Smaller Parties Could Be A Game Changer in Bihar: बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और सभी पार्टियों ने तैयारियों को लेकर कमर कस ली है। नीतीश कुमार की अगुवाई वाली एनडीए सरकार को आरजेडी की अगुवाई वाला महागठबंधन चुनौती दे रहा है। इस बीच चुनाव में छोटी-छोटी पार्टियां भी बड़ी भूमिका अदा करने के लिए तैयार दिख रही हैं। ये छोटी पार्टियां भले ही कम सीटों पर अपना असर दिखाएंगी, लेकिन चुनाव के बाद बनने वाले सियासी परिदृश्य में किंगमेकर की भूमिक निभा सकती हैं। आइए ऐसी ही कुछ पार्टियों के बारे में जानते हैं कि वे किस तरह चुनाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
2020 चुनाव में छोटे दलों का मजबूत प्रदर्शन
बिहार में 2020 का विधानसभा चुनावों बेहद रोमांचक साबित हुआ था। इसका एक कारण छोटे दलों का मजबूत प्रदर्शन था। 11 सीटों पर फैसला एक हजार से भी कम वोटों से हुआ, और 26 सीटों पर 1 प्रतिशत से 2.5 प्रतिशत के अंतर से जीत हासिल हुई थी। इसमें जद (यू) के कृष्ण मुरारी शरण (प्रेम मुखिया) की जीत भी शामिल है। उन्होंने हिलसा विधानसभा क्षेत्र में सिर्फ 12 वोटों से जीत हासिल की, जो बिहार के इतिहास में कम से कम 14 चुनावों में सबसे कम अंतर से जीत थी।
मुख्य मुकाबला भाजपा और जद(यू) के नेतृत्व वाले एनडीए और राजद, कांग्रेस और वाम दलों के नेतृत्व वाले महागठबंधन के बीच था, लेकिन हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), विकासशील इंसान पार्टी (VIP), राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (उपेंद्र कुशवाहा), जन अधिकार पार्टी (पप्पू यादव), एआईएमआईएम जैसी कई छोटी पार्टियों ने उन सीटों पर चुनाव लड़ा जहां उनकी जाति या समुदाय का अच्छा प्रभाव है। सीटों की संख्या कम होने के बावजूद, उन्होंने मुकाबले को और व्यापक बनाया और पारंपरिक वोट बैंक को विभाजित किया। बिहार जाति सर्वेक्षण में नजर आए बिखरे सामाजिक विभाजन को देखते हुए, 2025 के चुनाव बेहद प्रतिस्पर्धी और दिलचस्पत होने वाले हैं।
मजबूत हो रहे हैं चिराग पासवान
छोटे राजनीतिक दलों में चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोजपा (रामविलास) तेजी से एक बड़ी ताकत के रूप में उभर रही है। खासकर 2024 के लोकसभा चुनावों में अपने प्रभावशाली प्रदर्शन के बाद उसकी ताकत बढ़ी है। एक महत्वाकांक्षी दलित नेता के रूप में चिराग पासवान वैशाली, जमुई, खगड़िया, समस्तीपुर और बेगूसराय जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में पासवान दलित समुदायों के बीच राजनीतिक प्रभाव रखते हैं जो राज्य की आबादी का 5.31 प्रतिशत हिस्सा हैं। "बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट" के नारे के साथ उनकी बढ़ती लोकप्रियता और एक व्यापक सामाजिक गठबंधन को आगे बढ़ाने की उनकी कोशिश एनडीए की संभावनाओं को निर्णायक रूप से बढ़ा सकता है। इसके अलावा, दलित नेता केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के नेतृत्व में हम (सेक्युलर) 2020 में अपने मामूली 0.87 प्रतिशत वोट शेयर के बावजूद एनडीए के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक साझेदार बनी हुई है। 3.08 प्रतिशत आबादी वाली मुसहर दलितों का प्रभाव गया, औरंगाबाद, जहानाबाद और नवादा में अन्य अत्यंत पिछड़ी जातियों (ईबीसी) के बीच है। इसका मतलब है कि हम (S) द्वारा जीती गई कुछ सीटें करीबी मुकाबलों में निर्णायक साबित हो सकती हैं।

चिराग पासवान की होगी अहम भूमिका (PTI)
