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पहियों वाला स्ट्रेचर, सुरंग में अस्पताल और चिनूक हेलीकॉप्टर... जानिए कैसे बाहर लाए जाएंगे मजदूर और सबसे पहले क्या होगा?

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Nov 28, 2023, 05:19 PM IST

Silkyara Tunnel Rescue: पहियों वाला एक स्ट्रेचर तैयार किया गया है, जिसे पाइप के जरिए अंदर डाला जाएगा। इसके बाद इस स्ट्रेचर पर मजदूरों को लिटाया जाएगा ओर एनडीआरएफ की टीम इसे रस्सी के सहारे बाहर खींचेगी। आइए जानते हैं मजदूरों को बाहर निकालने के लिए क्या-क्या की गई हैं तैयारियां...

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सिल्क्यारा टनल हादसा

Photo : ANI

Silkyara Tunnel Rescue: उत्तरकाशी की सिल्क्यारा सुरंग में चल रहा रेस्क्यू ऑपरेशन अपने अंतिम चरण में है। रेस्क्यू टीम सुरंग में फंसे 41 मजदूरों के करीब पहुंच गई है। ताजा अपडेट के मुताबिक 16 दिन से फंसे मजदूर कभी भी बाहर आ सकते हैं। मजदूरों को निकालने के लिए खुदाई पूरी हो चुकी है और 800 मिलीमीटर मोटा पाइप भी डाला जा चुका है। अब एनडीआरएफ की टीम सुरंग के अदंर पहुंचने की तैयारी कर रही है, जिसके बाद एक-एक कर 41 मजदूरों को बाहर निकाला जाएगा।

हालांकि, केंद्रीय और राज्य एजेंसियों की सबसे बड़ी चिंता बाहर निकलने के बाद मजदूरों की सेहत को लेकर है। बीते 16 दिन से फंसे हुए मजदूरों की सेहत और उनकी मनोस्थिति पर काफी प्रभाव पड़ा है, ऐसे में सरकार की पहली प्राथमिकता उन्हें तुरंत इलाज मुहैया कराना है। इसके लिए सुरंग के बाहर कई तरीके की तैयारियां की गई हैं। जरूरत पड़ने पर मजूदरों को एयरलिफ्ट भी किया जाएगा, इसके लिए सेना का चिनूक हेलीकॉप्टर भी स्टैंडबाई पर है।

आइए जानते हैं 41 मजूदरों को निकालने के लिए क्या-क्या तैयारियां की गई हैं? सुरंग के अंदर से मजदूरों को कैसे बाहर लाया जाएगा? बाहर आने के बाद क्या होगा? और डॉक्टर किस चीज की जांच करेंगे...

तैयार किया गया पहियों वाला स्ट्रेचर

सुरंग के अदंर से मजदूरों को पाइप के जरिए बाहर निकाला जाएगा। इसके लिए पहियों वाला एक स्ट्रेचर तैयार किया गया है, जिसे पाइप के जरिए अंदर डाला जाएगा। इसके बाद इस स्ट्रेचर पर मजदूरों को लिटाया जाएगा ओर एनडीआरएफ की टीम इसे रस्सी के सहारे बाहर खींचेगी और एक-एक कर मजदूर बाहर आना शुरू हो जाएंगे। जानकारी के मुताबिक, प्राथमिकता में पहले उन मजदूरों को बाहर निकाला जाएगा, जिनकी हालत काफी खराब है। इसके लिए एनडीआरएफ ने मॉकड्रिल भी कर ली है। कहा गया है कि पाइप में काफी स्पेस है, जिससे सांस लेने में कोई तकलीफ न हो।

सुरंग के अदंर बनाया गया अस्थाई अस्पताल

मजदूरों की सेहत को ध्यान में रखते हुए सुरंग के अंदर ही एक अस्थाई अस्पताल भी बनाया गया है, जहां 8 बेड की व्यवस्था की गई है। बाहर निकलने वाले मजदूरों को इस अस्पताल में लाया जाएगा, जिसके बाद विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम इन मजूदरों का मेडिकल चेकअप करेगी। इसके अलावा सुरंग के बाहर 41 एंबुलेंस भी मंगवा ली गई हैं, मेडिकल चेकअप के बाद इन्हें सीधे चिन्यालीसौड़ के कम्युनिटी हेल्थ सेंटर भेजा जाएगा, वहां 41 बेड का स्पेशल वार्ड तैयार किया गया है। मजदूरों को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रीन कॉरीडोर भी तैयार किया गया है। वहीं एम्स ऋषिकेश के डॉक्टरों को भी अलर्ट मोड पर रखा गया है, अगर किसी मजदूर की हालत ज्यादा खराब होती है तो उन्हें एयरलिफ्ट कर वहां ले जाया जाएगा, इसके लिए सेना का चिनूक हेलीकॉप्टर भी स्टैंडबाई पर रखा गया है।

परिजनों को बैग तैयार रखने को कहा गया

सरकार की पहली प्राथमिकता मजदूरों की सेहत है। इसलिए सुरंग से बाहर आने के बाद उन्हें 48 से 72 घंटे डॉक्टरों की निगरानी में रखा जाएगा। सुरंग में फंसे मजदूरों के परिजनों को बैग तैयार रखने को कहा गया है। उन्हें भी घटनास्थल पर बुला लिया गया है।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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