केंद्रीय मंत्रिमंडल ने क्रिटिकल मिनरल्स प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने के लिए 2,814 करोड़ रुपये की कैपेक्स सपोर्ट योजना को मंजूरी दी है। जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर खुशी जाहिर करते हुए इसे लिथियम-निकेल के लिए आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में उठाया गया कदम करार दिया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर क्रिटिकल मिनरल्स के प्रसंस्करण में भारत की आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भविष्य की तकनीकों को ताकत देने वाले महत्वपूर्ण खनिजों की प्रोसेसिंग के लिए भारत को दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। मोदी ने लिथियम, निकेल और कोबाल्ट का जिक्र करते हुए कहा कि ये इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा क्षेत्र के लिए बेहद जरूरी हैं, लेकिन रिफाइंड सामग्री के लिए भारत अभी भी बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है।
प्रधानमंत्री ने बताया कि इस निर्भरता को कम करने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने क्रिटिकल मिनरल्स प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने वाली योजना को मंजूरी दी है। इसके तहत नए प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित किए जाएंगे, निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए कैपिटल सब्सिडी दी जाएगी, घरेलू स्तर पर वैल्यू एडिशन बढ़ाया जाएगा और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत किया जाएगा। उन्होंने कहा कि भारत को भविष्य की तकनीकों के निर्माण के लिए जरूरी क्षमताएं देश के भीतर ही विकसित करनी होंगी। इस योजना का मकसद देश में लिथियम और निकेल जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण की क्षमता विकसित करना और घरेलू स्तर पर इनकी वैल्यू चेन तैयार करना है।
पांच साल में खर्च होंगे 2,814 करोड़ रुपये
सरकार की यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक पांच साल के लिए लागू होगी। इसके तहत देश में क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग के लिए चार प्लांट स्थापित किए जाएंगे। इनमें दो प्लांट लिथियम और दो निकेल के प्रसंस्करण से जुड़े होंगे।
प्रत्येक लिथियम प्लांट की न्यूनतम क्षमता 30 हजार टन और प्रत्येक निकेल प्लांट की न्यूनतम क्षमता 50 हजार टन निर्धारित की गई है। इन परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार पात्र निवेश पर 30 प्रतिशत तक कैपिटल सब्सिडी उपलब्ध कराएगी। लिथियम प्लांट के लिए एक लाभार्थी को अधिकतम 500 करोड़ रुपये और निकेल प्लांट के लिए अधिकतम 900 करोड़ रुपये की सहायता दी जा सकेगी।
भारत के लिए क्यों अहम हैं क्रिटिकल मिनरल्स?
क्रिटिकल मिनरल्स यानी महत्वपूर्ण खनिज ऐसे प्राकृतिक संसाधन हैं, जिनकी जरूरत आधुनिक उद्योगों, नई तकनीकों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों में होती है। लिथियम, निकेल और कोबाल्ट इलेक्ट्रिक वाहनों और ऊर्जा भंडारण के लिए इस्तेमाल होने वाली बैटरियों के प्रमुख कच्चे माल हैं।
इन खनिजों की प्रोसेसिंग दुनिया के कुछ चुनिंदा देशों और क्षेत्रों में केंद्रित है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय तनाव, व्यापार प्रतिबंध, कीमतों में उतार-चढ़ाव या आपूर्ति में रुकावट का सीधा असर उन देशों पर पड़ सकता है, जो इनके आयात पर निर्भर हैं।
भारत सरकार की नई योजना इसी निर्भरता को कम करने और देश के भीतर खनिजों के प्रसंस्करण से लेकर तैयार औद्योगिक सामग्री के उत्पादन तक की क्षमता विकसित करने की कोशिश है। इससे आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
