूसरी इंस्टॉलमेंट में हरियाणा के विधानसभा चुनाव को लेकर खुलासा करने जा रहे हैं। देश का विपक्ष भी इस वक्त जोर-शोर से वोट चोरी का मुद्दा उठा रहा है। लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने अपने आरोपों की पहली किस्त में लोकसभा चुनाव के दौरान कर्नाटक की कुछ सीटों पर बड़े पैमाने पर वोटर लिस्ट में हेरा फेरी का आरोप लगाया था।

ऐसे में हम आपको हाल ही में आए मद्रास हाई कोर्ट के उसे फैसले के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं जिसमें वोट चोरी के आरोपों पर जांच की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया गया था। इस आदेश से जानें कि कैसे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली डिविजन बेंच ने सिर्फ राजनीतिक आरोपों के आधार पर चुनाव में हेराफेरी के आरोप को मानने से इनकार कर दिया था।

राहुल गांधी के आरोप पर याचिका में क्या थी मांग?

राहुल गांधी के प्रेस कॉन्फ्रेंस के आधार पर मद्रास हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई थी, जिसमें यह आरोप लगाया गया कि 2024 लोकसभा चुनावों में बड़े पैमाने पर मतदाता सूची में हेराफेरी हुई। याचिका में कहा गया कि लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने 7 अगस्त, 2025 को अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में विस्तृत सबूतों के साथ यह आरोप लगाए। इसके बाद 13 अगस्त, 2025 को केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने भी प्रेस वार्ता में इसी तरह की अनियमितताओं का मुद्दा उठाया।

याचिकाकर्ता अधिवक्ता वी. वेंकट सिवाकुमार ने अदालत से आग्रह किया था कि चुनाव आयोग को आदेश दिया जाए कि वह इन आरोपों पर सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट करे और पूरे देश के मतदाता सूची के आंकड़े मशीन रीडेबल फॉर्मेट में उपलब्ध कराए।

कोर्ट ने कहा- याचिका भ्रमित करने वाली

चीफ जस्टिस मानिंद्र मोहन श्रीवास्तव और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की बेंच ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि इस तरह की याचिका पूरी तरह से गलत तर्कों और तथ्यों पर आधारित है। अदालत ने पाया कि याचिका में केवल आरोपों और राजनीतिक बयानों का उल्लेख किया गया है, लेकिन किसी ठोस तथ्य या स्वतंत्र जांच पर आधारित सामग्री पेश नहीं की गई। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस रूप में याचिका न तो स्पष्ट है और न ही इसमें पर्याप्त विवरण मौजूद है।

चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगना अदालत का क्षेत्राधिकार नहीं

याचिकाकर्ता ने चुनाव आयोग से अपना पक्ष स्पष्ट करने का निर्देश जारी करने की मांग की थी। अदालत ने इस पर कहा कि न्यायालय इस तरह का निर्देश जारी नहीं कर सकता। यह चुनाव आयोग का अपना अधिकार क्षेत्र है कि वह किसी मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है। साथ ही कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि इस आदेश को चुनाव आयोग की स्वतंत्र कार्रवाई पर रोक या बाधा के रूप में न देखा जाए। आयोग अपनी इच्छा से इस मामले में जो उचित समझे, कदम उठा सकता है।

याचिकाकर्ता पर लगा 1 लाख रुपये का जुर्माना

याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने इसे समय और संसाधन की बर्बादी माना और याचिकाकर्ता पर एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया। यह राशि एक महीने के भीतर तमिलनाडु स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी को जमा करनी होगी। इसके साथ ही अदालत ने यह भी जोड़ा कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है। भविष्य में अगर कोई उचित और ठोस सामग्री के आधार पर नई याचिका दाखिल होती है, तो उस पर विचार किया जा सकता है।

राजनीतिक बहस से अदालत ने दूरी बनाई

यह मामला मूल रूप से विपक्ष और सत्ता पक्ष के नेताओं के बयानों से शुरू हुआ था, जिन्हें आधार बनाकर याचिका दायर की गई थी। अदालत ने साफ संकेत दिया कि केवल राजनीतिक मंचों या प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए गए आरोपों के आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप संभव नहीं है। इस आदेश से यह संदेश गया है कि न्यायालय केवल ठोस साक्ष्यों और स्पष्ट तथ्यों पर ही हस्तक्षेप करेगा। महज़ आरोपों या सार्वजनिक बयानों को अदालतें जांच का आधार नहीं मान सकतीं।

Gaurav Srivastav
गौरव श्रीवास्तवauthor

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुनाव आयोग, विपक्ष के राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर हर जनहित मुद्दे पर मेरी नजर रहती है।

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