बिहार विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले ही बाकी हो, लेकिन एनडीए ने अपनी तैयारियों को तेज़ कर दिया है। चुनाव अब केवल स्थानीय नेताओं की लड़ाई नहीं रहा, बल्कि भाजपा और एनडीए के लिए यह प्रतिष्ठा की जंग बन चुका है। बीजेपी ने देशभर से दिग्गज नेताओं को चुनावी अभियान में उतारने का फ़ैसला किया है। खासकर बड़े ओबीसी नेताओं पर विशेष फोकस है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव, शिवराज सिंह चौहान और प्रहलाद पटेल को बिहार भेजे जाने की चर्चा है।
बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा 13 सितंबर को पटना में कोर कमेटी की बैठक करेंगे, प्रधानमंत्री मोदी 15 सितंबर को पूर्णिया में रैली करेंगे, जबकि गृह मंत्री अमित शाह 18 और 27 सितंबर को बिहार के पाँच ज़ोन में रणनीतिक बैठकों में हिस्सा लेंगे।
युवा वोटरों को साधने की कवायद
पहली बार वोट डालने वाली युवा पीढ़ी को साधने के लिए बीजेपी युवा मोर्चा ने मोर्चा संभाल लिया है। 14 जिलों में युवा सम्मेलन आयोजित हो रहे हैं, जिनकी शुरुआत गोपालगंज से हो चुकी है। तेजस्वी सूर्या, गिरिराज सिंह, प्रमोद सावंत, अनुराग ठाकुर और बासुरी स्वराज जैसे नेता इसमें शामिल हो रहे हैं।
इसके साथ ही ‘नमो युवा रन’ और प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर राज्यभर में रक्तदान शिविर भी होंगे। साफ़ संदेश है – एनडीए का लक्ष्य युवा वोटरों को मज़बूती से अपने पाले में लाना है।
बूथ स्तर पर संगठन की मजबूती
बीजेपी हमेशा से चुनावों में अपने कार्यकर्ताओं की ताक़त पर भरोसा करती रही है। इसी रणनीति के तहत देशभर से कार्यकर्ताओं को बिहार भेजा गया है। ये कार्यकर्ता बूथ स्तर पर सक्रिय हैं और मतदाताओं से सीधा संवाद कर रहे हैं।
आरएसएस और महिला मतदाताओं पर खास ध्यान
एनडीए की चुनावी रणनीति में आरएसएस की भागीदारी भी तेज़ हो गई है। लगभग 15 हज़ार स्वयंसेवक गांव-गांव जाकर लोगों से जुड़ रहे हैं।
महिला मतदाताओं के लिए अलग-अलग टीमें बनाई गई हैं, जो शिक्षा, सुरक्षा, रसोई और बच्चों की पढ़ाई जैसे मुद्दों पर संवाद कर रही हैं। संघ हर सीट से फीडबैक जुटा रहा है और जातीय समीकरणों के आधार पर उम्मीदवार चयन की रणनीति तैयार कर रहा है।
एनडीए के लिए प्रतिष्ठा दांव पर
एनडीए की चुनावी मशीनरी पूरी ताक़त से मैदान में उतर चुकी है। राम मंदिर, राष्ट्रवाद, विकास और मोदी सरकार की योजनाएँ इस बार एनडीए के प्रमुख चुनावी हथियार होंगे।
अब निगाहें विपक्ष की रणनीति पर हैं – क्या वह इस मज़बूत चुनावी तैयारी के सामने टिक पाएगा? इतना साफ़ है कि बिहार चुनाव 2025 सत्ता की लड़ाई से कहीं आगे निकलकर एनडीए के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है।
