Sheikh Hasina Extradition Case: शेख हसीना को भारत से प्रत्यर्पित कराने के लिए बांग्लादेश की अंतरिम सरकार लगातार हाथ-पांव मार रही है। हसीना के प्रत्यर्पण पर दबाव बनाने के लिए बांग्लादेश की एक अदालत ने उन्हें छह महीने की सजा भी सुना दी है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के विदेश मामलों के सलाहकार मोहम्मद तौहीद हुसैन ने गुरुवार को दावा किया कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश से निकाले जाने के एक साल बाद भारत से प्रत्यर्पित करने के लिए प्रयास जारी है। हुसैन ने कहा कि उन्होंने भारत को इस संबंध में अनुरोध करते हुए एक पत्र भेजा है तथा कहा कि आवश्यक कार्रवाई भी की जाएगी। बता दें कि पिछले साल बांग्लादेश में कथित छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना बीते पांच अगस्त को देश छोड़कर भागना पड़ा। उन्होंने भारत में राजनीतिक शरण ली। फिर आठ अगस्त को बांग्लादेश में नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ।
बांग्लादेश में हिंदुओं-अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े
अंतिरम सरकार का गठन होने के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के मामलों में अचानक से तेजी आ गई। हिंदुओं सहित अल्पसंख्यकों के मंदिरों, धार्मिक स्थलों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और उनके घर को निशाना बनाकर हिंसक हमले हुए। लोगों की हत्याएं हुईं। इस उपद्रव एवं हिंसा पर रोक लगाने में यूनुस सरकार असफल रही। इसके खिलाफ दुनिया भर में अंतरिम सरकार की आलोचना हुई और यूनुस को कठघरे में खड़ा किया गया। इस दौरान शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले हुए। पार्टी के कई नेता देश छोड़कर चले गए। बाद में हसीना की पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध भी लग गया। एक्सपर्ट का कहना है कि चुनाव में अवामी लीग को हिस्सा लेने से रोकने के लिए उस पर प्रतिबंध लगाया गया है क्योंकि हसीना की पार्टी बांग्लादेश की बड़ी पार्टी है और उसे करीब 30 प्रतिशत वोट मिलते हैं।
बीत पांच अगस्त को बांग्लादेश से भारत आईं हसीना
बीते पांच अगस्त को उपद्रवी शेख हसीना को नुकसान पहुंचाने के इरादे से ढाका स्थित प्रधानमंत्री आवास में दाखिल हुए। इन हिंसक उपद्रवियों की संख्या बहुत ज्यादा थी। प्रधानमंत्री आवास में दाखिल होने के बाद इन्होंने जमकर उत्पात मचाया। यहां तक कि हसीना के अंत: वस्त्रों का प्रदर्शन किया। उपद्रवियों के इरादे से सेना ने हसीना को पहले ही अवगत करा दिया। सुरक्षा से जुड़े लोगों ने हसीना को वहां से निकल जाने के लिए कहा। इसके बाद हसीना ने भारत से मदद मांगी। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि आधे घंटे की नोटिस पर शेख हसीना के लिए हवाई मार्ग तैयार किया गया। ढाका से हेलिकॉप्टर में बैठकर हसीना त्रिपुरा पहुंची और फिर वहां से भारतीय वायु सेना के विमान से उन्हें गाजियाबाद के हिंडन एयरपोर्ट लाया गया। हसीना को भारत समर्थक और दोस्त माना जाता है। तब से शेख हसीना भारत में हैं।

शेख हसीना ने भारत में राजनीतिक शरण ली है।
हसीना पर मुकदमा चलाने की है तैयारी
बांग्लादेश और भारत के बीच प्रत्यर्पण संधि है। यानि कि एक-दूसरे के अनुरोध दोनों देश वांछित व्यक्तियों को सौंप सकते हैं। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार हसीना का प्रत्यर्पण हासिल कर उन पर जनसंहार का मुकदमा चलानी चाहती है। बांग्लादेश की सरकार में कट्टरपंथियों का दबदबा जिस तरह से बढ़ गया है, उसे देखकर नहीं लगता कि हसीना के खिलाफ सुनवाई निष्पक्ष तरीके से हो पाएगी। जानकार मानते हैं कि भारत ने अगर हसीना को सौंपा तो उनका भी हश्र उनके पिता शेख मुजीबुर्रहमान की तरह हो सकता है। भारत वहां की आंतरिक हालात को समझ रहा है, इसलिए वह बार-बार के अनुरोध के बावजूद प्रत्यर्पण मामले में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है।
