Pakistan UNSC Presidency: पाकिस्तान ने मंगलवार को जुलाई महीने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अध्यक्षता संभाली है। इसके साथ ही सवाल उठने शुरू हो गए हैं कि क्या अब पाकिस्तान कश्मीर, सिंधु जल संधि जैसे मुद्दों पर अपनी पुरानी चाल चलेगा। चीन के साथ मिलकर क्या पाकिस्तान, भारत को नुकसान पहुंचा सकता है। पाकिस्तान एक महीने तक यूएनएससी की अध्यक्षता संभालेगा और इस दौरान भारत के सामने उसके कुत्सित इरादों को नाकाम करने की चुनौती होगी। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि भारत के लिए क्या वाकई पाकिस्तान एक चुनौती बनकर उभरेगा।
अध्यक्षता मिलना एक औपचारिक भूमिका
सबसे बड़ी बात ये है कि यूएनएससी में एक महीने के लिए अध्यक्षता मिलना एक औपचारिक भूमिका है, जिसे 15 देश एक क्रम में निभाते हैं। इस बार पाकिस्तान का नंबर आया है उसे अध्यक्षता मिली है। लेकिन स्लामाबाद इस घटनाक्रम को अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश कर रहा है, वहीं नई दिल्ली इसे एक नियमित औपचारिकता के रूप में देख रही है। इसके जरिए पाकिस्तान वैश्विक निर्णयों को प्रभावित कर पाएगा या कश्मीर या सिंधु जल संधि जैसे मुद्दों पर अपना नैरिटिव रख पाएगा, इसकी संभावन नहीं है क्योंकि इस दौरान उसे कोई स्थायी शक्ति नहीं मिलेगी। पाकिस्तान के आतंकी संबंधों, आर्थिक उथल-पुथल और विश्व मंच पर घटती साख के बीच, यूएनएससी में उसका छोटाकार्यकाल भारत की चिंता बढ़ाने या इस्लामाबाद के पक्ष में अंतरराष्ट्रीय राय बदलने की संभावना नहीं है। ऐसा क्यों, ये समझते हैं।
एक प्रक्रियात्मक भूमिका, सत्ता परिवर्तन नहीं
पाकिस्तान द्वारा यूएनएससी की अध्यक्षता संभालना उसके नेतृत्व या विदेश नीति साख में वैश्विक विश्वास का प्रतिबिंब नहीं है। यह एक रोटेशनल पद है जो पाकिस्तान जैसे निर्वाचित सदस्यों सहित हर देश को अपने दो साल के कार्यकाल के दौरान एक बार मिलता है। अध्यक्ष पद होने का मतलब यह नहीं कि यूएनएससी में परिणामों को बदलने के लिए कोई वीटो शक्ति या एकतरफा अधिकार मिल जाए।
यूएनएससी अध्यक्ष की भूमिका मासिक एजेंडा निर्धारित करना और बैठकों की अध्यक्षता करना है, न कि राष्ट्रीय हितों को अनियंत्रित रूप से आगे बढ़ाना। जबकि पाकिस्तान अपने एजेंडे के करीब के मुद्दों, खासकर कश्मीर को सुर्खियों में लाने की कोशिश कर सकता है, लेकिन वह स्थायी सदस्यों के समर्थन के बिना प्रस्तावों को लागू नहीं कर सकता या निर्णयों को बदल नहीं सकता। अधिकतर सदस्य देश पाकिस्तान के वैश्विक ट्रैक रिकॉर्ड से चिंतित रहते हैं।

UNSC में पाकिस्तान के मंसूबे होंगे ध्वस्त
पाकिस्तान की विश्वसनीयता का संकट
पाकिस्तान कश्मीर या सिंधु जल संधि जैसे मुद्दों को उठाने के लिए मंच का फायदा उठाने की कोशिश कर सकता है, लेकिन विश्व मंच पर उसकी विश्वसनीयता की कमी उसके आड़े आ सकती है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान को आंतरिक अस्थिरता, आर्थिक पतन और राज्य प्रायोजित आतंकवाद से जूझ रहे देश के रूप में देखता है। 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले - जिसे पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी समूहों ने अंजाम दिया था, उसने वैश्विक संदेह को और गहरा कर दिया है। तब से कई देशों ने भारत के आतंकवाद विरोधी रुख के लिए अपने समर्थन की पुष्टि की है।
संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर पाकिस्तान का पसंदीदा मुद्दा
कश्मीर लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान का पसंदीदा मुद्दा रहा है, लेकिन वह मित्र देशों से भी कोई सार्थक समर्थन पाने में बार-बार नाकाम रहा है। जम्मू और कश्मीर पर भारत की स्थिति स्पष्ट है, और उसने साफ कर दिया है कि पाकिस्तान के साथ चर्चा के लिए एकमात्र मुद्दा आतंकवाद है। संयुक्त राष्ट्र सचिवालय सहित वैश्विक सहमति काफी हद तक इसे द्विपक्षीय मुद्दे के रूप में स्वीकार करने की ओर मुड़ गई है।
कश्मीर को यूएनएससी चर्चाओं में लाने के पाकिस्तान के किसी भी प्रयास को अमेरिका, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम जैसे प्रमुख स्थायी सदस्यों द्वारा रोके जाने की संभावना है। यहां तक कि पाकिस्तान के खास दोस्त चीन ने भी हाल के वर्षों में कश्मीर पर चुप्पी साध ली है, खासकर तब जब भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक ताकत बन गया है।

UNSC में भारत-पाकिस्तान का क्या रहेगा रुख?
यूएनएससी अध्यक्षता का सिंधु जल संधि पर असर नहीं
पाकिस्तान ने अपनी अध्यक्षता की शुरुआत में सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) के मुद्दे को एक बार फिर उठाया है। इस समझौते को पाकिस्तान ने अपनी शर्तों का लाभार्थी होने के बावजूद कूटनीतिक रूप से हथियार बनाया है। 30 जून को पाकिस्तान ने किशनगंगा और रतले परियोजनाओं पर स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (पीसीए) के पूरक फैसले का हवाला देते हुए भारत से संधि को फिर से शुरू करने की अपील की थी
हालांकि, भारत ने इस मामले में पीसीए के अधिकार क्षेत्र को कभी मान्यता नहीं दी है, और फैसले को दृढ़ता से खारिज कर दिया है। नई दिल्ली का कहना है कि संधि के तहत विवादों को द्विपक्षीय रूप से या तटस्थ विशेषज्ञों के माध्यम से हल किया जाना चाहिए, न कि पाकिस्तान द्वारा एकतरफा सक्रिय किए गए तंत्रों के जरिए।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत की सख्त कार्रवाई
पाकिस्तान के विदेश कार्यालय का दावा है कि पीसीए का फैसला उसकी स्थिति को सही साबित करता है। हकीकत यह है कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद सख्त कार्रवाई के तहत भारत ने IWT को निलंबित कर दिया था, और पाकिस्तान की UNSC की अध्यक्षता उसे इसे उलटने का कोई मौका नहीं देगी। साथ ही पाकिस्तान का वैश्विक प्रभाव कम होता जा रहा है। मुस्लिम दुनिया के भीतर भी, यूएई, सऊदी अरब और यहां तक कि तालिबानी हूकुमत वाले अफगानिस्तान में जैसे देशों ने हाल के वर्षों में अधिक संतुलित और अक्सर भारत समर्थक रुख अपनाया है। तुर्की और चीन अभी भी बयानबाजी का समर्थन कर पाकिस्तान का साथ दे सकते हैं, लेकिन इन तीन देशों का गठबंधन UNSC के जरिए भारत विरोधी नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए नाकाफी है।
