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केरल पर ‘केरलम्’ की मुहर, पश्चिम बंगाल के ‘बांग्ला’ प्रस्ताव पर ब्रेक-सियासी संतुलन या चयनात्मक राजनीति?

यह निर्णय ऐसे समय आया है जब कई राज्यों में चुनावी माहौल बन रहा है। समर्थक इसे सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय उच्चारण के सम्मान से जोड़ रहे हैं, जबकि विपक्ष इसे चुनावी रणनीति का हिस्सा बता रहा है।

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केरल पर ‘केरलम्’ की मुहर

केंद्र सरकार के उस फैसले ने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है, जिसके तहत केरल का आधिकारिक नाम बदलकर ‘केरलम्’ करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी के बाद अब इस बदलाव के लिए संसद में प्रस्ताव लाया जाएगा। किसी राज्य का नाम बदलने के लिए सामान्य बहुमत से विधेयक पारित कराना आवश्यक होता है। इसके बाद विभिन्न सरकारी विभागों-रेलवे, डाक, उड्डयन और आधिकारिक अभिलेखों-में बदलाव की प्रक्रिया शुरू होती है, जो समय लेने वाली मानी जाती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘केरलम्’ नाम स्थानीय भाषा और सांस्कृतिक अस्मिता के अधिक निकट है, जिससे क्षेत्रीय भावनाओं को साधने की कोशिश दिखती है।

‘बांग्ला’ प्रस्ताव पर ममता का सवाल

इसी फैसले के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र पर दोहरे मानदंड अपनाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि उनकी सरकार ने जुलाई 2018 में राज्य का नाम ‘बांग्ला’ करने का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन अब तक उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया।

सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का तर्क है कि जब ‘केरलम्’ को मंजूरी मिल सकती है, तो ‘बांग्ला’ पर आपत्ति क्यों?

केंद्र का पक्ष: अंतरराष्ट्रीय और प्रशासनिक पहलू

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार ‘बांग्ला’ नाम को लेकर आशंकित है। एक प्रमुख कारण यह बताया जा रहा है कि ‘बांग्ला’ नाम पड़ोसी देश बांग्लादेश से मिलता-जुलता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। विदेश मंत्रालय ने भी इस संबंध में आपत्ति जताई है। इसके अलावा, राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया महज राजनीतिक घोषणा नहीं होती। इसके लिए संवैधानिक संशोधन, संसदीय प्रक्रिया और विभिन्न मंत्रालयों में व्यापक प्रशासनिक बदलाव की जरूरत होती है।

ऐतिहासिक संदर्भ और वर्तमान राजनीति

1947 के विभाजन के बाद बंगाल दो हिस्सों—पूर्वी और पश्चिमी—में बंटा था। 1971 में पूर्वी बंगाल स्वतंत्र होकर बांग्लादेश बना, लेकिन भारत में ‘पश्चिम बंगाल’ नाम बरकरार रहा। अब ममता बनर्जी सरकार इसे बदलकर ‘बांग्ला’ करना चाहती है, ताकि नाम से ‘पश्चिम’ शब्द हटे और सांस्कृतिक पहचान को प्रमुखता मिले। दूसरी ओर, भाजपा नेताओं का कहना है कि ऐतिहासिक संदर्भ, प्रशासनिक जटिलताओं और अंतरराष्ट्रीय प्रभावों को देखते हुए सावधानी बरतना जरूरी है।

पहचान की राजनीति या चुनावी रणनीति?

केरल के ‘केरलम्’ और बंगाल के ‘बांग्ला’ प्रस्ताव को लेकर उठी बहस ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या यह महज सांस्कृतिक पहचान की स्वाभाविक मांग है, या फिर चुनावी राजनीति का नया औजार? आने वाले समय में संसद में होने वाली चर्चा और केंद्र का अंतिम रुख इस बहस को और स्पष्ट करेगा। फिलहाल, यह मुद्दा पहचान, राजनीति और संवैधानिक प्रक्रिया—तीनों के संगम पर खड़ा नजर आ रहा है।

Himanshu Tiwari
हिमांशु तिवारीauthor

हिमांशु तिवारी एक पत्रकार हैं जिन्हें प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक का 16 साल का अनुभव है। मैंने अपना करियर क्राइम रिपोर्टर के रूप में शुरू किया था लेकिन बाद में पॉलिटिकल रिपोर्टिंग में शिफ्ट हो गया। पिछले 12 से अधिक वर्षों से बीजेपी, आरएसएस को कवर कर रहे हैं, कुछ आम चुनावों और कई विधानसभा चुनावों की सटीक रिपोर्टिंग भी की है। "सारी दुनिया एक मंच है" और इसलिए रंगमंच और नाटक लिखने में गहरी रुचि है।

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