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शिमला समझौता रद्द करने की शेखी बघार रहा पाकिस्तान, लेकिन क्या अंजाम भी पता है? चालबाजी पड़ेगी भारी

नई दिल्ली द्वारा राजनयिक संबंधों को कमतर किए जाने और सिंधु जल संधि को निलंबित किए जाने के बाद इस्लामाबाद की ओर से उठाए गए कदमों के बाद पाकिस्तान ने शिमला समझौते को रद्द करने की धमकी दी थी।

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पाकिस्तान की कोरी धमकी

Photo : PTI

Shimla Agreement: पहलगाम में आतंकी हमले के मद्देनजर भारत के सख्त कदमों के बाद भी पाकिस्तान ने शेखी बघारना कम नहीं किया है। कई जवाबी कार्रवाई करने के बाद वह शिमला समझौते को खत्म करने की भी धमकी दे रहा है। पाकिस्तान ने शुक्रवार को कहा कि अगर भारत दोनों देशों के बीच संघर्ष को बढ़ाता है तो उसके पास शिमला समझौता रद्द करने का विकल्प है। पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के बीच पाकिस्तान ने गुरुवार को 1972 के शिमला समझौते सहित सभी द्विपक्षीय समझौतों को निलंबित करने की धमकी दी थी।

पाकिस्तान की कोरी धमकी

नई दिल्ली द्वारा राजनयिक संबंधों को कमतर किए जाने और सिंधु जल संधि को निलंबित किए जाने के बाद इस्लामाबाद की ओर से उठाए गए कदमों के बाद पाकिस्तान ने ये धमकी दी थी। शिमला समझौते को रद्द करने के मकसद के बारे में पूछे जाने पर पाकिस्तान विदेश कार्यालय के प्रवक्ता शफकत अली ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की अध्यक्षता में हुई बैठक का जिक्र करते हुए कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा समिति ने बहुत स्पष्ट रूप से कहा है कि अगर भारत तनाव बढ़ाने के इस रास्ते पर चलता है तो हमारे पास ऐसा करने का विकल्प है।

शिमला समझौता

शिमला समझौता

उन्होंने कहा, दो देशों के बीच संबंध कुछ ढांचों और कानूनी समझौतों पर आधारित होते हैं, जिनमें संयुक्त राष्ट्र चार्टर, अंतरराष्ट्रीय कानून और द्विपक्षीय समझौतों की एक श्रृंखला शामिल है। अली ने कहा, अगर दोनों पक्षों में से कोई एक पूरी तरह से उदासीन है और अगर उसे ऐसा लगता है कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय समझौता दूसरे देश पर किया गया एहसान है तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण परिदृश्य है। और उस हालात में हम स्थिति के अनुसार अपने विकल्पों का प्रयोग करेंगे।

पाकिस्तान को क्यों पड़ेगा भारी

दरअसल, पाकिस्तान की ये धमकी उसकी एक और गीदड़भभकी ही लगती है, क्योंकि अगर उसने शिमला समझौता रद्द किया तो उसे भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। वैसे तो पाकिस्तान शिमला समझौते को तोड़ने की धमकी दे रहा है, लेकिन उसने इसका कभी गंभीरत से पालन किया ही नहीं है। उसने हर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर कश्मीर मुद्दा उठाया है, हालांकि उसे मुंह की ही खानी पड़ी है। लेकिन अगर वह समझौते को वाकई तोड़ता है तो उसे ही नुकसान उठाना पड़ सकता है।

पाकिस्तान ने कश्मीर जैसे संवेदनशील और आंतरिक भारतीय मामले को संयुक्त राष्ट्र से लेकर इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) तक, अनगिनत बार वैश्विक मंचों पर उठाया और हर बार नाकामी ही मिली है। जानकारों की मानें तो तकनीकी तौर पर कोई भी देश किसी संधि या समझौते से खुद को अलग कर सकता है। अगर पाकिस्तान ने शिमला समझौता स्थगित कर दिया तो वह यह भी स्वीकार करेगा कि अब कश्मीर मुद्दे को बातचीत से सुलझाने की कोई गुंजाइश नहीं रही। ऐसी स्थिति में भारत कह सकता है कि अब वह भी इसका पालन नहीं करेगा कोई भी कदम उठाने को स्वतंत्र है।

भारत के सख्त फैसले

India intensifies action against Pakistan

अगर पाकिस्तान शिमला समझौते को रद्द करता है, तो द्विपक्षीय वार्ता पर पूरी तरह रोक लग जाएगी। इससे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तनाव और बढ़ सकता है। इससे दोनों देशों की सेनाएं एलओसी पर और अधिक आक्रामक हो सकती हैं और संघर्ष बढ़ेगा। खास तौर पर भारत एलओसी पर आक्रामकता बढ़ा सकता है क्योंकि वह पहले ही पीओके पर अपना हक जता चुका है। भारत कश्मीर मुद्दे को अपनी तरह से हल करने की कोशिशें बढ़ा सकता है जिसमें सैन्य समाधान भी शामिल है। कश्मीर को लेकर भारत का सैन्य और कूटनीतिक दबाव बढ़ेगा जिसे झेलना पाकिस्तान के लिए आसान नहीं होगा।

क्या है शिमला समझौता?

शिमला समझौता दोनों देशों के बीच नियंत्रण रेखा को मान्यता देता है और इसमें यह कहा गया है कि मतभेदों को बातचीत के माध्यम से सुलझाया जाएगा। 1971 युद्ध में पाकिस्तान की करारी हार के बाद शिमला समझौता लागू हुआ था। इसे 2 जुलाई 1972 में भारत और पाकिस्तान के बीच एक निर्णायक युद्ध के बाद शांति बहाल करने के लिए साइन किया गया था। इस समझौते पर भारत की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान की ओर से तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के लिए जुल्फिकार भुट्टो अपनी बेटी और पूर्व पीएम बेनजीर भुट्टो के साथ 28 जून 1972 को शिमला पहुंचे थे। यहां 1971 युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच शांति बनाए रखने की दिशा में एक ऐतिहासिक समझौता था। शिमला समझौते के जरिए भारत ने कश्मीर को एक द्विपक्षीय मुद्दा घोषित करवाया था। यानी पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र या किसी तीसरे देश से मध्यस्थता की उम्मीद नहीं कर सकता था, न ही इस मुद्दे को किसी अन्य मंच पर उठा सकता था। हालांकि पाकिस्तान ने इसका पालन कभी नहीं किया।

Amit Mandal
अमित कुमार मंडलauthor

अमित मंडल टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में न्यूज डेस्क पर Assistant Editor के रूप में काम कर रहे हैं। प्रिंट, टीवी और डिजिटल—तीनों माध्यमों में कुल मिलाकर 15 सालों से अधिक का अनुभव उन्हें खबरों को देखने की व्यापक दृष्टि देता है। ब्रेकिंग न्यूज, लाइव ब्लॉग, स्पेशल स्टोरीज और एक्सप्लेनेर फॉर्मेट पर उनकी मजबूत पकड़ है। एंगल चुनने की कला, खबरों की गति को समझना और समय पर सही जानकारी पहुंचाना—ये उनकी सबसे बड़ी खूबियां हैं। अमित अपने करियर में करीब 20 हजार से अधिक न्यूज आर्टिकल, एनालिसिस और एक्सप्लेनर पब्लिश कर चुके हैं।

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