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यूक्रेन के बाद इजराइल से भी छात्रों को निकालेगा भारत! PMO तैयार कर रहा प्लान

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Oct 8, 2023, 06:58 PM IST

Indian Students in Israel: भारतीय दूतावास की वेबसाइट पर दिए गए विवरण के अनुसार, इजराइल में लगभग 18,000 भारतीय नागरिक हैं, जिनमें मुख्य रूप से इजराइली बुजुर्गों, हीरा व्यापारियों, आईटी पेशेवरों और छात्रों की देखभाल करने के लिए नियुक्त लोग शामिल हैं।

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इजराइल-हमास संघर्ष

Photo : AP

Indian Students in Israel: गाजा पट्टी पर हमास के आतंकवादी हमले के बाद इजराइल ने युद्ध का ऐलान कर दिया है। इजराइली वायुसेना हमास के ठिकानों को चुन-चुनकर नेस्तनाबूत कर रही है। इजराइल की ओर से जारी जवाबी कार्रवाई में अब तक 313 से ज्यादा फिलिस्तीनी मारे गए हैं, जबकि कई घायल हुए हैं। वहीं स्थानीय मीडिया के अनुसार हमास के हमले में अब तक 600 इजरायली नागरिकों की मौत हो चुकी है और 2000 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं।

इन सबके बीच इजराइल में फंसे भारतीय नागरिकों को लेकर केंद्र सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ती जा रही है। चर्चा शुरू हो गई है कि क्या केंद्र सरकार यूक्रेन की तरह इजराइल में फंसे भारतीयों को भी एयरलिफ्ट करेगी या नहीं? इस पर विदेश राज्यमंत्री मीनाक्षी लेखी ने खुलकर जवाब दिया है।

पीएमओ सीधे कर रहा हालात की निगरानी

विदेश राज्यमंत्री ने बताया कि इजराइल में फंसे भारतीय छात्रों को निकालने की पूरी कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा, मुझे कल रात कई मैसेज मिले और हम पूरी रात काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा, मुझे यह भी पता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय सीधे स्थिति की निगरानी कर रहा है और हम लगातार काम पर जुटे हैं। उन्होंने कहा, पहले भी आंध्र प्रदेश के लोगों सहित कई छात्र फंस गए थे, इसलिए चाहे ऑपरेशन गंगा हो गया वंदेश भारत, हम सभी को वापस लाए हैं। उन्होंने कहा, भातर सरकार सीधे उन लोगों से संपर्क में है।

18 हजार भारतीय नागरिक फंसे

बता दें, इजराइल- हमास संघर्श में करीब 18 हजार भारतीय फंसे हैं। भारतीय दूतावास की वेबसाइट पर दिए गए विवरण के अनुसार, इजराइल में लगभग 18,000 भारतीय नागरिक हैं, जिनमें मुख्य रूप से इजराइली बुजुर्गों, हीरा व्यापारियों, आईटी पेशेवरों और छात्रों की देखभाल करने के लिए नियुक्त लोग शामिल हैं। इजराइल में भारतीय मूल के लगभग 85,000 यहूदी भी हैं जो पचास और साठ के दशक में भारत से इजराइल गए थे।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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