Viral Fever Ayurvedic Treatment : वायरल फीवर मुख्य रूप से शरीर में वायरस के प्रवेश और उसके बढ़ने के कारण होता है। मौसम का अचानक परिवर्तन, जैसे बरसात या गर्मी-ठंडी का अंतर, वायरस के पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाता है। जिनकी इम्यूनिटी कमजोर होती है, उन्हें यह आसानी से प्रभावित करता है। इसके अलावा, यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भी फैल सकता है। यदि वायरल फीवर से ग्रसित व्यक्ति छींकता, खांसता या किसी के पास बैठता है तो वह भी बीमार पड़ सकता है। वायरल फीवर के लक्षण अचानक बुखार, शरीर में दर्द और थकान, गले में खराश और खांसी, सिरदर्द, ठंड लगना, भूख में कमी और कभी-कभी दस्त या उल्टी के रूप में दिखाई देते हैं।
वायरल फीवर से बचाव के आयुर्वेदिक उपाय
वायरल फीवर से निपटने के लिए आयुर्वेदिक और घरेलू उपाय बहुत प्रभावी साबित होते हैं। तुलसी का काढ़ा, जिसमें तुलसी की 5-7 पत्तियां, अदरक और काली मिर्च डालकर उबाला जाता है, शरीर को संक्रमण से लड़ने की ताकत देता है। गिलोय का रस सुबह-शाम 2 चम्मच लेने से रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और बुखार नियंत्रित रहता है। हल्दी वाला दूध शरीर की थकान दूर करता है और इम्यूनिटी बढ़ाता है। नींबू और शहद गुनगुने पानी में मिलाकर पीने से बुखार और कमजोरी में राहत मिलती है। धनिया का काढ़ा और अदरक की चाय भी वायरल संक्रमण को रोकने और शरीर की गर्मी कम करने में सहायक हैं। इसके अलावा, पर्याप्त पानी और तरल पदार्थ जैसे नारियल पानी, सूप और जूस शरीर को डिहाइड्रेशन से बचाते हैं।
वायरल फीवर से बचाव के लिए लाइफस्टाइल संबंधी बदलाव
वायरल फीवर से बचाव के लिए जीवनशैली में बदलाव जरूरी हैं। विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर आहार लें, पर्याप्त नींद और आराम करें, तला-भुना और भारी भोजन न करें, बल्कि हल्का और सुपाच्य खाना खाएं। साथ ही प्राणायाम और योग करें। इसके अलावा, यदि किसी को संक्रमण हो गया है तो वायरस के प्रसार से बचने के लिए उपाय करें, मास्क आदि का भी इस्तेमाल करें।
साथ ही, कुछ तथ्य भी महत्वपूर्ण हैं- जैसे हर बुखार वायरल नहीं होता, कभी-कभी टाइफाइड, डेंगू या मलेरिया भी वायरल फीवर जैसा दिखता है। वायरल फीवर अक्सर 5-7 दिनों में अपने आप ठीक हो जाता है, और एंटीबायोटिक दवाइयां वायरस पर असर नहीं करतीं। पसीना आना एक अच्छा संकेत है, यह शरीर की गर्मी बाहर निकालने की प्रक्रिया है। अलग-अलग वायरस अलग तरह के वायरल फीवर पैदा कर सकते हैं। आयुर्वेद में इसे दोषों के असंतुलन और पाचन अग्नि की कमजोरी से जोड़कर देखा गया है।
इनपुट - आईएएनएस
