Crude Oil Supply at Pre War Level : पश्चिम एशिया से क्रूड ऑयल की सप्लाई अब बढ़कर युद्ध पूर्व स्थिति में आ गई है। JP Morgan और गोल्डमैन सैक्स के एनालिस्टों का दावा है कि पश्चिम एशिया से अब क्रूड की सप्लाई बढ़कर करीब युद्ध पूर्व स्थिति में पहुंच गई है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में दोनों के हवाले से दावा किया गया है कि खाड़ी देशों से क्रूड ऑयल की सप्लाई अमेरिका और ईरान युद्ध शुरू होने से पहले के स्तर पर पहुंच गई है।
इसके अलावा G7 देशों की तरफ से अपने इमर्जेंसी रिजर्व से ऑयल जारी किए जाने की वजह से भी ग्लोबल ऑयल मार्केट में दाम में नरमी देखने को मिली है। अक्टूबर के पहले सप्ताह में लगातार ब्रेंट क्रूड ऑयल का भाव 110 डॉलर ने नीचे बना हुआ है। वहीं, WTI क्रूड 100 डॉलर से नीचे है। इसके अलावा सैटेलाइट से शिपिंग को ट्रैक करने वाले कैप्लर के मुताबिक भी होर्मुज स्ट्रेट बंद रहने के बावजूद ऑयल शिपिंग सामान्य होने की तरफ बढ़ रही है।
भारतीय बास्केट में कितना है दाम?
सऊदी अरब ने अपने Arab Light crude का नवंबर का सेलिंग प्राइस 2020 के बाद के सबसे निचले स्तरों तक कम कर दिया है। इसके बावजूद Brent crude अभी भी करीब $100 प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। यानी सप्लाई सुधरने और क्रूड पर भारी डिस्काउंट के बावजूद भारत जैसे बड़े क्रूड आयातक 120 डॉलर प्रति बैरल के आसपास क्रूड आयात कर रहे हैं। PPCA के मुताबिक सितंबर में जहां भारत के क्रूड आयात का औसत 117 डॉलर प्रति बैरल रहा। वहीं, अक्टूबर में यह अब तक 120 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है।
कितनी सुधरी पश्चिम एशिया से सप्लाई?
जेपी मॉर्गन और गोल्डमैन सैक्स के एनालिस्टों के मुताबिक सितंबर में ईरान (Iran) को छोड़कर खाड़ी देशों से क्रूड ऑयल एक्सपोर्ट युद्ध पूर्व स्तर के 98% तक पहुंच गया है। हालांकि, डीजल-पेट्रोल और दूसरे रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट की आपूर्ति अभी करीब 60% पर है। यानी कच्चे तेल की सप्लाई काफी हद तक सुधर गई है। लेकिन, पेट्रोल, डीजल और ATF जैसे ईंधन की सप्लाई बाधित है। यही वजह है कि क्रूड की सप्लाई सामान्य होने के बाद भी डीजल-पेट्रोल पूरी दुनिया में महंगी है।
तेल बाजार में सिर्फ बैरल नहीं, रिस्क भी
फिजिकल ऑयल मार्केट में कीमत सिर्फ डिमांड और सप्लाई से तय नहीं होती। बल्कि, इसमें जियोपॉलिटिकल रिस्क का भी बड़ा प्रीमियम शामिल होता है। फिलहाल, अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध को लेकर अनिश्चितता है। इसके अलावा होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) से भी ट्रैफिक सामान्य नही हुआ है। ऐसे में टैंकरों को कई जगह ज्यादा लंबा रूट लेना पड़ रहा है और रिस्क प्रीमियम के साथ ही इंश्योरेंस और फ्रेट कॉस्ट बढ़े हुए हैं। इसका मतलब यह हुआ कि बाजार के भागीदार बता रहे हैं कि तेल उपलब्ध है, लेकिन उसे सुरक्षित और सस्ते तरीके से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाना अब भी आसान नहीं है।
चुनावों के चलते दाम घटने की संभावना कायम
भारत के लिए क्या है सबसे बड़ी अड़चन?
भारत के लिए महंगा क्रूड ऐसा झरना शुरू कर देता है, जिसमें से बचकर निकला मुश्किल होता जाता है। महंगा, क्रूड डॉलर के मुकाबले रुपये को कमजोर करता है। रुपया जितना कमजोर होता जाता है, क्रूड उतना ही महंगा होता जाता है। इस तरह यह ऐसा चक्र बन जाता है, जिसे काबू करना असल में भारत के हाथ में नहीं होता है। यही वजह है कि भारत का क्रूड आयात ही भारत के लिए क्रूड और पेट्रोल-डीजल के दाम घटने में सबसे बड़ी बाधा है। इसके अलावा ब्रेंट और WTI जो दिखते हैं, वे फ्यूचर का भाव दिखाते हैं। जबकि, इंडियन क्रूड बास्केट (ICB) में दाम 120 डॉलर प्रति बैरल के आसपास हैं। इस कीमत में रिस्क प्रीमियम, इंश्योरेंस और फ्रेट भी शामिल होता है।
क्यों क्रूड के साथ सस्ता नहीं हो रहा पेट्रोल-डीजल?
भारत की ज्यादातर ऑयल मार्केट कंपनियां भारत में डीजल और नैचुरल गैस बेचने पर होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए डीजल निर्यात कर रहे हैं। यह भी एक बड़ी वजह है कि क्रूड के दाम घटने के बाद भी भारत में पेट्रोलियम प्रोडक्ट के दाम नहीं घट रहे हैं। हालांकि, गौर करने वाली बात यह भी है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की रिटेल कीमतें मई 2026 के बाद से रिवाइज नहीं की गई हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस दौरान दाम में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। फिलहाल, भारतीय कंपनियों को डीजल पर करीब ₹50 प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है।
भारत में तेल कब सस्ता हो सकता है?
भारत में पेट्रोल-डीजल कब सस्ता होगा, इसे लेकर कोई आधिकारिक जानकारी तो नहीं है। लेकिन, अगर क्रूड का दाम लगातार घटता है और 65 से 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ जाता है, तो पेट्रोल-डीजल के दाम में राहत मिल सकती है। इसके अलावा फिलहाल भारतीय रिफाइनर डीजल की ग्लोबल शॉर्टेज का फायदा भी उठाना चाहते हैं। ऐसे में उनका फोकस घरेलू बाजार में नुकसान में डीजल बेचने से ज्यादा ग्लोबल बाजार में सप्लाई के जरिये मुनाफा बनाना है। हालांकि, कुछ एनालिस्ट यह भी मान रहे हैं कि भारत में अब चुनावी दौर शुरू हो रहा है। खासतौर पर उत्तर प्रदेश के चुनाव आने वाले हैं। ऐसे में सरकार तेल कंपनियों पर दाम घटाने के लिए दबाव बना सकती है।