राजनीतिक मामले में प्रत्यर्पण खारिज कर सकता है भारत
प्रत्यर्पण के मामले में इतने सीधे नहीं होते जितने कि लगते हैं। इसमें बहुत समय लग सकता है। प्रत्यर्पण की सफलता के लिए यह जरूरी है कि जिस देश में व्यक्ति ने शरण ली है, वह देश उसे प्रत्यर्पित करने के लिए तैयार हो। अगर भारत हसीना का प्रत्यर्पण करने के लिए तैयार नहीं है तो वह कानूनी प्रक्रियाओं एवं पेचीदिगियों का हवाला देकर वर्षों इस मामले को लटका सकता है। भारत और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि में कई शर्तें हैं जो राजनीतिक मुद्दों के मामले में प्रत्यर्पण को खारिज करती हैं। इसलिए ये शर्तें मौजूद हैं और इन शर्तों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
प्रत्यर्पण के खिलाफ कोर्ट जा सकती हैं हसीना
बांग्लादेश सरकार की अपील के बावजूद शेख हसीना का प्रत्यर्पण रुक सकता है और इसके लिए बांग्लादेश की पूर्व पीएम को सिर्फ अदालत में अपील करनी होगी। बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त रहे महेश सचदेवा ने न्यूज एजेंसी एएनआई के साथ साक्षात्कार में कहा कि जिस तरह से कई यूरोपीय देशों ने विभिन्न शर्तों के आधार पर भारत के प्रत्यर्पण अनुरोध को खारिज किया है, उसी तरह अगर शेख हसीना अदालत का रुख करती हैं तो भारत भी विभिन्न कारणों का हवाला देकर प्रत्यर्पण से इनकार कर सकता है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना प्रत्यर्पण अनुरोध के खिलाफ अदालत जा सकती हैं और कह सकती हैं कि उनके साथ गलत व्यवहार किए जाने की संभावना है। भारत ये भी कह सकता है कि हमें यकीन नहीं है कि उनके (शेख हसीना) साथ न्याय प्रणाली द्वारा उचित व्यवहार किया जाएगा या नहीं

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार हैं मो. यूनुस।
संधि में प्रत्यर्पण से इनकार की शर्त भी है
भारत और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि पर 2013 में हस्ताक्षर किए गए थे और 2016 में इसमें संशोधन किया गया था। इस प्रत्यर्पण संधि का उद्देश्य दोनों देशों की साझा सीमाओं पर उग्रवाद और आतंकवाद के मुद्दे से निपटना था। हालांकि, भारत और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि में प्रत्यर्पण से इनकार की शर्त भी है, जिसके अनुसार, अगर अपराध राजनीतिक प्रकृति का है, तो प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है।'
यूएन ने भी माना-प्रत्यर्पण द्विपक्षीय प्रक्रिया
हसीना को वापस लाने के बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रयासों को संयुक्त राष्ट्र से भी झटका लगा है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) के एशिया-प्रशांत क्षेत्र के प्रमुख रोरी मंगोवेन ने बुधवार को जिनेवा में एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान कहा कि प्रत्यर्पण एक द्विपक्षीय प्रक्रिया है और उन्होंने आशा जताई कि देश एक-दूसरे के साथ सहयोग करेंगे और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में समर्थन देंगे। यूएन ने कहा कि ऐसे अन्य तरीके भी हैं जिनके माध्यम से देश बांग्लादेश के साथ सहयोग कर सकते हैं और उसे समर्थन दे सकते हैं, जैसे कि भ्रष्टाचार की जांच करना और अवैध, चुराई गई या अनुचित तरीके से प्राप्त संपत्तियों या धन का पता लगाना। कोई भी प्रत्यर्पण या मुकदमा प्रक्रिया विधिसम्मत होनी चाहिए और वह अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करती हो।
