बिहार की राजनीति में ‘परिवार राज’! RJD निकली नंबर-1, 71 में से 30 विधायक वंशवादी; क्या है JDU-BJP का हाल?
- Authored by: Piyush Kumar
- Updated Oct 23, 2025, 03:08 PM IST
Bihar Election 2025: बिहार में चुनावी सरगर्मी चरम पर है। पहले चरण की वोटिंग 6 नवंबर को होगी, और सभी दल मैदान में अपने-अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर चुके हैं। इस बीच एक बार फिर परिवारवाद का मुद्दा सुर्खियों में है। कई ऐसे उम्मीदवार हैं, जो राजनीति में अपने पारिवारिक विरासत के सहारे उतरे हैं। आइए जानते हैं, बिहार विधानसभा के कितने मौजूदा विधायक वंशवादी पृष्ठभूमि से आते हैं।
बिहार में वंशवादी पृष्ठभूमि वाले निवर्तमान 96 विधायक हैं: ADR।(फोटो सोर्स: टाइम्स नाउ डिजिटल)
Bihar Election 2025: भारतीय राजनीति में परिवारवाद कोई नई बात नहीं है। देशभर में कई पार्टियां ऐसी है, जिसके सर्वेसर्वा तो एक ही परिवार के सदस्य हैं। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक, ज्यादातर क्षेत्रीय दलों के भीतर 'परिवारवाद' का दबदबा रहा है। तमिलनाडु में तो पिता एम के स्टालिन मुख्यमंत्री हैं तो उदयनिधि स्टालिन उपमुख्यमंत्री।
इस समय देशभर में बिहार चुनाव की चर्चा हो रही है। सीट बंटवारे के तहत एनडीए और महागठबंधन के खेमे की पार्टियां अपने-अपने उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर चुकी हैं। चाहे एनडीए हो या महागठबंधन, दोनों दलों में वंशवाद की झलक दिख रही है।
इसी बीच इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें बताया गया है कि बिहार विधानसभा के निवर्तमान 243 विधायकों में से कुल 70 (यानी 28.81 प्रतिशत) विधायक वंशवादी पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखते हैं।
क्या कहती है ADR की रिपोर्ट?
एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के विश्लेषण में पाया गया है कि बिहार देश के उन राज्यों में चौथे नंबर पर आता है, जहां वंशवाद की जड़ें सबसे गहरी हैं। आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक के बाद बिहार का स्थान आता है।
RJD में 'परिवारवाद' का बोलबाला
वंशवाद को आगे बढ़ाने में सबसे बड़ा हाथ राष्ट्रीय जनता दल का रहा है। राजद के 71 विधायकों में से 30 विधायक वंशवादी हैं, जो पार्टी के निवर्तमान विधायकों का 42.25 प्रतिशत है।
बात करें लालू परिवार की तो लालू यादव के बेटे और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव और पूर्व मंत्री तेज प्रताप यादव जैसे प्रमुख चेहरे शामिल हैं। बता दें कि लालू यादव की बेटी मीसा भारती, पाटलिपुत्र सीट से लोकसभा सदस्य हैं। निवर्तमान विधानसभा में राजद की ओर से कम से कम सात ऐसे सदस्य हैं, जिनके परिवार के सदस्य पहले मंत्री रह चुके हैं।

तेजस्वी यादव, राबड़ी यादव, लालू यादव की फाइल फोटो।(फोटो सोर्स: ANI)
BJP-JDU का क्या है हाल?
परिवारवाद के मामले में जदयू भी पीछे नहीं है। जदयू के निवर्तमान 44 विधायकों में से 16 (यानी 36.36 प्रतिशत) विधायक वंशवादी हैं। वहीं, भाजपा में वंशवादी विधायकों की संख्या राजद और जदयू के संयुक्त आंकड़े से बस तीन सीटें ही कम है। वहीं, कांग्रेस के 19 विधायकों में से चार (यानी 21.25 प्रतिशत) विधायक वंशवादी हैं।
अब बात की जाए निवर्तमान मंत्रियों की। जदयू-भाजपा राज्य सरकार के सात मंत्री भी वंशवादी पृष्ठभूमि से आते हैं।
वंशवादी मंत्रियों की फेहरिस्त में विजय कुमार चौधरी, महेश्वर हजारी, शीला कुमारी और सुनील कुमार तथा भाजपा के नितिन नवीन का नाम शामिल है।
वहीं, मंत्रियों की लिस्ट में बिहार विधानसभा के उपाध्यक्ष रह चुके शकुनी चौधरी के बेटे सम्राट चौधरी और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के बेटे संतोष सुमन मांझी जैसे नेता शामिल है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की फाइल फोटो।(फोटो सोर्स: PTI)
राजनीति में तीसरी पीढ़ी
जदयू के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री सुमित कुमार सिंह, जिनके पिता और दादा विधायक और मंत्री थे। वंशवादियों की लिस्ट में राजद के युसूफ सलाहुद्दीन भी शामिल हैं, जिनके दादा सांसद थे पिता महबूब अली कैसर सांसद थे। और दादा चौधरी सलाहुद्दीन मंत्री थे। और जदयू के मंत्री अशोक चौधरी, जिनके पिता भी मंत्री थे।
कहां से शुरू हुई 'परिवारवाद' की कहानी ?
देश की राजनीति में परिवारवाद की इतिहास पर नजर डालें तो आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी ने ही राजनीतिक वंशवाद की कहानी शुरू कर दी। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद पार्टी की कमान इंदिरा गांधी को सौंप दी गई। इसके बाद राजीव गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी के हाथों में पार्टी की बागडोर चली गई।

सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की फाइल फोटो।(फोटो सोर्स: ANI)
बिहार के पहले मुख्यमंत्री ने किया था 'परिवारवाद' का विरोध
हालांकि, जिस बिहार में परिवारवाद की जड़ें इतनी गहरी जम चुकी है, उसी बिहार में एक नेता ऐसा भी था जिन्होंने अपने बेटे को राजनीति में लाने से साफ इनकार कर दिया था। 1957 में चंपारण के कुछ कांग्रेस नेताओं ने बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण बाबू के बेटे शिवशंकर सिन्हा को विधानसभा चुनाव में उतारने का प्रस्ताव रखा, लेकिन श्री बाबू ने साफ कहा, ‘अगर मेरा बेटा चुनाव लड़ेगा, तो मैं खुद चुनाव नहीं लडूंगा। एक परिवार से एक ही व्यक्ति को टिकट मिलना चाहिए।’

बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की फाइल फोटो।(फोटो सोर्स: shree krishna babu archives)
इस सिद्धांत के चलते उनके बेटे को उनके जीवित रहते टिकट नहीं मिला। उनके निधन के बाद 1961 में उनके निधन के बाद ही शिवशंकर विधायक बन सके।