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'दुष्कर्म एक कानूनी शब्द, न कि मेडिकल...', इलाहाबाद HC की टिप्पणी, कहा- हाइमन पुराना फटा होने से खारिज नहीं होगी पीड़िता की गवाही

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दुष्कर्म से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल मेडिकल रिपोर्ट में ‘पुराना फटा हाइमन’ (Old Torn Hymen) पाए जाने के आधार पर आरोपी को संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि दुष्कर्म का निर्धारण केवल मेडिकल निष्कर्षों से नहीं होता और इंटरनल चोट के निशान न मिलने का मतलब यह नहीं कि पीड़िता के आरोप गलत हैं।

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दुष्कर्म से जुड़े मामले पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने की महत्वपूर्ण टिप्पणी। istock

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक दुष्कर्म से जुड़े मामले पर सुनवाई करते हुए एक अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि किसी दुष्कर्म मामले में केवल मेडिकल रिपोर्ट में ‘पुराना फटा हाइमन’ (Old Torn Hymen) पाए जाने के आधार पर आरोपी को संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दुष्कर्म केवल मेडिकल निष्कर्षों से तय होने वाला अपराध नहीं, बल्कि कानूनी दृष्टि से देखा जाने वाला मामला है। साथ ही, इंटरनल प्राइवेट पार्ट में चोट के निशान न मिलने का मतलब यह नहीं है कि पीड़िता की बात झूठी है या उसके आरोप अमान्य हो जाते हैं।

हाइमन कई कारणों से हो सकता है प्रभावित

न्यायमूर्ति संतोष राय की अध्यक्षता वाली पीठ ने टिप्पणी की कि खेलकूद, साइकिल चलाना, जिमनास्टिक, घुड़सवारी, अत्यधिक शारीरिक श्रम या आकस्मिक चोट आदि जैसे विभिन्न कारकों के कारण हाइमन फट सकता है। न्यायालय ने आगे कहा कि कुछ व्यक्ति जन्म से ही छिद्रित या अनुपस्थित हाइमन के साथ पैदा होते हैं, जबकि कुछ अन्य में यह अत्यधिक लचीला होता है और इसलिए, इस प्रकृति के चिकित्सा निष्कर्ष पीड़ित के विश्वसनीय बयान को खारिज नहीं कर सकते।

क्या है मामला?

मामला साल 1982 की घटना से जुड़ा था, जिसमें निचली अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इस फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी की ओर से दलील दी गई कि मेडिकल जांच में पीड़िता का हाइमन पुराना फटा हुआ पाया गया था, इसलिए आरोपों पर संदेह किया जाना चाहिए। पीठ ने फरवरी 1982 की एक घटना के संबंध में बलात्कार के आरोपी की 3 साल की सजा और दोषसिद्धि को बरकरार रखा ।

हालांकि हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि हाइमन कई कारणों से प्रभावित हो सकता है और केवल इसके आधार पर किसी महिला की गवाही को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता। अदालत ने माना कि यदि पीड़िता का बयान विश्वसनीय हो और अन्य परिस्थितियां उसका समर्थन करती हों, तो मेडिकल रिपोर्ट का ऐसा निष्कर्ष आरोपी को स्वतः राहत नहीं देता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यौन अपराधों में पीड़िता की विश्वसनीय गवाही एक महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकती है। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के बयान और उपलब्ध मेडिकल साक्ष्यों को देखते हुए दोषसिद्धि की थी, जिसे हाई कोर्ट ने बरकरार रखा। इसके साथ ही अदालत ने आरोपी की सजा में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

Piyush Kumar
पीयूष कुमारauthor

पीयूष कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के न्यूज डेस्क पर Senior Copy Editor के रूप में कार्यरत हैं। देश-दुनिया की हलचल पर उनकी पैनी नजर रहती है और इन घटनाओं को सटीक, सरल और असरदार अंदाज में खबरों की भाषा देना उनकी सबसे बड़ी ताकत है। ब्रेकिंग न्यूज की रफ्तार हो या किसी जटिल मुद्दे को आसान बनाकर समझाने वाले एक्सप्लेनर—पीयूष दोनों में बराबर दक्षता रखते हैं। न्यूज जजमेंट, फैक्ट-बेस्ड राइटिंग और एंड-टू-एंड कॉपी प्रोडक्शन पर इनकी पकड़ मजबूत है और अबतक 4,000 से अधिक स्टोरी लिख चुके हैं।

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