मुकेश सहनी भी रेस में
इसी तरह, निषाद जाति के नेता मुकेश सहनी के नेतृत्व वाली वीआईपी एक अहम खिलाड़ी बनी हुई है। ईबीसी ब्लॉक (36.1 प्रतिशत) के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में मल्लाह (2.61 प्रतिशत) दरभंगा, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, सीतामढ़ी और मधुबनी के नदी तटीय निर्वाचन क्षेत्रों में एक अच्छा असर रखते हैं। साहनी मल्लाह समाज (जिसमें निषाद, केवट और संबंधित जातियां शामिल हैं) को मजबूत बनाने और आरजेडी के नेतृत्व वाले महागठबंधन के साथ उनके दोबारा गठजोड़ के लिए अहम साबित होगा।
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी का उदय
हालांकि, सबसे दिलचस्प घटनाक्रम मशहूर राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी (जेएसपी) का उदय है। 2024 के उपचुनाव में इस पार्टी ने चार निर्वाचन क्षेत्रों में लगभग 10 प्रतिशत वोट हासिल किए, जिसमें इमामगंज निर्वाचन क्षेत्र में जितेंद्र पासवान को 20 प्रतिशत वोट मिले। जेएसपी की राज्यव्यापी 'बिहार बदलाव यात्रा' ने इसकी जमीनी पहुंच को बढ़ाया है। हालांकि इसमें बिहार की राजनीतिक व्यवस्था को उलटने के लिए पर्याप्त ताकत नहीं है, लेकिन ग्रामीण असंतोष और दोनों गठबंधनों के खिलाफ युवाओं की शिकायतें इसके राजनीतिक भविष्य को आकार दे सकती हैं।
एआईएमआईएम भी ठोक रही ताल
दूसरी ओर, अख्तरुल ईमान के क्षेत्रीय नेतृत्व वाली एआईएमआईएम ने 2020 में बिहार की राजनीति में प्रवेश किया, जहां उसने 20 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिनमें से पांच मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्र में थीं। 1.24 प्रतिशत वोट शेयर के साथ, एआईएमआईएम ने किशनगंज, अररिया, पुरीना और कटिहार में प्रभाव बनाया है, जो सीधे तौर पर मुस्लिम मतदाताओं पर कब्जा जमाकर आरजेडी को चुनौती दे रहा है। "घुसपैठियों" के खिलाफ भाजपा के अभियान के बावजूद, इसका असर महागठबंधन पर पड़ सकता है।
अन्य छोटी पार्टियां जैसे कि जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक), जिसका नेतृत्व एक स्वतंत्र यादव राजनेता राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव करते हैं, पूर्णिया, मधेपुरा, सुपौल, अररिया और कटिहार व किशनगंज के कुछ हिस्सों में अपनी मामूली मौजूदगी बनाए हुए हैं। इसी तरह, वरिष्ठ नेता उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व में राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) काराकाट, बक्सर, नालंदा और जहानाबाद में कुशवाहा/कोइरी मतदाताओं (राज्य की आबादी का 4.27 प्रतिशत) के बीच प्रभाव बनाए हुए है, जिससे वह एनडीए का एक प्रमुख सहयोगी बन गए हैं।
छोटे दल बन सकते हैं किंगमेकर
बिहार के चुनावी परिदृश्य में बहुकोणीय मुकाबलों में कुछ हजार निर्णायक वोट छोटे दलों को चुनाव के बाद किंगमेकर बना सकते हैं। राज्य के क्षेत्रीय और छोटे दलों ने खासकर 1991 के बाद से राज्य और राष्ट्रीय, दोनों ही चुनावों में लगातार सामाजिक, राजनीतिक और दलीय विभाजन को दर्शाया है। जैसे-जैसे बिहार विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है, छोटे क्षेत्रीय दलों की भूमिका अहम होने जा रही है। अगर एनडीए और महागठबंधन में कड़ा मुकाबला हुआ और कोई भी गठबंधन बहुमत से दूर रहता है तो ऐसी स्थिति में छोटी पार्टियां सरकार बनान में अहम भूमिका निभाएंगी। तब इन छोटे दलों को साधना एनडीए और महागठबंधन दोनों के लिए ही चुनौती होगा।
